क्या कोरोना का क़हर आफत बनकर टूटेगा?

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रईस अहमद

दुनियाभर के देश अभी वेश्विक मंदी की मार से जूझ ही रहे थे कि कोरोना महामारी का क़हर आफत बनकर टूट पड़ा। चीन के वुहान शहर से फैलने वाले इस वायरस ने देखते ही देखते यूरोप, अमेरिका, सउदी अरब से लेकर भारत सहित सैकड़ों मुल्कों को अपनी चपेट में ले लिया। अब तक लाखों लोगों की जान ले चुका है, और हर दिन यह आकड़ा तेज़ी से बढ़ रहा है, और करोड़ों लोगों को अपनी ज़द में लेने को तैयार हैं।

गौरतलब है कि जहां यह महामारी दुनिया में जानी नुकसान पहुंचा रही है वहीं यह आर्थिक हानि भी पहुचाने के लिए ज़िम्मेदार साबित होने वाली है। आस्ट्रेलियाई नेशनल यूनिवर्सिटी और किंग्ज़ काॅलेज लंदन में हुए अध्यन पर आधारित आॅक्सफेम के एक अनुमान के अनुसार 50 करोड़ और आबादी के ग़रीब हो जाने का ख़तरा बढ़ा है। जिसके चलते यह महामारी लोगों को मध्यमवर्ग से ग़रीबी रेखा के नीचे पहुंचा देगी। भारतीयों के सामने यह भयानक आर्थिक समस्या मुहं बाय खड़ी है। लिहाज़ा ऐसे हालात में बेहद सूझबूझ के फैसले करने की ज़रूरत है। ताली थाली और दियाबाती के अलावा फिज़ूल के हिन्दु-मुस्लिम मुद्दों से हटकर ज़िम्मेदारी निभानी होगी।

यह बेहद दुखद है कि तबलीग़ी जमात को मुद्दा बनाकर इस्लामोफाबिया का हव्वा खड़ा किया जा रहा है। जिसके तहत देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। जिसके कारण हालात यह है कि एक वीडियों में भाजपा विधायक खुले आम नफ़रत फैलाते हुए मुसलमान फल सब्ज़ी वालों से ख़रीदारी न करने का बहुसंख्यको से आवहान करते दिखाई दे रहें है। कुछ मामलों में तो अंधभक्त आतंकियों द्वारा मार-पिटाई तक की वारदात सामने आ रही है। ऐसी ही कुछ वारदातों पर पुलिस द्वारा कार्यवाही भी की गई है। कुछ लोगों की गलती पूरे समाज पर नहीं थोपी जा सकती। वक़्त रहते इस नफ़रती सोच से बाहर न निकला गया तो कहीं इस महामारी में हालात और भी बदतर न हो जाए।

विदेशों में भारतीयों पर भारी पड़ती मुस्लिम नफ़रत

इस्लामोफोबिया के कारण गोदी मीडिया और अंधभक्तों के ज़रीये फैलाई गई नफ़रत की इस आग की चिंगारियां देश से बाहर भी पुहंच रही हैं। जिसके चलते पूरी दुनिया इन नादानियों पर प्रतिक्रिया देने लगी है। खासतौर से सउदी अरब, यूएई, दुबई सहित खाड़ी देशों से इस नादानी की जो कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है वो किसी से छुपी नहीं है। जिससे भारत के मध्य-पूर्व के मुस्लिम देशों से रिश्तों में मनमुटाव बढ़ता नज़र आ रहा है।

ऐसे ही मामले में भारतीयों की मुस्लिम विरोधी पोस्ट से ख़फा, खाड़ी देश की राजकुमारी ने भी चेताया, और भारत में कोरोना वायरस की महामारी के दौरान इस्लामोफोबिया को लेकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में नाराज़गी देखने को मिली। यूएई में सोशल मीडिया पर मुस्लिम समुदाय के खि़लाफ़ कुछ भारतीयों की नफ़रत फैलाने वाली पोस्ट को लेकर असहज स्थिति पैदा हो गई। सिर्फ इतना ही नहीं, तबलीग़ी जमात का मुद्दा मीडिया द्वारा उछाले जाने के बाद सोशल मीडिया पर पोस्टों में पूरे मुस्लिम समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराया जाने लगा। इसकी आलोचना करते हुए इस्लामिक सहयोग संगठन ने भी बयान जारी किया और कहा कि भारत में ये चीजें रुकनी चाहिए।

यह मामला यही नहीं रूका यूएई की राजकुमारी ने तो प्रवासी भारतीयों को सख़्त चेतावनी तक दे डाली। यूएई की राजकुमारी हेंद अल कासिमी ने एक भारतीय यूज़र की मुस्लिम विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट्स शेयर करते हुए लिखा, इस्लामोफोबिया और नस्लवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों पर कड़ा जुर्माना लगाया जाएगा और उन्हें यूएई से बाहर निकाल दिया जाएगा। इस चेतावनी के बाद भारतीय यूज़र ने अपना ट्विटर अकाउंट डिलीट कर दिया। यूएई में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं और भारत के साथ अच्छे संबंध भी हैं।

यूएई की राजकुमारी ने कहा कि ‘यूएई का शाही परिवार भारतीयों का दोस्त ज़रूर है लेकिन इस तरह का रवैया स्वीकार्य नहीं है। यहां पर आने वाले हर शख्स को काम के बदले पैसे मिलते हैं, कोई भी मुफ्त में यहां नहीं आता है। इस देश की धरती से आप अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं, अगर आप इसी का मज़ाक उड़ाते हैं तो ये मत सोचिए कि किसी का ध्यान नहीं जाएगा।‘
यूएई की राजकुमारी के ट्वीट के बाद बीजेपी नेता तेजस्वी सूर्या का एक पुराना बेहूदा ट्वीट यूएई की सोशल मीडिया में वायरल होने लगा। 2015 में तेजस्वी ने एक ट्वीट में लिखा था कि ‘अरब की 95 फीसदी महिलाओं ने पिछले 200 सालों में कभी ऑर्गेज़्म का अनुभव नहीं किया। अरब की महिलाओं ने प्यार के बगैर बस सेक्स से बच्चे पैदा किए।‘ तेजस्वी के इस पुराने ट्वीट की वजह से यूएई के नागरिक और भड़क गए।

कुवैत के एक वकील मेजबेल शरीका ने इस ट्वीट के स्क्रीनशॉट्स शेयर करते हुए लिखा कि भारतीय नेता ने अरब महिलाओं के बारे में नस्लीय और आपत्तिजनक टिप्पणी की है, जिससे अरब के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची है। ट्वीट वायरल होने के बाद लोगों ने तेजस्वी के खि़लाफ़ भारत सरकार से कार्रवाई की मांग की। विवाद बढ़ने पर तेजस्वी ने ये ट्वीट डिलीट कर दिया। कुवैत के वकील मेजबेल शरीका ने लिखा, ‘भारत एक विशाल आबादी वाला प्राचीन देश है और यहां सदियों से लोग धार्मिक और नस्लीय भेदभाव के बगैर शांतिपूर्वक रहते आए हैं। लोग भारत को विभिन्न धर्मों के बीच समन्वय वाले देश के तौर पर जानते हैं, प्लीज़ भारत की इस खूबसूरत छवि को ना बिगाड़ें।‘ इन सब विवादो के बीच ट्वीटर पर ‘‘सेन्ड हिन्दुत्वा बेक होम‘‘ ट्रेन्ड करने लगा।

इस तनावपूर्ण घटनाक्रम के बीच, भारतीय राजदूत को वहां रह रहे भारतीयों को सावधान करना पड़ा। भारतीय राजदूत ने अपने ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान का ज़िक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि कोरोना वायरस का कोई धर्म या नस्ल नहीं होता है। पिछले दिनो, यूएई में कोरोना वायरस महामारी से मुस्लिम समुदाय को जोड़ने वाली पोस्ट की वजह से कई भारतीयों के खि़लाफ़ कार्रवाई हुई है।

हालात की गंभीरता को देखते हुए आनन फानन में प्रधानमंत्री कार्यालय को अपने ट्वीटर से फौरन सफाई पेश करनी पड़ी और ट्वीटर पर लिखा कि भारत में किसी भी प्रकार से जाति लिंग व धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है। प्रधानमंत्री के साथ विदेश मंत्रालय को इन देशों के प्रमुखों से बातचीत भी करनी पड़ी।

लेकिन बात आगे निकल चुकी थी और कुछ अंधभक्तों की वजह से वहां काम कर रहे भारतीयों की नौकरियां ख़तरे में हैं। कई लोगों के वीज़ा कैंसिल कर दिए गए हैं। जिससे भारत की अर्थव्यवस्था और अधिक कमज़ोर होने का डर है। हम जानते हैं कि इस वक़्त इन मुस्लिम देशों में लगभग डेढ़ करोड़ भारतीय काम कर रहे हैं। इनमें 85 प्रतिशत गै़र-मुस्लिम हैं। देश को हर साल लगभग 90 बिलियन डाॅलर मतलब 6,93,000 करोड़ रूपये विदेशी विनिमय मुद्रा सिर्फ़ वर्कर्स की सैलरी और मज़दूरी के तौर पर हासिल होता है। इसमें 67 प्रतिशत सालाना मतलब 4,64,000 करोड़ रूपये विदेशी मुद्रा मुस्लिम दुनिया के इन पांच देशों सउदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, कुवैत, क़तर और बहरीन से हासिल होती है।

जबकि अमेरिका से केवल 17 प्रतिशत और इंग्लैंड से 5 प्रतिशत ही विदेशी विनिमय मुद्रा हासिल होती है। एक दिलचस्प बात यह भी है कि अमेरिका, इंग्लैंड में रहने वाले भारतीय वहीं रहने लगते हैं और अपने देश का सरमाया भी वहां लगा देते हैं। जबकि मुस्लिम दुनिया में पैसा कमाने वाले लोग एक-एक पैसा भारत भेजते है। ज़रा सोचिय की भारत के मुस्लिम देशों से कूटनीतिक रिश्ते ख़राब होने से यदि भारतीयों को वहां से निकाला जाता है तो देश जो पहले ही इस महामारी के क़हर से बेहाल है उसे आर्थिक तौर पर कितना नुकसान उठाना पड़ेगा? जिसकी भरपाई शायद आगे आने वाले वक़्त में हमारी चरमराई अर्थव्यवस्था के लिए बिलकुल भी मुमकिन न हो।

डीएमसी अध्यक्ष ज़फरूल इस्लाम खान गोदी मीडिया के निशाने पर

अभी यह मामले चल ही रहे थे कि कुवैत के द्वारा भारतीय मुसलमानों पर हो रहे नस्ली हमले के विरोध में एक पत्र जारी किया गया। जिसका ज़िक्र करते हुए दिल्ली अल्पसख्ंयक आयोग के अध्यक्ष ज़फरूल इस्लाम खान ने सोशल मीडिया पर अपने निजी विचार शेयर किए जिसमें उन्होंने कुवैत द्वारा भारतीय मस्लिमों के समर्थन के लिए धन्यवाद करते हुए कहा कि भारतीय मुसलमानों ने अपने खि़लाफ़ बढ़ती नफ़रत, लिंचिंग और दंगों की शिकायत कभी भी अरब या मुस्लिम दुनिया के देशों से नहीं की। यदि ऐसा किया गया तो नफ़रतबाज़ो के लिए तूफान खड़ा हो जाएगा। जिसके बाद गोदी मीडिया को एक और मुद्दा मिल गया और फिजूल का हंगामा बरपा करके रख दिया। जिसमें दिल्ली सरकार को भी घेरने की कोशिश की गई। जिसके बाद अगले ही दिन श्रीखान ने अपने फेसबुक पेज पर यह बात साफ की, कि वह किसी पार्टी से जुड़े नहीं है वह दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग में अध्यक्ष के पद हैं जोकि दिल्ली अल्पसंख्यक अधिनियम 1999 द्वारा अधिनियमित है। वह एक वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ साथ समाजिक कार्यकर्ता भी रहे हैं। जिनका समाज के लिए योगदान सराहनीय है। जिस प्रकार गोदी मीडिया उनके इस मामले को तूल देने की कोशिश् कर रहा है। अब तक के अपने निजि अनुभव से हम यह बात दावे से कह सकते हैं कि अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष ज़फरूल इस्लाम खान ने देश विरोधी कोई बात न की, न वह कभी कर सकते हैं।

अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट में भी भारत में अल्पसंख्यको पर जुल्म का दावा

इसी दौरान दुनियाभर में धार्मिक स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाली अमरीकी संस्था ने यूएस कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने साल 2020 के लिए अपनी सालाना रिपोर्ट जारी कर दी है। मीडिया रिपोर्टस के अनुसार इस रिपोर्ट में भारत को उन 14 देशों के साथ रखने का सुझाव दिया है जहां ‘कुछ खास चिंताएं‘ हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत उन देशों में शामिल है जहां धार्मिक अल्पसंख्यकों पर उत्पीड़न लगातार बढ़ रहा है।

2004 के बाद ये पहली बार है जब यूएससीआईआरएफ ने भारत को ‘कुछ ख़ास चिंताओं‘ वाले देशों की सूची में शामिल करने का सुझाव दिया है।‘

यूएससीआईआरएफ की उपाध्यक्ष नेन्डिन माएज़ा ने कहा, ‘भारत के नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी से लाखों भारतीय मुसलमानों को हिरासत में लिए जाने, डिपोर्ट किए जाने और स्टेटलेस हो जाने का ख़तरा है।‘ हालांकि, भारत ने यूएससीआईआरएफ की इस रिपोर्ट के दावों को ख़ारिज कर दिया है।

कोरोना महामारी में जहां पूरी दुनिया लाॅकडाउन में घरों में कै़द है। भारतीय पुलिस प्रशासन देश में नागरिकता क़ानून के विरोध में प्रर्दशन करने वाले समाजिक कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों व यूनिवर्सिटी के छात्र नेताओं को निशाना बना रही है। महामारी में सोशल डिस्टेंसिग का ख्याल प्रधानमंत्री से लेकर एक पुलिसकर्मी द्वारा तक रखा जा रहा है। लेकिन प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली दंगों की साज़िश का इल्ज़ाम लगाकर यूएपीए जैसे काले क़ानून के तहत जेल में ढूसा जाना कहा तक उचित है? जिसमें एक गर्भवती छात्रा तक को जेल की काल कोठरी डाल दिया गया है। महामारी के ऐसे समय में जबकि जेल प्रशासन इस महामारी के प्रकोप से बचाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कै़दियों को ज़मानत पर रिहा कर रहा है। यह कहां तक उचित क़दम हो सकता है? इस मामले में स्वराज इंडिया के प्रमुख प्रो. योगेन्द्र यादव ने तो यहां तक कह दिया कि ‘यह साज़िश की जांच नहीं, बल्कि जांच की साज़िश हो रही है।‘ जहां पूरी दुनिया इस महामारी से लड़ने और इसकी वजह से मरने वाले लोगों के शवों के क्रियाक्रम में युद्वस्तर पर लगी है। वहीं भारत में लोकतांत्रिक विरोध की आवाज़ों को दफन करने का काम किया जा रहा है।

जिस देश में लाॅकडाउन के चलते लाखों प्रवासी मज़दूरों को शहर से सैकड़ों किलोंमीटर पैदल चलकर अपने घरों को जाना पड़ा। सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति न होने की वजह से जहां भूंख से कई लोग अपनी जान गंवा बैठे हो इन ग़रीबों की आपबीती सुनकर कलेजा मुहं को आ जाए, वहां एक हैरतअंगेज़ बात इसी बीच यह हुई है कि मोदी सरकार ने ख़ामोशी से देश के पूंजिपतियों के कर्ज़े माफ़ कर दिए। भगोड़े मेहुल चोकसी से लेकर देशी बाबा से लाला बने रामदेव सहित पूजींपतियों के 68,607 करोड़ रूपये के कर्ज़ा माफ करके देश की अर्थव्यवस्था पर और बोझ बढ़ा दिया है।

कोरोना महामारी का असर लंबे समय तक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसी के सिलसिले में रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने भी कहा है कि लंबे लाॅकडाउन से लोखों भारतीय हाशिये पर चले जाएंगे। लोगों के पास खाना न होने की सूरत में अब इस तरह की ख़बरे आने लगी है कि लोग चोरी व लूटपाट करने को मजबूर है। रात के समय दुकानों में चोरी होने लगी हैं। अपराध बढ़ने का असर भारतीया अर्थव्यवस्था पर और भयानक स्थिति पैदा कर देगा। लिहाज़ा इस सिलसिले में तैयार रहने की ज़रूरत है।

हालाकि कोरोना वायरस को लेकर दुनियां संदेहों के घेरे में है और चीन बीच बीच में सफाई देने में जुटा है। चीन के वुहान शहर के प्रशासन ने अपने यहां कोविड-19 से मरने वालों की संख्या अचानक से 50 फीसदी बढ़ा दी। इसका साफ मतलब है कि शुरूवाती दिनों में जिस तरह से इस महामारी को छुपाने का काम किया गया उसी का नतीजा है कि यह महामारी अब इतनी गंभीर हो गई है और भारी संख्या में लोगों की जान ले रही है। हालांकि इस महामारी के फैलने में कुछ मीडिया रिपोर्टस में खुलासा कर यह बताया गया कि यह वायरस अमेरिका द्वारा फैलाया गया। रिपोर्टस में दावा किया गया कि सितंबर 2019 में चीन के वुहान में आर्मी के खेलों का आयोजन हुआ था। जिसमें कुछ अमेरिकी सैनिक जब अमेरिका वापस पहुंचे तो उन्हें फलु था बाद में पता चला कि वह सैनिक कोरोना से पीड़ित हुए थे। जो वुहान में वायरस लेकर गए।

दुनियाभर के देशों में लगभग 6.5 ट्रिलियन डाॅलर का नुकसान

नतीजतन चीन और इसके कथित गैरज़िम्मेदाराना रवैये पर शिकंजा कसा जाने लगा हैं। जिसके चलते द हेनरी जैकसन सोसायटी के मुताबिक़ दुनिया भर के देशों में कम से कम 6.5 ट्रिलियन डाॅलर मतलब 85,12,31,55,000 भारतीय रूपये का आर्थिक नुकसान हुआ है। क्योंकि लाॅकडाउन के चलते इंडस्ट्रीज़ और बाक़ी काम बंद है। ऐसे में चीन से पूरा हर्जाना वूसला जाया जाना चाहिए।

भारत को 9 लाख करोड़ रूपये का नुकसान

कोरोना महामारी के कारण भारत को भी देश में लाॅकडाउन की घोषणा करनी पड़ी। बार्कलेज़ बैंक की रिसर्च रिपोर्ट की माने तो लाॅकडाउन की वजह से इकोनाॅमी को 120 अरब डालर करीब 9 लाख करोड़ रूपये नुकसान हो सकता है।

अमेरिका ने किया मुकदमा

चीन पर अब ब्लेम गेम खेला जाने लगा है। अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ को दी जाने वाली आर्थिक मदद को रोक दिया है वहीं कोरोना वायरस फैलाने के लिए अमेरिका ने चीन पर 20 टिलियन डाॅलर का मुकदमा कर दिया है। अन्य देश भी चीन के खि़लाफ़ इसी प्रकार नुकसान की भरपाई के लिए क़ानूनी रास्ता अख्तियार करने की राह पर है।

हाईलाइट/बाक्स

आस्टेलियाई नेशनल यूनिवर्सिटी और किंग्ज़ काॅलेज लंदन में हुए अध्यन पर आधारित आॅक्सफेम के एक अनुमान के अनुसार 50 करोड़ और आबादी के गरीब हो जाने का ख़तरा बढ़ा है।

भारत के मुस्लिम देशों से कूटनीतिक रिश्ते ख़राब होने से यदि भारतीयों को वहां से निकाला जाता है तो देश जो पहले ही इस महामारी के क़हर से बेहाल है उसे आर्थिक तौर पर कितना नुकसान उठाना पड़ेगा? इसकी भरपाई शायद आगे आने वाले वक़्त में हमारी चरमराई अर्थव्यवस्था के लिए बिलकुल भी मुमकिन न हो।

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लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं व दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग सलाहकार समिती सदस्य हैं।

tvmedialive@gmail.com

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