क्या अजीत सिंह भी बन सकते हैं प्रधानमंत्री ?

0

अदील अख़तर

लोकसभा चुनाव के सभी चरण पूरे होने के बाद अब देश को नतीजों का इंतेजार है, लेकिन नतीजे आने से भी पहले नई सरकार के गठन के लिए दोड़धूप शुरू हो गयी है। नई सरकार कौन कौन सी पार्टियां मिल कर बनाएंगी और प्रधानमंत्री कौन होगा यह अभी साफ़ नहीं है लेकिन इतना ज़रूर है कि विपक्षी पार्टियों की मिलीजुली सरकार बनने के आसार दिखाई देने लगे हैं। सभी विपक्षी दल हालांकि एक ही तंबू के नीचे जमा होते दिख रहे हैं लेकिन तंबू के अन्दर का नक़शा किसी मुअम्मे की तरह अभी जटिल और अस्पष्ट है।

अगर विपक्षी दल मिलजुल कर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को फिर से सरकार बनाने से रोकने के लिए एक तालमेल बना लेते हैं और महागठबंधन बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो इस कामयाबी का दारोमदार इस बात पर होगा कि प्रधानमंत्री किस को बनना है। महागठबंधन की सरकार को सुनिश्चित करने के लिए विपक्ष के कई दिग्गज नेता अपने अपने स्तर से दोड़ भाग कर रहे हैं और कई नेता ऐसे हैं जो स्वयं को प्रधानंत्री पद का हकदार समझते हैं। उनकी पार्टियां भी उन्हें दावेदार के रूप में पेश करने की कोशिश में हैं और जाहिर है कि इतने दावेदारों की मौजूदगी में सबसे बड़ी समस्या यही होगी कि किसकी दावेदारी को सभी दल मानने पर राजी हों।

भाजपा ने यह चुनाव पार्टी के बजाए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व के आधार पर लड़ा है और भाजपा कार्यकर्ताओं ने नरेन्द्र मोदी के लिए वोट मांगा है इस लिए यह बात सही है कि भाजपा को पड़ने वाले मोट मोदी मोदी के नारे पर पड़े हैं। इस व्यक्तिगत चुनावी राजनीति में नरेन्द्र मोदी के मुकाबले पर विपक्ष के नेताओं में सबसे मुख्य चहरा बन कर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सामने आए हैं और चूंकि एक राष्ट्रीय दल के रूप में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से ही है इसलिए कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी हैं। कांग्रेस अपने इस दावे से आसानी से पीछे नहीं हटेगी और उसका हर सम्भव प्रयास यही होगा कि विपक्षी दल राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करें। लेकिन विपक्ष की कम से कम दो महत्वपूर्ण पार्टिया ऐंसी हैं जो इस पर किसी हाल राजी नहीं होंगी यानि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी। बसपा अध्यक्ष मायावती एक तो खुद ही प्रधानमंत्री पद की दावेदार हैं और दूसरी बात यह है कि उनकी पार्टी कांग्रेस को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी समझती है। समाजवादी पार्टी भी कांग्रेस को मुश्किल से ही यह मौक़ा देगी कि वह विपक्ष के गठबंधन का नैतृत्व करे। इन दोनों के अलावा बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी भी कांग्रेस के लिए आसानी से नर्म पड़ने वाली नहीं हैं। राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव भी अंदर अंदर यही चाहेंगे कि प्रधानमंत्री की कुर्सी कांग्रेस को न मिले।

राहुल गांधी के बाद प्रधानमंत्री पद की सबसे बड़ी दावेदार मायावती हैं लेकिन मायावती को कांग्रेस स्वीकार नहीं करेगी। प्रधानमेत्री पद के लिए तीसरी शक्तिशाली उम्मीदवार बन कर उभरी हैं ममता बनर्जी। लेकिन ममता को कांग्रेस आखिर कैसे पचा पाएगी और ममता के नैतृत्व वाली सरकार को वामपंधी दल आखिर कैसे अपना समर्थन देंगे, यह एक बड़ा सवाल है और ममता बनर्जी की दावेदारी को कमजोर करने वाला है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल को भी भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जाता रहा है, लेकिन अरविन्द केजरीवाल की दाल गलना आसान नहीं है। कांग्रेस उनके प्रधानमंत्री बनने किसी सम्भावना पर पूरी तरह रोक लगाने की हर सम्भव कोशिश करेगी। इसलिए यह बड़ी अजीब स्थिति होगी कि सभी विपक्षी दल एक गठबंधन सरकार बनाने पर सहमत होंगे लेकिन गठबंधन की रूप रेखा बनाना उनके लिए आसान नहीं होगा। बड़ी उठा पठक होगी, बहुत माथा पच्ची होगी और बहुत जोड़-तोड़ होंगे। लेकिन कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही होगा, इस लिए इस बात की पूरी सम्भावना है कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार विपक्ष के सभी नेता अपनी अपनी कुर्सियों पर बैठे रह जाएं और प्रधानमंत्री की कुर्सी किसी और को ही पेश कर दी जाए। ठीक उसी तरह जिस तरह देवी गोड़ा प्रधानमंत्री बन गए थे या एस. आर. बोम्मई जिन्होंने सपने में भी न सोचा होगा कि वह कभी प्रधानमंत्री बनेंगे, अचानक ही प्रधानमंत्री बन गए थे।

वास्तव में विपक्ष को किसी ऐसे चेहरे की जरूरत होगी जो सबके लिए स्वीकार्य हो। जिस पर किसी को भी बहुत ज्यादा रिजर्वेशन न हो। एक ऐसे नेता के रूप में सबसे मुख्य और उचित नाम चौधरी अजीत सिंह का है। चौधरी अजीत सिंह यूपी के महागठबंधन में शामिल हैं। महागठबंधन सम्भवता यूपी से सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाला संयुक्त मोर्चा होगा इसलिए महागठबंधन का प्रयास यह होगा कि अगर मायावती या अखिलेश यादव प्रधानमंत्री नहीं बन रहे हैं तो गठबंधन के नेता के रूप में अजीत सिंह को ही प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया जाए। और अजीत सिंह का नाम अगर प्रस्तावित होता है तो इसका विरोध करने का कोई खास आधार अन्य दलों के पास नहीं होगा। क्योंकि अजीत सिंह की लड़ाई फिलहाल किसी से नहीं है। वह कांग्रेस के लिए कोई बड़ी चुनौती या प्रतिद्वंदी नहीं हैं, मायावती के लिए भी कोई समस्या नहीं हैं, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, शरद पवार या दक्षिण के किसी नेता को उनके नाम पर आपत्ति नहीं हो सकती है।

अजीत सिंह लम्बा राजनीतिक अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ नेता हैं। कई बार केन्द्र में मंत्री भी रह चुके हैं। वह पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पुत्र हैं। चौधरी चरण सिंह की तरह चौधरी अजीत सिंह की पहचान भी एक किसान नेता के रूप में है और इस समय किसानों का मुद्दा सबसे बड़ा है। विपक्षी दलों ने हर जगह जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ा है उनमें सबसे बड़ा मुद्दा किसानों की समस्याओं का है। अजीत सिहं सबसे पहले किसानों की ही बात करते हैं, किसानों की समस्याओं के समाधान का फार्मूला उनके पास हमैशा मौजूद रहता है। यह बात भी अजीत सिंह की दावेदारी को मजबूत करने वाली होगी कि उनके साथ कोई स्कैण्डिल जुड़ा हुआ नहीं है, जाहिर में वह एक साफ सुथरी छवि के नेता हैं। उन्हें यद्यपि अवसरी वादी कहा जासकता है लेकिन स्वभाव के लिहाज से वह सुलह समझौते के साथ चलने वाले नेता हैं और अपेक्षाकृत शान्त स्वभाव के शालीन व्यक्ति हैं। अजीत सिंह की जाति का परिवेश भी उनके लिए सहायक होगा। जाति से वह जाट हैं और कशमीर से लेकर गुजरात तक जाटों के कबीले फैले हुए हैं। जाटों का राजनीतिक महत्व तो सब जानते ही हैं।

अजीत सिंह के पक्ष में एक बात यह भी है कि वह एक सेकुलर और ग़ैर साम्प्रदायिक नेता की छवि रखते हैं। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय अर्थात मुसलमानों के लिए भी उनका नाम प्रधानमंत्री के रूप में आगे आना एक संतोषजनक बात होगी। मुसलमानों को विपक्षी दलों ने हालांकि इस चुनाव में बिल्कुल ही उपेक्षित रखा है और भाजपा के आरोपों से बचने के लिए उनके सम्बंध में अपने होंट बिल्कुल सिले रखे, लेकिन भाजपा शासन में मुसलमानों पर जो अत्याचार खुले आम हुए हैं उसके जो नकारात्मक प्रभाव मुस्लिम युवाओं के मन मस्तिष्क पर पड़े हैं वे निश्चित रूप से देश के लिए बहुत खतरनाक हैं और इस खतरनाकी का अहसास कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को कुछ न कुछ तो होगा ही। इसलिए मुसलमानों की मानसिक पीड़ा और तनाव को कम करना भी विपक्ष के चिंतकों के सामने हो सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री पद के लिए अजीत सिंह का नाम पेश होने पर यह पहलू भी विपक्ष की राय बनाने में सहायक हो सकता है।

पूर्व में जब बिखरे हुए विपक्षी दल कांगेस को चित करने के लिए एकजुट हुआ करते थे तो कांग्रेस कहती थी कि “बिल्ली के भागों का छींका टूटा तो प्रधानंत्री कौन होगा”? आज यही बात भाजपा कहती है। तो जिस प्रकार पहले संयोग से और अप्रत्याशित रूप से हरदन हल्ली देवीगोड़ा या एस आर बोम्मई प्रधानमंत्री बने थे उसी प्रकार आज भी यह हो सकता है कि विल्कुल अप्रत्याशित रूप से अजीत सिंह या और किसी का नाम लाटरी की तरह निकल आए। विपक्ष को आखिरकार किसी ऐसे नेता की जरूरत होगी जो अपने अनुभव, सीनियरटी और अपने सम्बंधों के लिहाज से इतना सियाना हो कि सभी विपक्षी दलों के संतुलने के साथ साध सके। लेकिन आगे आगे देखिए होता है क्या

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here