मुस्लिम राजनीतिक चिंतन का  संक्रमण काल

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Muslim MPs- 2019

मिर्ज़ा शिबली बेग

एक समस्याग्रस्त समुदाय जिसकी राजनीतिक ,        सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक  एवं मानसिक समस्याओं का आरंभ 1757 में बक्सर की हार से होता है वह अपने राजनीतिक चिंतन एवं बोध के बाल काल से अभी तक बाहर नहीं निकल सकी हालांकि ढाई सौ साल से अधिक का समय गुज़र चुका है लेकिन इसकी समस्या ज्यों की त्यों है जो अब विशाल , विकट एवं विकराल रूप धारण कर चुकी है यह वह समुदाय है जिसने भारत पर लगभग एक सहशताब्दी सुचारू -सुव्यवस्थास्थित शासन किया । भारत को एक भौगोलिक – प्रशासनिक लड़ी में पिरोया वास्तव में वह भारत के भाग्य और भविष्य के विधाता थे वर्तमान भारत उन्हीं की भेंट है । आज यह समुदाय वर्तमान परिवेश में होने वाले राजनीतिक परिवर्तनों के प्रति विचलित तो है पर उदासीन है । उसका राजनीतिक चिंतन एवं बोध मूक – बाधिर है । उसने अपने आज को परिस्थितियों के हवाले कर दिया है आख़िर ऐसा क्यों ?

भारत में मुसलमानों का लोकतांत्रिक तरीक़े से अपनी मांगों को लेकर की गई जद्दोजहद का आरंभ ख़िलाफत मूवमेंट से होता है जिसमें विशेषकर मुस्लिम जनमानस तन- मन -धन से शरीक हुआ लेकिन ख़िलाफत की समाप्ति ने ऊर्जावान – समर्पित मुस्लिम नेतृत्व को मायूस और हौसलों को पस्त किया  । लेकिन यह  सर्व  स्वीकार  मत है कि इस आंदोलन ने देश को गांधी का नेतृत्व दिया ।

भारत में दूसरा मुसलमानों द्वारा किया गया मास मोबिलाइज़ेशन पाकिस्तान की मांग का आंदोलन था जो ख़िलाफत आंदोलन की नाकामी -समाप्ति के 20 वर्षों के बाद शुरू हुआ जिसका नेतृत्व भिन्न था जो अपने परिणाम के लिहाज से कामयाब रहा ।

भारत में तीसरा मुसलमानों का लोकतांत्रिक तरीक़े से किया गया मास मोबिलाइज़ेशन शाहबानो केस को लेकर था यह आज़ाद भारत में मुसलमानों का पहला मास मोबिलाइज़ेशन था जो देश की आज़ादी के 38 साल बाद हुआ इसमें ज़बरदस्त जनमानस लामबंद हुआ  इसका  उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की एक रणनीति थी प्रथम दृष्टया आंदोलन सफल रहा लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह प्रकट करते हैं कि आंदोलनकारियों का नेतृत्व सरकार के प्रति अनुनय -विनय और कुछ लो ,कुछ दो की नीति पर आगे बढ़ रहा था परिणाम स्वरूप ‘कुछ लो’ नीति के तहत संसद द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलट दिया गया जो ‘मुस्लिम नेतृत्व’ की मांग थी उसे मान लिया गया और ‘कुछ दो’ की नीति के तहत शिलान्यास पर सहमति  । उसी का परिणाम था  दिसंबर 1992 की घटना जिसने मुस्लिम मन पर बहुत गहरा आघात किया । नवंबर 2019 को आने वाली न्यायालय के निर्णय ने इस अध्याय को सदैव के लिए बंद कर दिया ।

इन आंदोलनों के बीच एक तत्व सामान था कि आंदोलन का प्रारूप नकारात्मक प्रतिक्रियावादी था जिसमें न ही अपने मुद्दे थे और ना ही अपना एजेंडा ,और ना ही अपनी प्राथमिकताएं ।

आज़ाद भारत के पहले सूर्योदय की पहली किरण एक लूटी पुटी , लहूलुहान , घायल मुस्लिम क़ौम को क्या अनुभूति दे सकती थी यह अभागी क़ौम कराह , पीड़ा , आघात के भीतराघात से अभी कहां ऊबरी थी इसका मन डूबा हुआ और मस्तिष्क लगभग शून्य था । ऐसे में मौलाना आज़ाद उठे उन्होंने सांत्वना दी , ढांढस बंधाया और हौसला दिया उनका यह योगदान अविस्मरणीय है जो सदैव याद रखा जाएगा उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए मौलाना आज़ाद का मुसलमानों पर इस बात के लिए ज़ोर देना कि वह अपनी अलग राजनीतिक पहचान के बजाय कांग्रेस में सम्मिलित हो जाएं ‘सामरिक दृष्टि’ से एक उचित निर्णय हो सकता है । परिणाम स्वरूप पुश्तैनी मुसलमानों की भांति पुश्तैनी कांग्रेसी भी होने लगे मुसलमानों ने कांग्रेस के प्रति अपनी वफादारी में कोई कसर  बाक़ी न रखी ।

कांग्रेस के प्रति मुसलमानों के इस समर्थन एवं समर्पण काल में मुसलमानों द्वारा दिया गया बिना शर्त समर्थन भी कांग्रेस के चित्र एवं चरित्र में कोई बदलाव नहीं ला सका जिस प्रकार आज़ाद भारत में कांग्रेस के अंदर मौलाना आजाद  उपेक्षित रहे उसी प्रकार उनकी क़ौम मुसलमान भी ।

समय और परिस्थितियां बदली लेकिन मुसलमान नहीं । जिसने उसे राजनीतिक समझ और चिंतन से दूर रखा । यही कारण है कि हमारे यहां इसकी कोई परंपरा नहीं पाई जाती है । कांग्रेस के प्रति मुसलमानों की वफादारी और समर्पण ने उन्हें लाभान्वित तो नहीं किया लेकिन हानि बहुत अधिक पहुंचाई । मुसलमानों का धार्मिक नेतृत्व तो स्वतंत्रा पूर्व से ही मोहन महात्मा के सम्मोहन में गिरफ्तार था और कांग्रेस के प्रति निष्ठावान ।

यही कारण है कि मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने अपने शेख़ मौलाना अशरफ अली थानवी की दृष्टि से महात्मा और कांग्रेस को देखने का प्रयास ही नहीं किया ।

जब जब मुसलमानों के भीतर किसी राजनीतिक चिंतन ने अंगड़ाई लेने का प्रयास किया तब तब कॉन्ग्रेस ने डांट डपट कर और धौसिया कर या प्रलोभन से उसे समाप्त कर दिया कांग्रेस ने मुसलमानों के भीतर राजनीतिक नेतृत्व को पैदा नहीं होने दिया यदि पैदा हो गया तो उभरने नहीं दिया यदि उभर गया तो कामयाब नहीं होने दिया  । उत्तर प्रदेश में डॉक्टर फरीदी एक उदाहरण है । विडंबना यह है कि हमारा धार्मिक नेतृत्व इस कार्य में सदैव से कांग्रेस का  सहयोगी रहा है

कांग्रेस की वास्तविकता जानने और उससे मोह भंग होने में मुसलमानों को कई दशक लग गए फलस्वरुप नई राजनीतिक शक्तियों का देश के पटल पर उदय हुआ जो घोषित मुस्लिम विरोधी विचारधारा की धुरी पर खड़ी थीं यह मुसलमानों के लिए बड़ी असमंजस की स्थिति थी जिसने कांग्रेस के लिए अवसर पैदा किया । लेकिन कांग्रेस मुसलमानों के प्रति अपनी पुरानी रविश से रेखा बराबर भी विचलित नहीं हुई दूसरी ओर कांग्रेस की कोख से जनित विभिन्न दलों का उदय हुआ जो कथित सेकुलर विचारधारा के चैंपियन के रूप में दिखाई पड़ते हैं वह क्षेत्रीय और राज्य स्तर पर सक्रिय थे मुसलमानों ने इन्हें मुक्तिदाता मान कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्वीकार किया हालांकि वोह यह भूल गए कि यह पृष्ठभूमि के लिहाज से कांग्रेसी विचारधारा और संस्कृति का क्षेत्रीय संस्करण थे जल्द ही इन दलों की कार्यशैली और आचरण ने इसका आभास भी करा दिया । स्थिति ये है कि मुसलमानों के धन और वोट के योगदान से सदन मे पहुंचे यह दल मुसलमानों के हितों के विरुद्ध जाने में तनिक भी संकोच नहीं करते  , धारा 370 और सिटीज़न बिल के पास कराने में मुस्लिम विरोधी मोदी सरकार के सहायक के रूप में कार्य कर रहे हैं

एक बार फिर मुसलमान  जनमानस असमंजस की स्थिति में है दिशाहीन उद्देश्यहीन , सिर्फ इतना चाहता है कि दिनचर्या में कोई विघ्न ना पड़े चमड़ी- दमड़ी पर आंच ना आवे । दूसरी ओर मुस्लिम नेतृत्व सत्ता पक्ष को आश्वस्त एवं संतुष्ट कर अपने लिए स्थान बनाने में सफल रहा यह वर्ग सदैव से अभ्यस्त रहा है और अपनी इस कला में निपुण ।

मुस्लिम नेतृत्व की इस सांठगांठ  की साझी संस्कृति ने मुसलमानों के अंदर पॉलीटिकल   कल्चराइज़ेशन  नहीं होने दिया  । मुसलमानों को कथित सेकुलर पार्टियों के लिए कच्चे माल के रूप में उपलब्ध कराया ।
पॉलीटिकल कल्चराइज़ेशन  ना होने के कारण आज मुसलमान धरना प्रदर्शन की कला से भी अनभिज्ञ हैं देते तो बहुत है लेकिन कैसे होते हैं  सब ही जानते हैं । शासन, प्रशासन ,व्यवस्था क्या होती है  ? उसकी मशीनरी कैसे काम करती है ? इसमें गड्ढे कहां कहां है ? हम अपने अधिकारों के लिए इस पर कैसे प्रभावी हो सकते हैं इसका ज्ञान नदारद ।

मुसलमानों में व्यक्तिगत रूप से बहुत से लोग जो व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं या हैं । वह जानते और समझते हैं लेकिन इसका ज्ञान सामुदायिक स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को कितना है प्रश्न यह है ?  हमारे यहां स्कूलिंग की कोई व्यवस्था नही है और ना ही कलचराइज़ेशन  की कोई परंपरा । और ना ही किसी के अंदर इसकी आवश्यकता का एहसास ।
यही कारण है कि मुसलमानों में राजनीतिक साहित्य नाम मात्र को भी नहीं पाया जाता जो पॉलिटिकल कलचराइ ज़ेशन में मददगार हो । विचार शून्यता की यह स्थिति उस समय है जब मुस्लिम राजनीतिक चिंतन एवं बोध अपने संक्रमण काल से गुज़र रहा है ।

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Begmirzashibli@gmail.com

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