सिक्ख, ईसाई, दलित को छोड सिर्फ़ पंडित ही क्यों कश्मीर से भागे ?

0

कश्मीर मे पंडित अपने कट्टर जातिवाद के चलते वहाँ के मुसलमानों से तो भेदभाव, हीनभाव व छुआछूत रखते थे, पर सिक्ख, ईसाई, दलित ओर ओबीसी से भी उतनी ही मात्रा मे हीनभाव रखते थे।

इसके चलते जब कश्मीर मे आतंकवाद ने दस्तक दी तो इसमें शामिल मुसलमानों के पहले टार्गेट यही जातिवादी पंडित हुए, जिन्होंने कश्मीरी मुसलमानों को जलील करने मे कोई कोर-कसर नहीं छोडी थी।

आप देख सकते है कि कश्मीर मे आतंकवाद के शिकार सिर्फ पंडित ही रहे हैं, ना कि सिक्ख, ईसाई, दलित, ओबीसी, क्योंकि वह भी मुसलमान की तरह पंडितों के कट्टर जातिवाद के शिकार थे, सो इन्होंने भी पंडितों को मारने और भगाने में मुसलमानों का भरपूर साथ-सहकार दिया। जिसके चलते कश्मीर मे सिक्ख, ईसाई, दलित, ओबीसी पर आतंकवादी वारदाते न के बराबर हुई और आज भी कश्मीर मे सिक्ख, ईसाई, दलित, ओबीसी मुसलमान एक दुसरे के साथ मिलजुल कर भाईचारे से रहते हैं।

आज अगर भारत का मीडिया और RSS-BJP कश्मीरी पंडितों के मुद्दे को इतना जोरो-शोर से हवा दे रही हैं तो इसका सिर्फ एक ही कारण हैं कि मीडिया ब्राह्मणवादी हैं ओर RSS-BJP ब्राह्मण की मातृ व पितृ संस्थायें हैं जो कश्मीर मे अपने ब्राह्मण भाईयों पे हुई ज्यादती का बदला इस तरह से इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देकर मुसलमानों से ले रहे हैं।

आर्यो के आने से पहले भारत मे वर्णव्यवस्था नहीं गणव्यवस्था थी. कुछ इतिहासकारो का मानना है कि विदेशी आर्य ब्राह्मण आने से पहले यहाँ भारत में ‘गण व्यवस्था’ आधारित राज्य शासन व्यवस्था थी. जनसमूह को ही गण कहा जाता था. जन ‘गण व्यवस्था’ द्वारा यहाँ के मूलनिवासी लोग संगठित एवम् समृद्ध थे.

आज से करीब 3500 साल पहले विदेशी आर्य ब्राह्मण ने ईरान से सिंधुघाटी के नगरो पर आक्रमण किया था. चालाक विदेशी आर्य ब्राह्मण ने यहाँ के मूलनिवासी को विभाजित करने हेतु उनकी ‘गण व्यवस्था’ को ख़त्म करने के लिए षड़यंत्र रूपी ‘वर्ण व्यवस्था’ ईश्वर एवम् धर्म के नाम काल्पनिक कथाओं के माध्यम से आहिस्ता आहिस्ता लागु की. एक समय ऐसा आया कि विदेशी आर्य ब्राह्मण की षड्यंत्रकारी ‘वर्ण व्यवस्था’ के प्रभाव से भारत के मूलनिवासीयों की ‘गण व्यवस्था’ टूटने लगी.

इस आदि ‘गण व्यवस्था’ को बचाने के लिए और विदेशी आर्य ब्राह्मण की षड्यंत्रकारी एवम् विभाजनकारी ‘वर्ण व्यवस्था’ को हटाने के लिए काफी लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा, आज भी वो ही संघर्ष जारी है.भारत में करीब 3500 साल पहले ‘गण व्यवस्था’ में संगठित रहनेवाले मूलनिवासी लोग आक्रमणकारी विदेशी आर्य ब्राह्मण की षड्यंत्रकारी एवम् विभाजनकारी क्रमिक असमतावादी ‘वर्ण व्यवस्था’ में फसकर अपना सच्चा और समृद्ध इतिहास भूलकर ब्राह्मणवादी ‘वर्ण व्यवस्था’ के गुलाम बन गए है.विश्व में यह सिलसिला चलता ही आया है कि जो लोग अपना सच्चा इतिहास भूल जाते है, वो कभी भी अपना सच्चा इतिहास नहीं बना पाते, और पीढ़ी दर पीढ़ी गुलाम बने रहते है।

साभार:तीसरी जंग

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here