इराक असंतोष की आग

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मिर्ज़ा शिबली बेग

1 अक्टूबर से इराक़ में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए यह विरोध प्रदर्शन इराक़ में व्याप्त भ्रष्टाचार और बढ़ती बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ है । इनकी विशेषता यह है कि बेरोजगार नौजवान ही इसका नेतृत्व कर रहे हैं, बड़ी संख्या में नौजवान इसमें शरीक हैं धीरे धीरे यह  विरोध प्रदर्शन इराक़ के प्रमुख शहरों समेत पूरे इराक़ में फैल गए । इन प्रदर्शनों में शिया- सुन्नी समेत सभी वर्गों के लोग शामिल हैं।  इन प्रदर्शनों का आह्वाहन किसी राजनीतिक धार्मिक संगठन की तरफ से नहीं किया गया था, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी शुरुआत हुई यही कारण है कि प्रदर्शनकारी न संगठित थे और ना ही उनके बीच सामंजस्य था, बस उनको रोष, पीड़ा, निराशा को व्यक्त करने का एक माध्यम मिल गया था, बस क्या था सरकार की ओर से मुस्लिम देशों की चिर परिचित जनता दमनकारी शैली में सुरक्षा बल इन पर ऐसे टूटे कि इन देशों की सेनाएं दुश्मन पर भी ऐसे नहीं टूटती, परिणाम स्वरूप 30 दिसंबर तक 400 से अधिक निहत्थे प्रदर्शनकारी मारे गए । मारे जाने वालों में शिया भी थे और सुन्नी भी, इन प्रदर्शनकारियों की इससे बड़ी बेगुनाही क्या हो सकती है सारी मौतें एक तरफा हुई ।

स्मरण रहे अरबों और इसराइल के बीच 1967 में छ: दिवसीय युद्ध हुआ जिसमें इसराइल की ओर से कुल 776 इसराइली मारे गए 4500 जख्मी हुए और 15 पकड़े गए।  इसराइल विजय रहा। इजराइल का क्षेत्रफल 3 गुने से अधिक बढ़ गया।

ईरान-इराक़ में अक्टूबर-नवंबर मास के प्रदर्शनों में 800 से अधिक प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। 1000 से अधिक गिरफ्तार हुए है और 6000 से अधिक घायल हुए हैं ज़रा सोचें यह किसका नुकसान है । इराक़ का ? ईरान का ?

साम्राज्यवादी एवं नव साम्राज्यवादी शक्तियां जहां जाती हैं वहां भ्रष्टाचार और दमन साथ लेकर जाती हैं अफगानिस्तान,  इराक़, लीबिया जीवन्त उदाहरण हैं।

इराक़ में प्रदर्शनकारियों का ज़ोर बढ़ती बेरोज़गारी, आसमान छूती महंगाई और सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर है, साथ ही इन प्रदर्शनकारियों में ईरान के विरुद्ध रोष है एवं आक्रोश भी देखने को मिला।

नवंबर के दूसरे सप्ताह में कर्बला में ईरानी वाणिज्य दूतावास को प्रदर्शनकारियों ने निशाना बनाया,  जिसमें दूतावास की दीवार का एक भाग क्षतिग्रस्त हो गया।

नवंबर के अंतिम सप्ताह में प्रदर्शनकारियों द्वारा इराक़ के दूसरे शहर नजफ में ईरान के वाणिज्यिक दूतावास को निशाना बनाया गया, जिसमें दूतावास का एक बड़ा भाग अग्नि की चपेट में आकर क्षतिग्रस्त हुआ । दूतावास में मौजूद लोगों को पिछले रास्ते से भागना पड़ा प्रदर्शनकारियों जिनमें बड़ी संख्या में नवयुवकों ने दूतावास की इमारत पर फैरा रहे ईरानी ध्वज को उतारकर इराक़ का झंडा लहरा दिया और ईरान विरोधी नारे लगाए।

कर्बला और नजफ में ईरानी दूतावास में घटित घटनाएं प्रतीकात्मक और सांकेतिक हैं, ठीक उसी प्रकार जब ईरान की क्रांति के उपरांत क्रांतिकारी छात्रों एवं युवकों ने क्रांति विरोधी अमेरिका के हस्तक्षेप और उसके रवैया के विरुद्ध तेहरान स्थित अमरीकी दूतावास को घेर लिया था।

सऊदी अरब द्वारा शेख बाकर अल निम्र को जनवरी 2016 में फांसी दिए जाने के विरोध में मशहद और तेहरान में सऊदी दूतावास को निशाना बनाया गया था, जो विरोध एवं रोष प्रकट करने का एक माध्यम था।

आवश्यकता है ईरान समय और समझदारी के  तकाजों को पहचाने । इराक़ में ईरान विरोध ऐसे ही नहीं है, प्रदर्शनों के दौरान समाचार आए की प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी करने वाले अरबी भाषी नहीं थे।

उधर सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खा़मनई के करीब विश्वासपात्र,  आधिकारिक प्रतिनिधि हुसैन शरीयत मदारी जो पेशे से एक पत्रकार भी हैं, ईरान के एक बड़े फारसी दैनिक केहान मुख्य संपादक हैं, ने अपने एक लेख में इराक़ के प्रदर्शनकारियों को कोसा और इराकी़ सशस्त्र गैर सरकारी बल हशद अश शाबी से आवाहन किया कि ”ईरान के दूतावास पर हमला करने वाले प्रदर्शनकारियों का पीछा कर उन्हें अंजाम तक पहुंचाएं” ।

हशद अश शाबी इराकी सशस्त्र गुटों का एक समूह है जिसमें 40 के लगभग सशस्त्र गुट हैं । इन्हें आईएसआईएस से लड़ने के लिए इकट्ठाट्टा एवं संगठित किया गया था । जिन्हें अमेरिका और इराक़ी सरकार का पूर्ण समर्थन प्राप्त था।

इसके अधिकतर गुट ईरान पोषित एवं समर्थित हैं । समाचार है नवंबर मास में पासदाराने इंक़लाब के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी दो बार इराक़ में देखे गए समाचार यह भी है कि हशद अश शाबी के नेतृत्व से भी मिले।

वहीं दूसरी तरफ आयातुल्ला ख़ामनई ने ईरानी दूतावास पर हमला करने वालों को ”भाड़े के मवाली कहा”

इराक़ में प्रदर्शनकारियों का केंद्र बग़दाद का तहरीर चौक है जहां प्रदर्शनकारियों के मुख से

ईरानी मराजियत नामंजू़र, अज़मी मराजियत नामंजू़र

जो ईरान के प्रति रोष एवं असंतोष को प्रकट करती है साथ ही ईरान की धार्मिक सत्ता के भी विरुद्ध है क़ुम और नजफ़ के बीच पारंपरिक कशमकश को भी दर्शाते हैं।

28 नवंबर को मुक्त़दा अल सद् ने प्रधानमंत्री से त्यागपत्र की मांग की । उनके अनुसार “अब प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल मेहंदी के समक्ष कोई मार्ग नहीं बचा है”

एक बड़े शिय धर्मगुरु अयातुल्लाह सिस्तानी ने भी प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की। जिसके बाद 30 नवंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना दी गई की इतवार 1 दिसंबर को प्रधानमंत्री पार्लियामेंट में अपना इस्तीफा देंगे।

इस ख़बर के उपरांत तहरीर चौक पर जश्न का माहौल बन गया इस तरह एक विफल सरकार के प्रमुख का राजनीतिक अंत हुआ।

लेकिन प्रदर्शनकारियों को इस पर संतोष नहीं हुआ उनका आक्रोश बढ़ता जा रहा है ईरान के नजफ़ स्थित दूतावास पर पुनः प्रदर्शनकारियों का हमला हुआ है और एक बड़े इराकी शिया धर्मगुरु की मजार पर बनी संरचना को जलाने का प्रयास किया गया है जिनको ईरान समर्थक समझा जाता था।

इराक़ शासनहीनता और अराजकता की ओर अग्रसर है। जिसने पड़ोसी देशों को एक अवसर प्रदान कर दिया है।

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