बाबरी मस्जिद की 27 वीं वर्षगांठ, आज भी मुसलमानों के दिल में कसक क्यों?

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6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद को ढ़ा दिया गया था। यानि की 27 साल पहले इस मस्जिद को नेस्त नाबूद कर दिया गया था।  इस घटना को 27 साल बीत चुके हैं. इस दिन को देश ही नहीं बल्कि विश्व के इतिहास में सबसे काला दिन बन कर रह गया हजारों लोग आपस में लड़कर मर गए आज भी उन घावों की टीस लोगों के दिलों में उठती है. मंदिर मस्जिद के चक्कर में लाखों लोगों के घर तबाह हो गए।

लेकिन आज तक देश के मुसलमानों को उनका हक नही मिला। बाबरी मस्जिद की 27 वीं वर्षगांठ पर सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हुई जहां कुछ बच्चे सवाई माधोपुर के छान गांव में बाबरी मस्जिद की रेत की छवि बनाते देखे गए थे।
इस रेत की मिट्टी से बच्चें बाबरी मस्जिद का ढ़ाचा तैयार कर रहे थे, इस तस्वीर को देख कर दिल की कसक बयां हो गई कि, इस मामले को न्याय नहीं दिया गया है। मुसलमानों की आने वाली पीढ़ी बाबरी मस्जिद को कभी नहीं भूलेगी और वे भारत के दूसरे दर्जे के नागरिक बनने से इंकार कर देंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही मंदिर के हक में फैसला सुनाया है,लेकिन भारत का मुसलमान इस फैसले से नाखुश है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिमों को अयोध्या में अलग से 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 1934, 1949 और 1992 में मुस्लिम समुदाय के साथ हुई ना-इंसाफी को गैरकानूनी करार दिया था।

कोर्ट में कई ऐसे दलील पेश की गयी जिससे ये साबित नही हुआ कि, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनायी गयी है, लेकिन फिर भी कोर्ट का फैसला मुसलमानों के हक में नही था। भाजपा सरकार ने मंदिर के नाम पर अपनी राजनीती नीतियों में भी सफल हुई।

1980 के दशक के आखिर में भाजपा ने अपने कई पार्टी नेताओं के साथ इसका राजनीतिक लाभ लेने के लिए उभरी हिंदू धर्म की बदसूरत भावना और सैकड़ों लोगों की भीड़ का नेतृत्व किया हजारों कारसेवकों ने 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद में तोड़फोड़ की।

आठ लोगों के खिलाफ मामले भी दर्ज किया गया, जैसे लालकृष्ण आडवाणी, एमएम जोशी, उमा भारती, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, वीएच डालमिया, विनय कटियार और साध्वी ऋतंभरा। 16 दिसंबर 1992 को, केंद्र ने जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्राहन का एक सदस्यीय आयोग बनाया, जिसने 17 साल बाद अपनी रिपोर्ट पेश की, लेकिन हाथ कुछ नही लगा। गांधी वादी वाले देश में आज लोकतंत्र की हत्या साफ होता दिख रहा है।

क्या देश के मुसलमानों को उनका हक मिला? क्या कानून ने मुसलमानों के साथ इंसाफ किया? ये सारी बाते आज देश के मुसलमानों को सोचने पर मजबूर कर देती है, मुसलमान अपनी हक की लड़ाई हमेशा से लड़ते आ रहे है, और आगे भी लड़ेगे।

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