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हाउडी मोदीः भारत की स़मस्याओं से किनारा करने की कोशिश

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-राम पुनियानी

नरेन्द्र मोदी ने अमरीका के ह्यूस्टन में डोनाल्ड ट्रंप की उपस्थिति में जबरदस्त नौटंकी की। वहां मौजूद लगभग पचास हजार लोगों ने दोनों नेताओं के जयकारे लगाए। दोनों ने एक-दूसरे की तारीफ की और दोनों ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ और पाकिस्तान को कोसा। यह सच है कि पश्चिम एवं दक्षिण एशिया में आतंकवाद ने अपने क्रूर पंजे फैला लिए हैं। ‘इस्लामिक आतंकवाद’ के नाम पर उन्माद तो भड़काया जा रहा है परंतु यह भुला दिया गया है कि इस्लामिक आतंकवाद के बीज, अमरीका ने ही बोए थे। अमरीका ने मुस्लिम युवकों के दिमाग में जहर भरने के लिए पाठ्यक्रम तैयार किया। पाकिस्तान में स्थापित मदरसों के माध्यम से इस्लाम के प्रतिगामी संस्करण का प्रचार-प्रसार किया गया। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर काबिज सोवियत सेना से लड़ने के लिए मुजाहिदीन तैयार किए। धर्मोन्मादी मुजाहिदीनों की सेना तैयार करने पर अमरीका ने 800 करोड़ डालर खर्च किए। इन मुजाहिदीनों को सात हजार टन हथियार और असला उपलब्ध करवाए गए। अमरीका ने इन आतंकवादियों का प्रयोग अपने फायदे के लिए किया और अब वह ऐसा बता रहा है मानो वह हमेशा से आतंकवाद के खिलाफ रहा हो। हिलेरी क्लिंटन के शब्दों में अमरीकी सरकार का नजरिया यह था कि, ‘‘उन्हें (मुजाहिदीन) सऊदी अरब और अन्य देशों से आने दो, उन्हें वहाबी इस्लाम का आयात करने दो ताकि हम सोवियत संघ को पछाड़ सकें’’।

अमरीका में हुए जबरदस्त जलसे के समानांतर कई घटनाएं हुईं। मीडिया, मोदी के कार्यक्रम में भारतीयों की भारी भीड़ उमड़ने के बारे में तो बहुत कुछ कह रहा है परंतु इससे जुड़ी कई अन्य घटनाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, मोदी की नीतियों के विरोध में जो प्रदर्शन वहां हुए उनकी कोई चर्चा नहीं हो रही है। अमरीका में रह रहे भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू राष्ट्रवाद का समर्थक और मोदी भक्त है। परंतु वहां के कई भारतीय, भारत में मानवाधिकारों की स्थिति और प्रजातांत्रिक अधिकारों के साथ हो रहे खिलवाड़ से चिंतित भी हैं। डेमोक्रेट नेता बेरनी सेंडर्स ने अपने ट्वीट में कहा कि भारत में धर्म स्वातंत्र्य और मानवाधिकारों पर हो रहे हमलों को नजरअंदाज कर ट्रंप, मोदी का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘जब धार्मिक उत्पीड़न, दमन और निष्ठुरता पर डोनाल्ड ट्रंप चुप रहते हैं तो वे पूरी दुनिया के निरंकुश नेताओं को यह संदेश देते हैं कि तुम जो चाहे करो तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा’’। मोदी ने अपने लंबे भाषण में जो कुछ कहा उसका लब्बोलुआब यही था कि भारत में सब कुछ एकदम ठीक-ठाक है।

मोदी यह तब कह रहे हैं जब पूरे कश्मीर सहित भारत के अनेक इलाकों में रहने वाले भारतीयों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। आखिरी पंक्ति में खड़े उस आखिरी व्यक्ति – जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अत्यंत प्रिय था – से मोदी को कोई लेनादेना नहीं है। यद्यपि अधिकांश दर्शकों ने मोदी का भाषण बिना सोचे-विचारे निगल लिया परंतु स्टेडियम के बाहर बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शनकारियों ने मोदी राज में देश की असली स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करवाने का प्रयास किया।

विरोध प्रदर्शनकारियों में से एक, सुनीता विश्वनाथन, की टिप्पणी अत्यंत उपयुक्त थी। सुनीता विश्वनाथन, ‘हिन्दूज फॉर ह्यूमन राईटस’ की सदस्य हैं। यह संस्था अनेक संगठनों के गठबंधन का हिस्सा है। इस गठबंधन का नाम है ‘अलायेंस फॉर जस्टिस एंड एकाउंटेबिलटी’। सुनीता ने कहा कि हम यह देखकर अत्यंत व्याकुल और चिंतित हैं कि वसुधैव कुटुम्बकम की शिक्षा देने वाले हमारे धर्म को ऐसे अतिवादियों और राष्ट्रवादियों ने अपह्त कर लिया है जो मुसलमानों की लिंचिंग कर रहे हैं, प्रजातंत्र को रौंद रहे हैं, कानून-व्यवस्था का मखौल बना रहे हैं और अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों को गिरफ्तार कर रहे हैं और यहां तक कि उनका कत्ल भी करवा रहे हैं…। इन दिनों कश्मीरी लोग जो भुगत रहे हैं उसका हमें बहुत क्षोभ है। देश में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिजन्स (एनआरसी) के नाम पर 19 लाख लोगों को राज्य-विहीन कर दिया गया है।‘’

आज यह समझना मुश्किल हो गया है कि भारत आखिर किस दिशा में जा रहा है। हमारे प्रधानमंत्री अमरीका में जश्न मना रहे हैं जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था गड्ढ़े में जा रही है। लाखों श्रमिकों को अपनी आजीविका से हाथ धोना पड़ा है। आम लोग सरकार की नीतियों से पीड़ित हैं। सरकार को उनकी कोई चिंता नहीं है। सरकार के लिए तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और एनआरसी जैसे मुद्दे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। चर्चा है कि पूरे देश में एनआरसी  और समान नागरिक संहिता लागू किए जाएंगे।

पिछले कुछ वर्षों में सरकार की प्राथमिकताओं और नीति निर्माण की दिशा में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। हमारे गणतंत्र के शुरूआती सालों में हमने उद्योगों, विश्वविद्यालयों और विशाल बांधों से देश की नींव रखी। इसके पीछे सोच यही थी कि नागरिकों की आजीविका सबसे महत्वपूर्ण है। उन नीतियों के क्रियान्वयन में भले ही कमियां रहीं हों परंतु उनकी दिशा ठीक थी। उन नीतियों के कारण देश का औद्योगिक और कृषि उत्पादन बढ़ा, साक्षरता दर में सुधार आया, स्वास्थ्य संबंधी सूचकांक बेहतर हुए और देश की आर्थिक प्रगति हुई। उस समय पहचान से जुड़े मुद्दों को हाशिए पर रखा गया और उन्हें देश की नीतियों की दिशा को प्रभावित नहीं करने दिया गया। उस समय अधोसंरचना के विकास के चलते ही आज भारत वैश्विक आर्थिक शक्ति बन सका है। परंतु पिछले कुछ सालों से देश की दिशा बदल गई है। अब सरकार जनता की अभिभावक नहीं रह गई है। उसे इस बात से कोई लेनादेना नहीं है कि लोगों की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो रही हैं या नहीं, बल्कि वह उन क्षेत्रों से हट रही है जो जनता की ज़रूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

राममंदिर आंदोलन को सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंची भाजपा का यह दावा रहा है कि वह ‘पार्टी विथ ए डिफरेंस’ है। और अब तो सभी मान रहे हैं कि वह सचमुच ही एक अलग तरह की पार्टी है। हिन्दू राष्ट्रवाद उसका नीति निर्धारक और पथप्रदर्शक है। इस तरह का राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान और अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा की भावना पर जिंदा रहता है। इससे जो ध्रुवीकरण होता है वह पूरी दुनिया में राष्ट्रवादी पार्टियों की चुनावों में मदद करता है। हाउडी मोदी जैसे कार्यक्रमों के शोर के बीच हम आम भारतीयों की समस्याओं की ओर देश का ध्यान कैसे आकर्षित करें, यह आज हमारे समक्ष उपस्थित सबसे बड़ा प्रश्न है। (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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विडंबनाओ से भरा आज का भारत

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– नेहा दाभाडे

“इस सरकार (की दूसरी पारी के पहले 100 दिनों) ने देश में विकास, विश्वास और बड़े परिवर्तनों का सूत्रपात किया है,” यह दावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल में किया. कितने लोग इससे सहमत होंगे, यह कहना कठिन है.

भारत इस समय एक दोराहे पर खड़ा दिख रहा है. एक और असुरक्षा, भय और चिंता का वातावरण है तो दूसरी ओर है राष्ट्रवादी जूनून, एक नया आत्मविश्वास और राजनीतिक नेतृत्व के त्वरित और कड़े निर्णय लेने की क्षमता पर गर्व का भाव. ऐसा लग रहा है जैसे कश्मीर से धारा 370 का हटाया जाना कोई बहुत बड़ी जीत या उपलब्धि हो. यह विजय भाव विडम्बनापूर्ण ही कहा जा सकता है क्योंकि राज्य में लगभग एक महीने से सब कुछ बंद है. इस बीच, एक युवक की पेलेट लगने से मौत और सेना द्वारा 11 साल के बच्चे को हिरासत में लेने जैसी घटनाएं वहां हो रहीं हैं. देश के अन्य हिस्सों में रह रहे कश्मीरी, अपने परिवारों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं. जहाँ वे रह रहे हैं, वहां उन्हें नफरत की निगाहों से देखा जा रहा है. गायक आदिल गरोजी को हाल में मुंबई में अपना अपार्टमेंट खाली करने को कहा गया.

नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स (एनआरसी) की अंतिम रपट के प्रकाशन के बाद, असम के लगभग 19 लाख नागरिकों पर राज्य-विहीन हो जाने का खतरा मंडरा रहा है. यह पूरी प्रक्रिया ही दोषपूर्ण थी. सरकार, राज्य में दस और नजरबंदी शिविर बनाने की तैयारी कर रही है. पहले से चल रहे शिविरों में कई मौतें हो चुकी हैं और एनआरसी से बाहर कर दिए गए अनेक लोग आत्महत्या कर चुके हैं. एनआरसी से जिन लोगों के नाम गायब हैं, उनमें हिन्दू, राज्य के मूल निवासी और मुसलमान शामिल हैं. इस बहुत खर्चीली कवायद से भाजपा सहित कोई खुश नहीं है. भाजपा, नागरिकता संशोधन विधेयक को पारित करने पर जोर दे रही है ताकि हिन्दू प्रवासियों को नागरिकता मिलना आसान हो सके.

इस बीच, एक भीषण आर्थिक संकट ने देश को जकड़ लिया है. अर्थव्यवस्था थम सी गई है और ऑटोमोबाइल व कृषि क्षेत्र गहरे संकट में हैं. यद्यपि आर्थिक संकट के लिये कई कारकों को दोषी बताया जा रहा है परंतु आर्थिक विशेषज्ञों का एक बड़ा तबका नोटबंदी को इसके लिए ज़िम्मेदार बता रहा है. नोटबंदी ने लघु उद्योगों को भारी नुकसान पहुँचाया और बेरोजगारों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि की. हाल में सरकार ने रिज़र्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ रुपये लिए हैं.  सरकार ने यह नहीं बताया है कि वह इस भारी धनराशि का क्या उपयोग करना चाहती है.

आज के हालात को हम किस रूप से देखें? सरकार गंभीरता से सोच-विचार किये बगैर आक्रामक निर्णय ले रही है. संयम को कमजोरी माना जा रहा है और संवैधानिक प्रतिबंधों का पालन करने को साहस का अभाव. इस तरह के मनमानीपूर्ण निर्णयों का क्या प्रभाव पड़ेगा, यह तो भविष्य ही बताएगा.

आज तो ऐसा लगता है कि भारत में प्रजातान्त्रिक संस्थाए ढह रही हैं और संवैधानिक प्रावधानों को नजरअंदाज किया जा रहा है. नेतृत्व के बहुत से निर्णयों से बहुसंख्यकवाद की बू आ रही है. इस बहुसंख्यकवाद में ना तो व्यक्तियों के आधिकारों का सम्मान है और ना ही विविधता का.

बहुसंख्यकवाद, बल प्रयोग को औचित्यपूर्ण मानता है और पूर्वाग्रहों व नफरत की खाद पर फलता-फूलता है. आज हममे से ऐसे कितने लोग हैं जो किसी दलित या मुसलमान की लिंचिंग की खबर सुनकर विचलित होते हैं? क्या ऐसी घटनाएं हमे आम और सामान्य नहीं लगने लगीं हैं?

ये स्थितियां निश्चित रूप से चिंताजनक और निराशाजनक हैं. तो क्या हम हताश हो जाएं? क्या हम यह मान लें कि निराशा की अँधेरी सुरंग में आशा की कोई किरण नहीं है? क्या इस देश ने प्रजातंत्र को अलविदा कह दिया है? इन प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट नहीं है.

देश में प्रजातंत्र, विविधता के लिए सम्मान, सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता मरी नहीं हैं. इसका सुबूत है कई छोटी-छोटी घटनाएं.

सरकार की नीतियों और निर्णयों और पहचान की राजनीति के चलते समाज का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण हो रहा है. नफरत, ऊंच-नीच और श्रेष्ठताभाव के बोलबाले के कारण भारत के विभिन्न समुदायों के बीच सदियों से चले आ रहे सौहार्द्रपूर्ण रिश्तों में ज़हर घुल गया है.

इस सबके बावजूद, असम के नौगाँव में हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों ने पुरानी गुदाम मस्जिद की मीनार को संरक्षित करने के लिए स्थानीय अधिकारियों से संपर्क किया. हाईवे को चौड़ा करने के लिए मस्जिद को गिराया जाना था. मीनार को उसके मूल स्थान से 70 फीट दूर खड़ा कर दिया गया. वह सुरक्षित है.

मुज्जफरनगर के इलेक्ट्रीशियन, मोहम्मद महमूद, 77, कुम्भ मेले के प्रसिद्ध जूना अखाड़ा के टेंटों में बिजली का काम कई बरसों से देख रहे हैं. महमूद का कहना है कि टेंटों को रोशन करने से उन्हें आध्यात्मिक संतोष का अनुभव होता है और वे साधुओं से बहुत कुछ सीखते हैं. उन्हें मेला स्थल पर नमाज़ अदा करने के लिए जगह दी गयी है और उनका खाना-पीना साधुओं के साथ ही होता है.

इस तरह के उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि हमारे देश में आज धार्मिक जुलूसों के रास्ते और आराधना स्थलों के बाहर बाजे बजाने जैसे मामूली मुद्दों पर सांप्रदायिक हिंसा हो जाती है. इस पृष्ठभूमि में बिहार के नालंदा जिले के मढ़ी गाँव का उदाहरण अत्यंत प्रेरणादायक है. गाँव में एक भी मुसलमान परिवार नहीं है. विभिन्न कारणों से मुसलमान अन्य स्थानों में रहने चले गए हैं. परन्तु इसके बाद भी, स्थानीय निवासी गाँव की मस्जिद की देखभाल कर रहे हैं. वे मस्जिद में सुबह-शाम प्रार्थना करते हैं और पेनड्राइव की मदद से अज़ान भी देते हैं. पवित्र अवसरों पर और किसी समस्या का सामना होने पर वे मस्जिद में प्रार्थना भी करते हैं.

मुंबई के गोवंडी में तीन साल से एक ही पंडाल में गणेश उत्सव और मुहर्रम और पांच साल से नवरात्रि और मुहर्रम मनाया जा रहा है. दोनों समुदायों के लोग एक ही माइक्रोफोन और लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करते हैं. अलग-अलग धार्मिक समुदायों के सदस्यों द्वारा एक-दूसरे की मदद करने के तो असंख्य उदाहरण हैं. मुंबई में एक मुस्लिम और एक हिन्दू महिला ने एक-दूसरे के पतियों को अपनी किडनी दान कीं.

इस तरह के उदाहरण बताते हैं कि देश में अब भी प्रेम, करुणा और शांति के पैरोकार हैं. परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम योजनाबद्ध तरीके से भड़काई जा रही हिंसा और फैलाई जा रही नफरत जो भुला दें. देश में मीडिया, पाठ्यपुस्तकें और राजनेता, साम्प्रदायिकता, घृणा, पूर्वाग्रह और भ्रम फैला रहे हैं. इसी के नतीजे में नफरत से उपजे अपराध बढ़ रहे हैं और इन अपराधों में लिप्त लोग स्वयं को कानून से परे समझ रहे हैं. इस तरह की घटनाओं से किसी भी प्रजातान्त्रिक समाज की आत्मा झुलस जानी चाहिए थी और सम्बंधित व्यक्तियों को त्वरित और कड़ी सजा मिलनी चाहिए थी. दुर्भाग्यवश, ऐसी घटनाओं की न तो पर्याप्त निंदा हो रही और ना ही उनके खिलाफ सामूहिक आवाज़ उठाई जा रही है. जो उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष लोग इस नफरत के खिलाफ बोलते हैं उन्हें ट्रोल किया जाता है और गलियां दी जातीं हैं. हिंसक राष्ट्रवाद, स्वीकार्य हो चला है.

इन हालातों में यह ज़रूरी है कि हम आम लोगों, और विशेषकर युवाओं, तक पहुंचें और एक वैकल्पिक विमर्श का प्रस्ताव करें – एक ऐसे विमर्श का जो प्रेम व विविधता के लिए सम्मान और समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हो. नागरिक समाज के कुछ सदस्यों ने इस दिशा में मुंबई और देश के अन्य स्थानों में ज़मीनी स्तर पर काम शुरू किया है. इसका एक उदहारण है मुंबई का एक संगठन – ‘इंडियन मुस्लिम्स फॉर डेमोक्रेसी’. इस समूह ने मुसलमानों के बारे में मिथ्या धारणाओं और उनके बहिष्करण का मुकाबला करने के लिए मुस्लिम समुदाय किस तरह अन्य समुदायों के मिलकर प्रयास कर सकता है और किस प्रकार वह प्रजातान्त्रिक संस्थाओं और ढांचे को संरक्षित करने में अपने योगदान दे सकता है इस पर चर्चा और विचार-विमर्श का सिलसिला शुरू किया है. यह पहल समुदाय के अखलाकों के ज़रिये की जा रही है. ईद-उल-जुहा की पूर्वसंध्या पर इस संगठन ने एक अपील जारी कर मुसलमानों से कहा था कि वे इस त्यौहार को इस तरह से मनाएं जिससे उनके पड़ोसियों को कोई तकलीफ न हो. संगठन यह मानता है कि देश में मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है और उनका दानवीकरण किया जा रहा है. परन्तु इसके साथ-साथ, वह यह भी स्वीकार करता है कि मुसलमानों की कुछ परम्पराओं और विश्वासों पर पुनर्विचार किये जाने की ज़रुरत है. इस संगठन को यह अहसास भी है कि मुद्दा सिर्फ मुसलमानों के साथ भेदभाव और उन्हें बदनाम करने का नहीं हैं. यह, दरअसल, एक व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसका अंतिम लक्ष्य प्रजातान्त्रिक सिद्धांतों और संस्थाओं को कमज़ोर करना है. और यह उन सभी नागरिकों के लिए खतरे की घंटी है जो नफरत और युद्धोन्मादी नस्लीय राष्ट्रवाद की वर्चस्ववादी विचारधारा को ख़ारिज करते हैं.

इसी तरह की पहल, मुंबई के एक अन्य समूह, ‘सिटीजन्स फॉर कान्सटीट्यूशन’ ने की है, जो कि ईसाई और अन्य शांतिप्रिय नागरिकों का संगठन है. इस संगठन ने मुंबई में 2 सितम्बर 2019 को ‘चैलेंजिस टू अवर नेशन’ विषय पर एक बैठक का आयोजन किया. इस बैठक में और अधिक एकाधिकारवादी होती जा रही सरकार और हाशियाकृत समुदायों के हिस्से में आये भय और असुरक्षा के भाव पर गहन चिंता व्यक्त की गयी. बैठक में इस बात पर भी आक्रोश व्यक्त किया गया कि संविधान और उसके प्रावधानों को परे रख, सरकार, आम लोगों को उनके अधिकारों से वंचित कर रही है. इस स्थिति से निपटने के लिए जिस कार्ययोजना का प्रस्ताव बैठक में किया गया उसमें शामिल हैं शैक्षणिक संस्थाओं में ऐसे पाठ्यक्रम लागू करना जिनसे विद्यार्थियों को अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं के सम्बन्ध में व्याप्त पूर्वाग्रहों से परिचित करवाया जा सके. प्रस्ताव में व्यापक समाज में संविधान और उसमें निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाने की बात भी कही गयी. संविधान पर जोर दिया जाना इसलिए ज़रूरी है ताकि लोगों को यह समझाया जा सके कि शासन व्यवस्था के विभिन्न अंगों को उनकी शक्तियां और अधिकार संविधान से मिलती है ना कि किसी पद विशेष पर बैठे हुए व्यक्ति या किसी संगठन से. दूसरे, भारत जैसे प्रजातान्त्रिक और विविधतापूर्ण समाज मे, शासन में धर्म की कोई भूमिका नहीं हो सकती और तीसरे, कि संवैधानिक प्रावधानों के अधीन रहते हुए, सभी नागरिकों को अपने-अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.

इसी तरह के अन्य प्रयासों में शामिल हैं अनहद की ‘बातचीत’, जिसके अंतर्गत भारतीय संस्कृति की उन उदारवादी परम्पराओं पर चर्चा की जाती है जो आज भी आम जनजीवन में जीवित हैं और जिन्हें वर्चस्वशाली विमर्शों द्वारा तोड़ने-मरोड़ने और कमज़ोर करने के प्रयास किये जा रही हैं. ‘बातचीत’ में सूफी और भक्ति परम्पराओं और उनके कबीर जैसे पैरोकारों पर चर्चा की जा चुकी है. साथ जी, भारत की साँझा संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन में उसकी भूमिका पर भी बात हो चुकी है. प्रयास यही है कि लोगों को भारत की साँझा धार्मिक परम्पराओं और संस्कृति से परिचित करवाया जाये और उन्हें यह बताया जाये कि इसका विकास सैकड़ों वर्षों में सभी समुदायों के योगदान से हुआ है. भारत में ऐसे अनेक संत-चिन्तक हुए हैं जिन्होंने यह साबित किया है कि भारत का समाज और उसकी संस्कृति, देश की मिलीजुली परम्पराओं की वाहक हैं.

कुल मिलकर, लक्ष्य यही है कि भारत की जनता को उसकी मिलीजुली संस्कृति और राष्ट्रवाद से परिचित करवाया जाये और उसे यह बताया जाए कि प्रेम, समानता और सभी को स्वीकार करना हमारी सभ्यता का हिस्सा रहा है और यह भी की यह देश हर धर्म, हर जाति और हर वर्ग के लोगों का है.

प्रसिद्ध संत-चिन्तक  बसवन्‍ना की ये पंक्तियाँ हम सब के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हो सकती हैं:

दिन-रात मुझे यह न सुनने दो की किसका, किसका, है यह आदमी

मुझे सुनने दो कि, मेरा, मेरा, मेरा है यह आदमी

हे आपस में मिलने वाली नदियों के स्वामी, मुझे ऐसा महसूस होने दो कि मैं इसी घर का बेटा हूँ’

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(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित) 

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक छात्र डॉ शोएब अहमद से आपकी मुलाक़ात कराता हूँ

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रवीश कुमार

आज सर सैय्यद डे है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए बड़ा दिन है। इसके छात्र अपने संस्थापक को चाहत से याद करते हैं। वो अपने वजूद में उनके वजूद को भी जोड़ते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पुराने छात्रों के इतने शहरों में संगठन हैं कि उन सभी के प्रोग्राम के लिए हां कर दीजिए, आप दो तीन साल तक घर ही नहीं लौटेंगे। मैं इस साल अटलांटा गया था। वहां 73 साल के हसन कमाल से बात हुई। जितने दिन उनके साथ रहा, वे बस अलीगढ़ के नए छात्रों की मदद और मुल्क की बेहतरी की बात करते रहे। बात कोई भी होती थी वे घूम फिर कर आ जाते थे कि कैसे वहां के मीडिया के छात्रों को अच्छी किताबें दी जाए। बेहतरीन ट्रेनिंग दी जाए। टोकने पर भी कह देते थे कि आप समझते नहीं हैं। वक्त बहुत कम है। अच्छी तालीम देनी होगी। यह हमारा भी फर्ज़ है।

अलीगढ़ के छात्रों को पता भी है या नहीं कि उनके लिए कोई हसन कमाल साहब इतना सोचते हैं। उनके कारण कुछ ऐसे ही जुनूनी लोगों से मुलाक़ात हुई जो अपने छात्रों की हर संभव मदद के लिए बेताब थे। पैसे और हुनर दोनों से मदद करने के लिए। हसन कमाल वैसे तो बेहद ख़ूबसूरत भी हैं और इंसान भी बड़े अच्छे। अपने काम करने की शहर के चप्पे चप्पे से जानते हैं जैसे कोई अलीगढ़ का छात्र अपने शहर की गलियों को जानता होगा। उनकी मुस्तैदी का क़ायल हो गया। हाथ में एक घड़ी पहन रखी है। आई-फोन वाली। कदमों का हिसाब रखते हैं। शायद इसीलिए फिट भी हैं।

मुझे लगता है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को हमेशा यूपी की राजनीति से पैदा हुई छवियों के दायरे में रखकर देखा जाता है। उस राजनीति के जवाब में यह यूनिवर्सिटी भी वैसी ही दिखने लग जाती है। जबकि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। अलीगढ़ के छात्रों को अपनी मेहनत और ईमानदारी पर भरोसा रखना चाहिए। यूपी के एक कस्बे में बनी यूनिवर्सिटी के छात्रों की उपलब्धियां किसी भी यूनिवर्सिटी से ज़्यादा हैं। जिस यूपी में कोई यूनिवर्सिटी नाम लेने लायक नहीं बची है, यह बड़ी बात है कि उसके छात्र हर पल अलीगढ़ को याद करते हैं। अलीगढ़ को जीते हैं। एक बार आप इनके कार्यक्रम में चले जाइये। आपके भीतर ये अलीगढ़ भर देंगे। वहां के कमरे, वहां के खाने, वहां की बदमाशियां और लतीफें। .यादें हैं मगर बातें लाइव टेलिकास्औट की तरह करते हैं।

शायद ही कोई ऐसा हो तो ख़ुद को मज़ाज या ग़ालिब का उस्ताद न समझता हो। हर बात में शायरी। मुझे लगता है कि अलीगढ़ ने अपने छात्रों की उपलब्धियों को ठीक से संजोया नहीं। तो इसकी शुरूआत मैं करता हूं। इस बार न सही, अगली बार जब आप सर सय्यद डे मनाएं तो इसके छात्रों की उपलब्धियों को याद करें।

डॉ शोएब अहमद। 1984 में रामपुर से स्कूल की पढ़ाई कर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे। वहां बायोकेमिस्ट्री में मास्टर किया। उसके बाद Industrial Toxicology Research Centre, लखनऊ से एम फिल की। फिर ब्रिटेन चले गए र कार्डिफ में वेल्स कॉलेज ऑफ मेडिसिन से पीएचडी की। इसके बाद यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना, लास एंजेलिस से पोस्ट डॉक्टरल की पढ़ाई की। इस तरह रामपुर से निकला एक लड़का 1984 से 2003 तक पढ़ाई की अपनी यात्रा तय करता है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने पांच साल के दौरान उन्हें केमिस्ट्री और बायो केमिस्ट्री में इतना दक्ष कर दिया कि वे दो और मुल्कों की यूनिवर्सिटी में अपना रिसर्च कर सके। उसके बाद दस साल अटलांटा में Emroy University School of Medicine में पढ़ाया। लेकिन कम बोलने वाले शोएब अहमद के भीतर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी इस तरह बसी है जैसे कल ही निकले हों। यही अलीगढ़ है। आपके भीतर से निकलता नहीं है।

डॉ शोएब इस वक्त MyGenomics नाम से अपनी कंपनी चलाते हैं। कैंसर की स्क्रीनिंग करते हैं। दुनिया भर से सैंपल आता है और वे जांच कर बताते हैं कि किसी को कैंसर होने की कितनी आशंका है। चांस है। यानि अब अपना काम करते हैं। हम अमरीका या बाहर गए लोगों की कामयाबी को पैसे से आंकते हैं। अगर आपने ऐसा किया तो डॉ शोएब की यात्रा को समझने में ग़लती कर जाएंगे। फोटोग्राफी का शौक़ रखते हैं। इनकी कार की डिक्की में अच्छे कैमरे रखे हैं। ड्रोन कैमरे का सेटअप है। हमें अपनी कार से अटलांटा के एक गांव ले गए। ड्रोन कैमरे को आज़मा रहे थे और फोटोग्राफी पर लेक्चर दे ही रहे थे कि ट्रैक्टर दौड़ाते हुए किसान आ गया। एकबार के लिए लगा कि हम शामली में घिर गए हैं! पर ख़ैर।

डॉ शोएब के साथ कुछ घंटे बिताने का मौक़ा मिला। उनकी पूरी बातचीत इसी में ख़त्म हो गई कि मुल्क की बेहतरी कैसे होगी। वो हिन्दुस्तान को बेहद प्यार करते हैं। अपनी यूनिवर्सिटी के छात्रों को नए दौर के रिसर्च से जोड़ना चाहते हैं। रामपुर और अलीगढ़ में घूम-घूम कर खाने की आदत लगी होगी इसलिए उन्हें ख़ूब पता था कि अटलांटा का लोकल खाना-पीना क्या है। यह किसी भी यूनिवर्सिटी के लिए गर्व की बात है कि उनके छात्रों के लिए 25 साल पहले निकला छात्र दिन-रात सोचता है।

बोलने का सलीक़ा अच्छा है। एक तो कम बोलते हैं तो ग़लती कम होती है और दूसरा जब बोलते हैं तो अदब आगे कर देते हैं। इनकी ज़बान से उर्दू उतरी नहीं है। अंग्रेज़ी का रस चढ़ा नहीं है। जबकि इनका पेशा और रिसर्च अंग्रेज़ी का ही है। बहुत ही ख़ूबसूरत परिवार है।

अगले पोस्ट मे मैं आपको पानी की तकनीक पर काम करने वाले सैय्यद रिज़वी साहब, यासिर जिनसे दोस्ती हो गई है और अन्य कुछ लोगों की कामयाबी के बारे में बताऊंगा। कब लिखूंगा, यह मेरे मूड पर निर्भर करता है। मेरा बस इतना ही कहना है कि अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को आप उसके मक़सद के चलते याद करते हैं तो उसका एक बेहतर तरीक़ा यह भी है। इसके चमन से निकले छात्रों को याद कीजिए। आप सभी को मुबारक़। आपकी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी आपको संवारती रहे और आप उसकी ख़ूबसूरत यादों से अपने आगे की यात्रा करते रहें।

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(रवीश कुमार एक जाने माने पत्रकार है, ये पोस्ट रवीश कुमार की फेसबुक वाल  से लिया गया है)

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झारखंड लिंचिंग और आदिवासियों का हाशियाकरण

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सीएसएस टीम

इंडियास्पेंड हेट क्राइम वाच के अनुसार, नफरत-जनित अपराधों, विशेषकर धर्म से जुड़े नफरत-जनित अपराधों, के मामले में झारखण्ड देश में दूसरे नंबर पर है. राज्य में अब तक लकड़ा सहित 12 लोग लिंचिंग का शिकार हुए हैं, जिनमें से नौ मुसलमान और तीन आदिवासी थे.

इंडियास्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2019 के बीच, राज्य में माब लिंचिंग की 15 घटनाएं हुईं. उनका संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है:

लातेहार, 18 मार्च 2016

सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील एक इलाके में मवेशियों को चराने वाले दो मुसलमानों को फांसी पर लटका दिया गया. इस मामले में एक स्थानीय गौरक्षक समूह के पांच सदस्यों को गिरफ्तार किया गया.

कोडरमा, 17 अप्रैल 2017

एक व्यक्ति तब घायल हो गया जब उस पर अपने लड़के की शादी के भोज में बीफ परोसने के शक में हमला किया गया.

गुमला, 30 मई 2017

गांववालों ने 20 साल के एक मुसलमान को पेड़ से बाँध कर उसकी तब तक निर्मम पिटाई की जब तक कि वह मर नहीं गया. उसका अपराध यह था कि वह एक हिन्दू युवती से प्रेम करता था. रजा कॉलोनी निवासी मोहम्मद शालिक के कथित रूप से पास के गाँव की एक हिन्दू महिला से सम्बन्ध थे.

धनबाद 6 जून, 2017

पैंतीस वर्ष के ऐनुल अंसारी पर इफ्तार पार्टी के लिए कथित तौर पर बीफ ले जाने के संदेह में लगभग 20 लोगों की भीड़ ने हमला कर दिया. हमलावरों ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस को मजबूर किया कि वह मांस की जांच करे. परिवार वालों का दावा है कि वह व्यक्ति बीफ नहीं बल्कि मटन ले जा रहा था.

गिरीडीह, 26 जून, 2017

डेयरी का व्यवसाय करने वाले एक मुसलमान के घर के बाहर एक मरी हुई गाय पाए जाने के बाद, उसकी पिटाई की गयी और उसके घर को आग लगा दी गयी. शुरू में 100 लोग वहां इकठ्ठा हुए, जिनकी संख्या जल्दी ही 1,000 से ज्यादा हो गई. पत्थाबाज़ी में 50 पुलिस वाले घायल हुए.

रामगढ, 28 जून, 2017

करीब 100 लोगों की भीड़ ने अलीमुद्दीन उर्फ़ असगर अली की पीट-पीट कर जान ले ली. भीड़ को शक था कि वह बीफ ले जा रहा था. इस मामले में 11 लोगों को उम्र कैद की सजा सुनायी गयी. इनमें बजरंग दल और भाजपा की स्थानीय इकाईयों के नेता शामिल थे. तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने इन सभी का फूलमालाएं पहना कर अभिनन्दन किया, जिससे यह पता चलता है कि अपराधियों को राजनैतिक संरक्षण हासिल था.

गढ़वा, 19 अगस्त 2017

स्व-नियुक्त गौसेवकों ने गढ़वा जिले के ओराँव आदिवासियों के एक समूह पर हमला किया. आदिवासियों में से एक, रमेश मिंज, की हमले के तीन दिन बाद गंभीर चोटें लगने के कारण मृत्यु हो गयी.

रांची, 1 जनवरी 2018

वासिम अंसारी, 19, नामक एक मुस्लिम युवक की तब पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी जब उसने नए साल की पार्टी कर रहे कुछ लोगों से अनुरोध किया कि वे संगीत की आवाज़ कुछ धीमी कर दें.

कोडरमा, 25 मई, 2018

इफ्तार के समय, एक भीड़ ने करीब 20 मुस्लिम परिवारों के घरों पर हमला कर दिया. उन्होंने महिलाओं सहित सभी को पीटा. भीड़ ने मस्जिद में भी तोड़फोड़ की और मगरिब की नमाज़ अदा कर रहे मुसलमानों पर हमला किया.

रांची, 10 जून, 2018

‘जय श्री राम’ कहने से इनकार करने पर, दो मुस्लिम मौलवियों पर हमला किया गया. मानवाधिकारों से सम्बंधित मुक़दमे लड़ने वाले एक वकील के अनुसार, जब मौलवी नमाज़ अदा कर अपने गाँव लौट रहे थे तभी एक एसयूवी में सवार 20 लोगों ने उन्हें रोका और उनसे जय श्री राम बोलने के लिए कहा. जब वे इसके लिए तैयार नहीं हुए तब उन पर लाठियों और हॉकी स्टिकों से हमला किया गया.

गोड्डा, 13 जून 2018

दो मुसलमानों – चिरागुद्दीन अंसारी (35) और मुर्तजा अली (30) – की 13 भैंसें चुराने के आरोप में पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी. चोरी का आरोप कुल पांच व्यक्तियों पर लगाया था. तीन मौके से भाग निकले और दो को भीड़ ने पकड़ लिया. उन्हें तब तक पीटा गया जब तक कि उनकी जान नहीं निकल गयी.

ये सभी घटनाएं 2016 के बाद की हैं. इसी साल, झारखण्ड में माब लिंचिंग शुरू हुई. इसकी पहले – जब झारखण्ड बिहार का हिस्सा था – तब भी वहां सांप्रदायिक हिंसा आम थी. सन 1964 और 1979 में जमशेदपुर में हुए दंगे इसका उदाहरण हैं. इन दंगों व साम्प्रदायिक हिंसा की अन्य वारदातों के चलते, राज्य में मुसलमानों और आदिवासियों के बीच ध्रुवीकरण हो गया है और हिन्दू श्रेष्ठावादी मज़बूत हुए हैं. विभिन्न तथ्यान्वेषण समितियों और जांच आयोगों ने साम्प्रदायिकता भड़काने और सांप्रदायिक दंगों की भूमिका तैयार करने में हिन्दू श्रेष्ठावादियों की भूमिका को रेखांकित किया है.

जमशेदपुर, जेआरडी टाटा द्वारा स्थापित एक शहर है, जिसे योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया है. वहां 1964 और 1979 में भयावह सांप्रदायिक हिंसा हुई. शहर में देश के विभिन्न भागों से रोज़गार की तलाश में आये लोग बस गए हैं. मुसलमान भी वहां बसे और स्थाई रोज़गार से उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में इजाफा होने लगा. मुसलमानों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया. सन 1964 के दंगों से आरएसएस और भाजपा के पूर्व अवतार, जनसंघ, को जबरदस्त लाभ हुआ और दोनों ने इस शहर में अपनी जडें जमा लें. सन 1967 के चुनाव में, जनसंघ को पहली बार जमशेदपुर में 10 प्रतिशत वोट हासिल करने में सफलता मिली.

सन 1979 के दंगे, मुख्यतः मुसलमानों व आदिवासियों के बीच हुए. सन 1964 के दंगों के बाद, मुसलमान, आदिवासियों द्वारा सबीरनगर और अन्य इलाकों में आदिवासियों द्वारा उन्हें बेची गयी ज़मीनों पर बस गए. इससे मुसलमान के रहवास के स्थल दिमनाबस्ती जैसे आदिवासी इलाकों के नज़दीक हो गए. सन 1978 में, आदिवासियों का हिन्दुकरण करने के अपने अभियान के तहत, आरएसएस ने दिमनाबस्ती से रामनवमी का जुलूस निकालने का प्रयास किया. यह पहली बार था जब दिमनाबस्ती से रामनवमी का जुलूस निकलने वाला था. आयोजकों ने सबीरनगर के रास्ते जुलूस निकलने का निर्णय किया. जिला प्रशासन ने उनकी मांग नामंज़ूर कर दी. परन्तु आयोजक अपनी जिद्द पर अड़े रहे और इस कारण पूरे एक वर्ष तक तनाव बना रहा. फिर, 7 अप्रैल 1979 को श्री रामनवमी केंद्रीय अखाड़ा समिति ने एक परचा जारी किया जो कि सांप्रदायिक हिंसा का आव्हान था. उसमें कहा गया था कि हिन्दू 11 अप्रैल को दिन के 11 बजे दिमनाबस्ती में एकत्र हों और वहां से मुस्लिम-बहुल सबीनगर के रास्ते निकलने वाले जुलूस में भाग लें. जुलूस पर पत्थर फेंके गए और इसके बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 108 लोग मारे गए और सैकड़ों मकान लूट लिए गए.

इन दंगों की जांच के लिए नियुक्त जितेन्द्र नारायण आयोग ने दंगा भड़काने में हिन्दू श्रेष्ठतावादी संगठनों की भूमिका पर प्रकाश डाला. आयोग ने जमशेदपुर में तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस के भाषण का भी संज्ञान लिया और आरएसएस पर दंगों के लिए उर्वर भूमि तैयार करने का आरोप लगाया.

सन 1967 के अगस्त में रांची और हटिया शहरों में हिन्दुओं और मुसलमानों की बीच हिंसा भड़क उठी. रघुबर दयाल आयोग इस नतीजे पर पहुंचा कि इलाके में अप्रैल 1964 से ही तनाव बढ़ रहा था. सन 1965 के भारत-पाक युद्ध ने मुसलमानों के बारे में कई तरह के संदेह उत्पन्न कर दिए. मार्च 1967 में हुए आम चुनाव में उर्दू (जिस भाषा को अक्सर मुसलमानों से जोड़ा जाता है) के मुद्दे ने तनाव को और बढ़ाया. उर्दू को बिहार की दूसरी राजभाषा घोषित करने के प्रस्ताव के बाद, जनसंघ, आरएसएस और एक अन्य संगठन, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, द्वारा प्रदेशव्यापी उर्दू-विरोधी आन्दोलन चलाया गया. रांची में मुस्लिम आजाद स्कूल के पास विद्यार्थियों के एक उर्दू-विरोधी जुलूस पर पत्थर फेंके जाने से हिंसा की शुरुआत हुई. स्कूल पर हमला हुआ और इसके जवाब में एक हिन्दू की जान ले ली गयी. रघुबर दयाल आयोग के अनुसार, इसके बाद जो दंगे हुए, उनमें रांची में ही 184 व्यक्ति मारे गए जिनमें से 164 मुसलमान और 19 हिन्दू थे.

सन 2014 के बाद से, रामनवमी और शौर्य दिवस पर निकाले जाने वाले जुलूसों ने अत्यंत आक्रामक स्वरुप अख्तियार कर लिया और इनका उद्देश्य सांप्रदायिक तनाव बढ़ाना और दंगे भड़काना है.

सन 2016 में राज्य के हजारीबाग में हुई हिंसा में करीब 30 दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया.

इस विवरण से यह साफ़ है कि झारखण्ड में सांप्रदायिक तनाव हमेशा बना रहता है जिससे धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण होता है. धार्मिक त्योहारों का उपयोग मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए किया जाता है.

माब लिंचिंग की घटना की मीडिया में रिपोर्टिंग

मीडिया में छपी रिपोर्टों में बताया गया कि 10 अप्रैल, 2019 को डुमरी ब्लाक के जुरमू गाँव के पचास वर्षीय प्रकाश लकड़ा की निकट के जयरागी गाँव के निवासियों की एक भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी. भीड़ में मुख्यतः साहू समुदाय के सदस्य शामिल थे. इस घटना में तीन अन्य व्यक्तियों – पीटर केरकेट्टा, बेलारिअस मिंज और जनेरिअस मिंज – को गंभीर चोटें आईं. यद्यपि यह साफ़ था कि एक बैल की खाल उतारने को लेकर उन पर हमला हुआ परन्तु मीडिया रपटों में घटना का अलग-अलग विवरण दिया गया. जिन मामलों में रपटों में अंतर था वे थीं: जिस जानवर की खाल उतारी जा रही थे वह बैल था या गाय; उस बैल / गाय को मारा गया था या वह पहले से ही मरा हुआ था, बैल / गाय की खाल किस स्थान पर उतारी जा रही थे और लिंचिंग / हिंसा के लिए कौन लोग ज़िम्मेदार थे.

आरोपियों का पक्ष

साहू समुदाय के सदस्यों, जिन पर पीड़ितों ने लिंचिंग की घटना को अंजाम देने का आरोप लगाया है, का कहना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है. वे इस बात से इंकार करते हैं कि उन्होंने पीड़ितों पर हमला किया. उनका कहना है कि पीड़ितों ने एक गाय / बैल को काटा और हिन्दू शमशान घाट के पास वे उस जानवर की खाल उतार कर शमशान स्थल को अपवित्र कर रहे थे.

जुरमू गाँव के चौकीदार ने क्या कहा?

सुखु घासी, जो की बीट नंबर 1/2 का चौकीदार है, ने डुमरी पुलिस थाने में आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई. एफआईआर नंबर 10/19, 11 अप्रैल को 6.05 बजे शाम – अर्थात घटना के करीब चौबीस घंटे बाद – दर्ज की गयी. एफआईआर में माब लिंचिंग के पीड़ितों को ही दोषी ठहराते हुए उन्हें (पीटर केरकेट्टा, प्रकाश लकड़ा, बेलारिअस मिंज और जनेरिअस मिंज) झारखण्ड गौवंश वध निषेध अधिनियम 2005 की धारा 12  और पशु क्रूरता अधिनियम 1960 के तहत अपराध करने का आरोप लगाया गया है. उन पर आरोप है कि उन्होंने एक गौवंश का वध किया, जो कि झारखण्ड में अपराध है.

एफआईआर, घासी को एक अज्ञात स्त्रोत से प्राप्त सूचना के आधार पर दर्ज करवाई गयी. यह घटना नदी के किनारे 10 अप्रैल की रात हुई थी. घासी घटनास्थल पर अगले दिन, अर्थात 11 अप्रैल, को पहुंचा.

पीड़ितों का पक्ष

पीड़ितों के पक्ष का विवरण सरोज हेब्राम, प्रकाश लकड़ा के परिवारजनों और जुरमू गाँव के निवासियों के कथनों और पीड़ितों द्वारा दर्ज करवाई गयी एफआईआर पर आधारित है. उनके अनुसार, बैल के मालिक जखेरिअस मिंज ने 9 अप्रैल को पाया की उसका बैल गायब है. अगले दिन, उसने बैल को नदी के किनारे मृत पाया. शव सड़ने लगा था और उस पर मक्खियां मंडरा रहीं थीं. इसके बाद, 10 अप्रैल को उसने पीटर केरकेट्टा, प्रकाश लकड़ा, बेलारिअस मिंज, जनेरिअस मिंज व अन्यों से संपर्क कर उनसे मृत बैल को ठिकाने लगाने के लिए कहा. आदिवासी पारंपरिक रूप से मृत जानवरों का मांस खाते हैं और उनकी खाल उतार कर, शव को ठिकाने लगा देते हैं. खाल का इस्तेमाल वाद्ययंत्रों आदि में किया जाता है.

साहू समुदाय के कुछ सदस्यों ने 10 अप्रैल की अँधेरी रात को करीब 8 बजे देखा कि आदिवासी नदी के किनारे किसी जानवर की खाल उतार रहे हैं. वे जयरागी गाँव पहुंचे और वहां के करीब 40 लोगों को साथ लेकर, नदी के किनारे आए. उन्होंने यह पता लगाने का प्रयास नहीं किया कि आदिवासी मरे हुए बैल की खाल उतार रहे हैं या उन्होंने बैल को मारा है. साहू समुदाय के लोग तलवारों, लोहे की मोटी छड़ों और बंदूकों से लैस थे. उन्होंने बेरहमी से चारों पीड़ितों की जम कर पिटाई लगाई. पीड़ितों में से एक की रीढ़ की हड्डी तोड़ दे गयी और उनके हाथ-पैरों में गंभीर चोटें आईं. हमलावर 8 बजे से लगभग 11 बजे तक पीड़ितों को मारते रहे. पीड़ितों द्वारा पानी मांगने पर उन पर पेशाब की गयी. बाद में, पीड़ितों को घसीट कर सड़क पर लाया गया और पुलिस को सूचना दी गयी कि वह उन्हें उठा ले जाये.

 दल के निष्कर्ष:

पीड़ितों का पक्ष सबसे विश्वसनीय

दल ने पाया कि पीड़ितों का पक्ष सबसे विश्वसनीय है. एफआईआर से साफ़ है कि जयरागी गाँव के करीब 30-40 लोगों ने घटनास्थल पर पहुँच कर बैल की खाल उतारने के लिए पीड़ितों पर हमला किया. दल को साहू समुदाय का यह कथन विश्वसनीय नहीं लगा कि पीड़ित, शमशान के पास जानवर को ठिकाने लगा रहे थे और नदी को प्रदूषित कर रहे थे. दल ने घटनास्थल की यात्रा की और पाया कि जिस स्थान पर जानवरों को ठिकाने लगाया जा रहा था, वह नीचे था जबकि शमशान घाट ऊंचाई पर स्थित था. अर्थात, इस बात की कोई सम्भावना नहीं थी कि जानवर के अवशेष नदी में फेंके जाने पर भी, वे शमशान घाट को अपवित्र कर सकते थे क्योंकि नदी का बहाव शमशान घाट से घटनास्थल की ओर था. घासी की एफआईआर में और भी कई कमियां हैं.

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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विचार

क्या हिंदी देश को एक रख सकती है?

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राम पुनियानी

मोदी-2 सरकार काफी शक्तिशाली है. उसे न केवल खासी संख्या में सांसदों का समर्थन प्राप्त है वरन विपक्ष बहुत कमज़ोर और बंटा हुआ है. यही कारण है कि सरकार जनभावनाओं की परवाह किये बगैर, धड़ल्ले से संघ-भाजपा के हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेंडे को लागू कर रही है. पहले उसने तीन तलाक पर रोक लगाई और फिर धारा 370 को हटाया. इन सफलताओं से उत्साहित हो अब वह संघ के एजेंडे के अन्य बिन्दुओं को लागू करने का प्रयास कर रही है.

हिंदी दिवस के अवसर पर बोलते हुए, भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ़ कर दिया कि उनकी पार्टी हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देना चाहती है. शाह ने कहा कि, “देश की एक भाषा होनी आवश्यक है जो दुनिया में देश का प्रतिनिधित्व कर सके…देश में सबसे ज्यादा बोली जानी वाली हिंदी, भारत को एक करने वाली भाषा हो सकती है….हिंदी हमारे प्राचीन दर्शन, संस्कृति और हमारे स्वाधीनता संग्राम की स्मृतियों को सहेजने वाली  भाषा है, इस भाषा को यह राष्ट्र समझता है, अगर हिंदी को हमारे स्वाधीनता संग्राम से बाहर कर दिया जाया तो उस संघर्ष की आत्मा की गुम हो जाएगी.” उन्होंने ट्वीट किया कि, “मैं देश के सभी नागरिकों से अपील करता हूं कि हम अपनी-अपनी मातृभाषा के प्रयोग को बढ़ाएं और साथ में हिंदी भाषा का भी प्रयोग कर बापू और सरदार पटेल के देश की एक भाषा के स्वप्न को साकार करने में योगदान दें.”

शाह के शब्द चतुराईपूर्ण थे और इरादा साफ़ था – अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं को परे धकेलो और हिंदी को महत्व दो. शाह के असली इरादे को भांप कर दक्षिण भारत के कई नेताओं – एम. के. स्टालिन, शशि थरूर, पिनराई विजयन और कमल हासन – ने खुल कर उनके कथन का विरोध किया. उन सभी ने कहा कि शाह, दक्षिणी राज्यों पर हिंदी थोपना चाहते हैं. विजयन ने कहा, “वह भाषा (हिंदी), बहुसंख्यक भारतीयों की मातृभाषा नहीं है. हिंदी पर लादना, उन्हें गुलाम बनाने के समान है.” कमल हासन ने अपना एक वीडियो अपलोड किया है जिसमें वे अशोक स्तम्भ और संविधान की उद्देशिका के बगल में खड़े दिख रहे हैं. वे कहते हैं कि “भारत 1950 में अनेकता में एकता के वादे के साथ गणतंत्र बना था और अब कोई शाह, सुल्तान या सम्राट इससे इनकार नहीं कर सकता. हम सभी भाषाओं का आदर करते हैं परन्तु हमारी मातृभाषा हमेशा तमिल होगी…हमारी भाषा की लड़ाई बहुत बड़ी होगी….”

हमारा देश भाषागत, सांस्कृतिक, धर्मिक और नस्लीय विविधताओं से भरा हुआ है. हमारा स्वाधीनता संग्राम इस विविधता को प्रतिबिंबित करता था. इन सारी विविधताओं के बावजूद, लोगों ने एक होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी और साथ ही एक-दूसरे की समृद्ध धार्मिक और भाषागत विरासत का सम्मान भी किया. भारत के एक राष्ट्र बनने के स्वप्न की अभिव्यक्ति सभी भाषाओं में हुई. अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ, हिंदी भी भारतीय समाज का दर्पण है. यद्यपि अंग्रेजी, मूलतः प्रशासन की भाषा के रूप में देश में आयी परन्तु वह भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गयी और आज वह भारतीय समाज और उसके सपनों को उतना ही प्रतिबिंबित करती है जितनी कि कोई भारतीय भाषा.

जहाँ राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन सभी भाषाओं का सम्मान करता था वहीं सांप्रदायिक ताकतों की सोच अलग थी. मुस्लिम साम्प्रदायिकतावादी, ‘उर्दू, मुस्लिम, पाकिस्तान’ के नारे के साथ आगे आये तो हिंदी राष्ट्रवादियों ने ‘हिंदी, हिन्दू, हिंदुस्तान’ का नारा बुलंद किया. पाकिस्तान का निर्माण, अविभाजित भारत के मुस्लिम बहुसंख्या वाले इलाकों को मिलाकर हुआ परन्तु उस देश बहुत भाषागत विविधता थी. मुस्लिम लीग उर्दू को देश की राष्ट्रभाषा बनाने पर आमादा थी. इस जिद के कारण, पूर्वी पाकिस्तान देश से अलग हो गया और बांग्लादेश अस्तित्व में आया, जिसकी मुख्य भाषा बंगाली है.

यह दिलचस्प है कि हमारे संविधान निर्माता इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि, “नागरिक की इच्छानुसार, देवनागरी या फारसी लिपि में लिखित हिन्दुस्तानी, देश की राष्ट्रभाषा के रूप में संघ की प्रथम राजभाषा होगी. अंग्रेजी ऐसे अवधि तक, जो संघ द्वारा निर्धारित की जाये, द्वितीय राजभाषा होगी.” त्रिभाषा फार्मूले में अंग्रेजी, हिंदी और क्षेत्रीय भाषा सभी विद्यार्थियों को सिखाई जानी थी. सन 1960 के दशक में, दक्षिणी राज्यों पर हिंदी थोपने का प्रयास किया गया था जिसका इतना कड़ा विरोध हुआ कि नीति का क्रियान्वयन रोक देना पड़ा. नयी शिक्षा नीति में हिंदी को अनिवार्य बनाने की बात कही गयी है.

अक्सर कहा जाता है कि हिंदी, बहुसंख्यक भारतीयों की भाषा है. ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि हिंदी 25 प्रतिशत भारतीयों की मातृभाषा है और करीब 44 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वे हिंदी जानते हैं. बहुत पहले, सन 1940 के दशक में, जब कांग्रेस सरकार तत्कालीन मद्रास प्रान्त (अब तमिलनाडू) में शासन में आई तब वहां हिंदी का प्रयोग बढ़ाने का प्रयास किया गया. इसका विरोध पेरियार रामासामी नायकर ने किया था. उन्होंने ‘तमिलनाडू तमिलों के लिए’ का नारा दिया और आरोप लगाया कि हिंदी, आर्यों द्वारा द्रविड़ संस्कृति पर हमला करने का हथियार है.

भाषा के जटिल मुद्दे का क्या समाधान हो? देश में अंग्रेजी, हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं – तीनों का अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग अनुपात में प्रयोग हो रहा है. जहाँ हिंदी को दक्षिणी राज्यों में लोकप्रिय बनाने के प्रयास हो रहे हैं वहीं दक्षिण भारत की भाषाओं का हिंदी पट्टी में प्रसार करने की कोई कोशिश नहीं हो रही है. हिंदी आज निश्चित रूप से दक्षिणी व अन्य राज्यों में पहले से अधिक बोली और समझी जाती हैं. परन्तु यह सरकारी स्तर पर हिंदी को लादने से नहीं हुआ है. यह हुआ है हिंदी फिल्मों, टीवी सीरियलों और हिंदी के विकास लिए काम कर रही संस्थाओं की बदौलत.

उर्दू को देश पर लादने की कोशिश ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे. भारत अब तक भाषा के मामले में संतुलन बनाये रखने में सफल रहा है. अमित शाह पूरे देश को एकसार बनाने की बात कर रहे हैं. हमें उम्मीद है कि सरकार समझदारी और परिपक्वता से काम करेगी और देश की भाषा नीति के निर्धारण में दक्षिणी राज्यों की भावनाओं और संवेदनशीलताओं का ख्याल रखा जायेगा.

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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राष्ट्रवाद का झुनझुना चाहिए या नोकरी

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हेमंत झा
कितने मासूम हैं वे…! बिल्कुल उस बच्चे की तरह जिसे चावल का भूंजा ‘कुरकुर’ भी चाहिये और ‘मुरमुर’ भी चाहिये। उसी तरह उन्हें भी…एक खास तरह का राष्ट्रवाद भी चाहिये, नकारात्मक किस्म के सांस्कृतिक वर्चस्व की मनोवैज्ञानिक संतुष्टि भी चाहिये, धारणाओं में सुनियोजित तरीके से स्थापित ‘मजबूत’ नेता भी चाहिये और…अपनी स्थायी सरकारी नौकरी में किसी तरह की विघ्न-बाधा भी नहीं चाहिये।
   वे रेलवे में नौकरी करते हैं, एयरपोर्ट में नौकरी करते हैं, बैंकों, विश्वविद्यालयों, आयुध निर्माण केंद्रों, बीएसएनएल, एमटीएनएल, ओएनजीसी सहित पब्लिक सेक्टर की अन्य इकाइयों में नौकरी करते हैं।
    उन्हें अपनी नौकरी में स्थायित्व पर कोई सवाल नहीं चाहिये, समयबद्ध तरक्की भी चाहिये और पेंशन तो चाहिये ही चाहिये… वह भी ‘ओल्ड’ वाला।
     लेकिन यह क्या?
   अभी वे बालाकोट में पाकिस्तान के मानमर्दन का जश्न मना कर, केंद्र में मजबूत नेता के फिर से और अधिक मजबूत होकर आने का  स्वागत गान गा कर अपने-अपने ऑफिसों में निश्चिंत हो कर बैठे भी नहीं थे कि खुद उनके अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे।
      बिना सही तथ्य जाने एनआरसी विवाद पर अपनी कीमती राय रखते हुए, मजबूत सरकार द्वारा कश्मीरियों को ‘सीधा’ करने की कवायदों पर अपना उत्साह ही नहीं, उल्लास व्यक्त करते हुए अपनी गद्देदार कुर्सियों की पुश्तों से गर्दन टिका कर उन्होंने ऑफिस कैंटीन में कॉफी का ऑर्डर भेजा ही था कि पता चला…उसी मजबूत सरकार ने उनकी कुर्सी के नीचे पटाखों की लड़ियों में माचिस की तीली सुलगा दी है।
   अब क्या बैंक, क्या रेलवे, क्या कॉलेज, क्या एयरपोर्ट, क्या ये, क्या वो…सब हैरान हैं। ये क्या हो रहा है,?
    एयरपोर्ट वाले बाबू लोग तो बहुत हैरान हैं। उनकी हैरानी नाराजगी का रूप ले रही है। सरकार ने देश के बड़े हवाई अड्डों के निजीकरण का निर्णय लिया है। बाबू लोग सकते में हैं। वे कह रहे हैं कि जो सरकारी एयरपोर्ट अच्छे-भले मुनाफे में चल रहे हैं उनको कारपोरेट के हाथों में सौंपने का क्या मतलब है? वे गिनाते हैं कि सरकारी नियंत्रण में रहते इन एयरपोर्ट्स ने आधारभूत संरचना के विकास में कितने उच्च मानदंडों को छुआ है। अखबारों में छपी खबरों के अनुसार अब वे बाबू लोग आरोप लगा रहे हैं कि बने-बनाए, मुनाफे में चल रहे एयरपोर्ट्स को बड़े औद्योगिक घरानों के हाथों सौंप कर सरकार सिर्फ उन उद्योगपतियों के हित साध रही है। अब उन्हें अपना भविष्य अंधेरा नजर आ रहा है।
   आह…कितने मासूम हैं ये बाबू लोग। जब कभी कोई कहता या लिखता था कि जिस नेता को वे ‘डायनेमिक’ कह रहे  हैं उसके आभामंडल के निर्माण में उन्हीं बड़े औद्योगिक घरानों ने बड़ी मेहनत की है, अकूत पैसा खर्च किया है, कि तमाम भावनात्मक मुद्दे आंखों में धूल झोंकने के हथियार मात्र हैं और उनसे किसी के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं आने वाला, कि यह मजबूत नेता दोबारा आने के बाद दुगुने जतन से कारपोरेट की शक्तियों का हित पोषण करेगा…तो वे हिकारत के भावों के साथ टिप्पणियां करते थे, ऐसा कहने वालों को वे वामी आदि के संबोधनों से तो नवाजते ही थे, अक्सर उनकी देशभक्ति पर भी सवाल उठा दिया करते थे।
    अमर्त्य सेन, रघुराम राजन और ज्यां द्रेज सरीखे अर्थशास्त्रियों के बयानों को किसी ‘साजिश’ का हिस्सा बताने में उन बाबुओं को भी कोई संकोच नहीं होता था जिन्होंने दसवीं तक के अर्थशास्त्र को भी ठीक से नहीं पढ़ा था।
     सितम यह कि सरकारी विश्वविद्यालयों के अधिकतर प्रोफेसरों को बैंक निजी चाहिये, रेलवे-एयरपोर्ट के निजीकरण से उन्हें कोई आपत्ति नहीं, आयुष्मान भारत योजना को वे गरीबों की चिकित्सा के लिये ऐतिहासिक कदम बताते हैं, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की बदहाली का कोई संज्ञान लेने तक को वे तैयार नहीं और ऊंची तनख्वाह के साथ ही मेडिकल बीमा के बल पर लकदक निजी अस्पतालों में अपनी चिकित्सा के प्रति वे निश्चिंत हैं।
   उनकी दिक्कत तब शुरू हुई जब सरकार सरकारी कॉलेजों को भी एक-एक कर बाकायदा कारपोरेट के हाथों में सौंपने की तैयारी करने लगी। शुरुआत हो चुकी है और पिछले सप्ताह कुछ कॉलेजों के बिकने का टेंडर भी हो चुका है। आने वाले 10-15 सालों में देश की उच्च शिक्षा का संरचनात्मक स्वरूप पूरी तरह बदल जाने वाला है। जिन्हें इस पर संशय हो वे प्रस्तावित ‘नई शिक्षा नीति’ के विस्तृत मसौदे को पढ़ने का कष्ट उठा लें। यह प्रस्तावित नीति और कुछ नहीं, उच्च शिक्षा तंत्र के कारपोरेटीकरण और इसकी जिम्मेवारियों से सरकार के हाथ खींच लेने का घोषणा पत्र है।
     अधिकतर बैंक वाले खुश हैं कि सरकारी कालेजों का निजीकरण किया जा रहा है। वे इस परसेप्शन के शिकार हैं कि सरकारी स्कूल-कालेजों के मास्टर लोग बिना कुछ किये-धरे ऊंची तनख्वाहें उठाते हैं और कि…ये सारे मास्टर सरकार पर बेवजह के बोझ हैं।
     एक-एक कर सार्वजनिक संपत्तियों को कौड़ी के मोल कारपोरेट के हाथों बेचा जा रहा है और इन खबरों को कहीं कोई तवज्जो नहीं मिल रही। अखबारों के किसी पन्ने के कोने में चार-आठ लाइनों की कोई छोटी सी खबर आती है, जिसका संज्ञान भी अधिकतर लोग नहीं लेते कि पब्लिक सेक्टर की फलां इकाई फलां उद्योगपति के हाथों बेच दी गई।
     अधिकतर बाबू लोगों के प्रिय न्यूज चैनलों में वे चैनल ही हैं जो प्राइम टाइम में नियम से पाकिस्तान, कश्मीर, तीन तलाक, एनआरसी आदि पर बहसें करते-कराते हैं, जिनके एंकरों की चीखों से इन बाबुओं की रगों में भी देशभक्ति का जोश कुलांचें भरने लगता है। टीवी में एंकरों/एंकरानियों की चीखें जितनी जोर से गूंजती हैं, बाबू लोगों का जोश उतना बढ़ता है। उतना ही उनके बच्चों का मस्तिष्क प्रदूषित होता है जो अभी छठी, आठवीं या बारहवीं क्लास में हैं और कारपोरेट संचालित लोकतंत्र के छल-छद्मों से नितांत अनभिज्ञ हैं।
   नहीं, ऐसा नहीं है कि अब उनकी आंखों पर पड़ा पर्दा हट रहा है। पर्दा अपनी जगह यथावत है और मोबाइल न्यूज एप्स पर आ रही उन प्रायोजित खबरों को देख-पढ़ कर वे अब भी मुदित-हर्षित हो रहे हैं जिनमें बताया जाता है कि इमरान मोदी के डर से थर-थर कांप रहे हैं, कि अब कश्मीर तो क्या, पीओके भी बस हासिल ही होने वाला है, कि असम की जमीन की पवित्रता अब लौटने ही वाली है जहां सिर्फ ‘मां भारती के सपूत’ ही रह जाएंगे और तमाम सौतेलों को खदेड़ दिया जाएगा।
    उनकी आंखों पर पड़े पर्दों ने उन्हें इंसानियत से, भारतीयता से कितना विलग कर दिया है, यह उन्हें अहसास भी नहीं। तबरेज के हत्यारों को दोषमुक्त कर दिए जाने से तो उन्हें कोई तकलीफ नहीं ही हुई, दोषमुक्त आरोपियों को फूल-मालाओं से लदा देख कर भी उन्हें कोई हैरत नहीं हुई।
  तमाम खुली आँखों पर पड़े गर्द भरे पर्दे यथावत हैं। उन्हें तो विरोध बस अपने हितों पर हो रहे आघातों से है। उनका विभाग सलामत रहे, सरकारी बना रहे, उनका वेतन-पेंशन कायम रहे, बाकी सारे के सारे विभागों का निजीकरण हो जाए, फर्क नहीं पड़ता।
      ये सिर्फ बाबू लोग हैं। इनमें अधिकारी भी हैं, कर्मचारी भी हैं, पियून साहब लोग भी हैं, प्रोफेसर/मास्टर भी हैं। वे न सवर्ण हैं, न पिछड़े, न अति पिछड़े, न दलित आदि। वे सिर्फ मध्यवर्गीय बाबू हैं जिन्हें अपने वर्गीय हितों से इतर कुछ नहीं सूझता।
   उनमें से बहुत सारे लोग अब आंदोलित हैं लेकिन अलग-अलग जमीन पर। एक दूसरे के आंदोलनों के प्रति उनमें कोई सहानुभूति नहीं, बल्कि, अपना छोड़ बाकी अन्यों के आंदोलनों को वे संदेह की दृष्टि से देखते हैं और अवसर पड़ने पर प्रतिकूल टिप्पणियां करने से भी कोई गुरेज नहीं करते।
   कितने मासूम हैं वे!
 वे सोचते हैं कि आसमान गिर पड़े तो गिरे, बस उनकी छत सलामत रहे, जिसकी सुरक्षा का जिम्मा सरकार का है क्योंकि वे तो सरकारी हैं। उनका ऑफिस सरकारी है और उसकी छत सरकार ने ही बनाई थी।
    हितों के अलग-अलग द्वीपों पर खड़े वे तमाम लोग पराजित होने को अभिशप्त हैं। उनके बीच सामूहिक मानस का निर्माण सम्भव ही नहीं क्योंकि वे सारे एक-दूसरे के विभागों को सरकार पर बोझ मानते हैं।
    वे आंदोलन कर रहे हैं। कुछ लोग, कुछ विभाग तो जोरदार आंदोलन की राह पर हैं। लेकिन, उनका वैचारिक खोखलापन तब सामने आता है जब दिन भर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ करते-करते वे शाम को जब घर लौटते हैं तो चाय/कॉफी पीते उन्हीं न्यूज चैनलों पर उन्हीं दलाल एंकरों की चीखें सुनते हैं जो उन्हें बताते हैं कि पाकिस्तान तो अब बर्बाद होने ही वाला है और भारत…? यह तो विश्व गुरु था और  फलां जी के नेतृत्व में फिर से विश्व गुरु बनने की राह पर है, कि बस, विश्व गुरु बनने को ही है। दुनिया के शीर्ष 300 विश्वविद्यालयों की लिस्ट में भारत का कोई संस्थान अगर जगह नहीं पा सका तो लिस्ट बनाने वालों की कसौटियां ही संदिग्ध हैं। जिस देश में ‘जियो’ नामक अवतारी यूनिवर्सिटी हो जिसने जन्म से पहले ही एक्सीलेंस की कसौटियों को पूरा कर लिया हो उसे विश्वगुरु बनने से कोई रोक भी कैसे सकता है?
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(ये लेख हेमंत झा की फेसबुक वाल से लिया गया है )

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क्या उलमा आलोचनाओं से परे हैं?

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अनीस अंसारी
अंधी तक़लीद बहुत ख़तरनाक होती है.. ये आपके दिमाग़ को जकड़ लेती है और आप एक ख़ास दायरे में सोचने लगते हैं जब भी कोई उस दायरे से बाहर की बात करता है तो वो आपको दुश्मन लगने लगता है।
सहाबा ए किराम शख़्सियत परस्त नही थे, तभी तो दुनिया के अज़ीम तरीन हुक्मरान, हज़रत उमर जिसके नाम से ही लोगों में कंपकपी तारी हो जाया करती थी, जब जनता दरबार में खड़े होकर पूछते है कि “लोगो अगर मैं हक़ ओ इंसाफ पे न चलूँ तो तुम क्या करोगे?”
लोगों की भीड़ में से एक बद्दू (दिहाती ) खड़ा होता, जिसने अपनी तलवार खजूरों के पत्तों में लपेट रखी थी (क्योंकि उसके पास तलवार की म्यान नही थी), तलवार पे हाथ मार कर कहता है:
“ऐ उमर हम तुम्हे इस तलवार से सीधा कर देंगे”
हज़रत उमर खामोश हो जाते हैं। सारे मजमे में सन्नाटा छा जाता है। फिर हज़रत उमर कहते हैं कि “अब उमर बर्बाद नही होगा”।
एक दिन हज़रत उमर के पास शिकायत आती है कि लड़की वाले ‘मेहर’ की क़ीमत ज़्यादा मांगने लगे हैं, तो हज़रत उमर मस्जिद से ऐलान करते हैं कि, “आज के बाद हुकूमत के द्वारा तय किये मेहर से ज़्यादा कोई लड़की वाला डिमांड नही करेगा।”
जब इस एलान के बाद हज़रत उमर मस्जिद से निकलते है तो एक औरत रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती है और तैश में बोलती है—
“ऐ उमर, तुम कौन होते हो मेहर की हद तय करने वाले, जबकि क़ुरान ने इसकी हद तय नही की।”
हज़रत उमर फौरन वापस मस्जिद जाते हैं और अपना फैसला वापस लेने का ऐलान करते है और कहते हैं कि “जब तक मुसलमानों में ऐसी औरतें मौजूद हैं, उमर महफूज़ है।”
अब ये भी सुनिये कि हज़रत उमर कौन हैं?
★जिनके बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि “जिस रास्ते से उमर गुज़रता है शैतान वो रास्ता छोड़ देता है।”
“अगर मेरे बाद कोई नबी होता तो वो उमर होता।”
 “हर क़ौम का एक मोहद्दस (जिसपे वही तो नही आती मगर अल्लाह की तरफ़ से उसे सीधा इलहाम होता है) और मेरी उम्मत का मोहद्दस उमर है।”
वो हज़रत उमर जिनके कई फैसलों पर लोग ऐतराज़ करने लगे तो क़ुरान में उस फैसले की ताईद में आयतें उतर गईं। लेकिन इसके बाद भी मुसलमानों का अदना से अदना शख़्श भी भक्ति नही करता। ये नही कहता कि हज़रत उमर ने कह दिया तो कोई न कोई मसलेहत होगी
हज़रत उमर इल्म वाले है
हज़रत उमर अमीरऊल मोमेनीन है
हज़रत उमर अशरे मोबश्शेरा वाले है
हज़रत उमर वो है जिनसे अल्लाह ने रज़ामंदी का ऐलान कर रखा है
क्योंकि सहाबा शख़्सियत परस्त नही थे। सहाबाओं के नज़दीक दीन और उम्मत पहले थे शख़्स और तंज़ीम बाद में।
क्या आज भी ऐसा होना मुमकिन है?

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विचार

धार्मिक राष्ट्रवादः नायक और विचारधारा

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राम पुनियानी

समावेशी बहुवाद पर आधारित वह राष्ट्रवाद, जो भारत के स्वाधीनता संग्राम की आत्मा था, आज खतरे में है. इसका कारण है संघ परिवार की राजनीति का बढ़ता प्रभामंडल. संघ से जुड़े अनेकानेक संगठन, हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन के सभी क्षेत्रों में घुसपैठ कर अपना वर्चस्व स्थापित कर रहे हैं. इसके साथ ही, यह आख्यान निर्मित करने का प्रयास हो रहा है कि हिन्दू राष्ट्रवाद, अनादिकाल से भारतीय परंपरा का हिस्सा था. हिन्दू राष्ट्रवाद के महिमामंडन की राह में सबसे बड़ी बाधा है इस राष्ट्रवाद की स्वाधीनता आंदोलन में शून्य भूमिका और इसका अंग्रेजों का पिछलग्गू होना. इस तथ्य को छुपाना, हिन्दू राष्ट्रवाद के पैरोकारों के लिए अपरिहार्य है. यही कारण है कि वे दिन-रात मेहनत कर यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके वैचारिक पूर्वजों ने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया था. स्वाधीनता संग्राम से अपने विश्वासघात को छुपाने के लिए वे कहानियां गढ़ रहे हैं. वे उन नायकों को अपना बताने का प्रयास कर रहे हैं जिनके गांधी या नेहरू से रणनीतिक मतभेद थे या जिन्होंने स्वाधीनता पाने के लिए अपनी अलग राह चुनी थी.

इस दिशा में पहला प्रयास था मोहनदास करमचंद गांधी के अनन्य शिष्य, जवाहरलाल नेहरू के निकट सहयोगी और जीवनपर्यंन्त कांग्रेस के निष्ठावान सिपाही, सरदार वल्लभभाई पटेल को हिन्दू राष्ट्रवादी ढ़ांचें में ढ़ालने की कोशिश. इधर-उधर से कुछ असंबद्ध घटनाओं और तथ्यों को उद्धत कर यह कहा जा रहा है कि अगर सरदार पटेल देश के प्रथम प्रधानमंत्री होते तो आज कश्मीर समस्या न होती. अब, यह भी कहा जा रहा है कि महात्मा गांधी ने भगत सिंह की जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया था. इस ऐतिहासिक तथ्य को नजरअंदाज किया जा रहा है कि गांधीजी ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी रूकवाने की हरचन्द कोशिश की थी परंतु अंग्रेज शासक, भगत सिंह और उनके साथियों को माफी देने के लिए तैयार नहीं थे. यह दुष्प्रचार करने वाले इस तथ्य की भी अनदेखी कर रहे हैं कि भगत सिंह ने अंग्रेजों से माफी मांगने या अपनी सजा कम करने का अनुरोध करने से साफ इंकार कर दिया था. भगत सिंह एक सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे और अपने आचरण से पूरे देश को प्रेरित करना चाहते थे.

इस मुद्दे पर चर्चा का संदर्भ यह है कि अभी हाल (अगस्त 2019) में दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में भगत सिंह, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और सावरकर की एक-दूसरे से जुड़ी हुई मूर्तियां लगाई गईं और उन्हें भारतीय स्वाधीनता संग्राम की त्रिमूर्ति बताया गया. दरअसल, यह सावरकर को नेताजी और भगत सिंह के समकक्ष बताने के एजेंडे का हिस्सा है – यह बताने का प्रयास कि इन दोनों की तरह, सावरकर भी ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी थे. हम सब जानते हैं कि सावरकर केवल अपने जीवन के पहले चरण में ब्रिटिश-विरोधी थे. अंडमान में स्थित सेल्लुयर जेल में कैद कर दिए जाने के बाद उनका ह्रदयपरिवर्तन हो गया और उन्होंने अपनी रिहाई के लिए अंग्रेज सरकार को पांच दया याचिकाएं भेजीं. सावरकर, आरएसएस और हिन्दू राष्ट्रवादियों के सबसे बड़े वैचारिक गुरू हैं. उन्होंने ही हिन्दुत्व, जो कि हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा है, को परिभाषित किया था. मजे की बात यह है कि वे स्वयं नास्तिक थे. उनके विचार, हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति का आधार हैं. सन् 1857 के विद्रोह पर अपनी पुस्तक में सावरकर ने लिखा कि हिन्दुओं और मुसलमानों ने किस तरह कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी के रूप में अवतार लेते ही उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि मुसलमानों से नफरत ही हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार हो सकती है.

इसके विपरीत, भगत सिंह और नेताजी – संघ परिवार जिनसे सावरकर को जोड़ना चाहता है – जीवनपर्यंन्त ब्रिटिश विरोधी रहे. भगत सिंह कम्युनिस्ट थे और सुभाष बोस, समाजवादी. भगत सिंह मानते थे कि गांधीजी के नेतृत्व में समावेशी आंदोलन ही भारतीय स्वाधीनता संग्राम की धुरी हो सकता है. गांधीजी के साथ अपने मतभेदों के बावजूद, नेताजी उन्हें राष्ट्रपिता कहते थे. नेताजी, गांधीजी और भगत सिंह के बीच मतभेद, राष्ट्रवाद की अवधारणा को लेकर नहीं थे. उनमें अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ने के तरीके के बारे में मतभेद थे. गांधीजी अहिंसा के पक्के समर्थक थे. उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों की भारत पर पकड़ कमजोर करने के लिए भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया. बोस चाहते थे कि भारत के स्वाधीनता सेनानी, ब्रिटेन के विरूद्ध युद्धरत धुरी राष्ट्रों – जर्मनी, इटली और जापान – से हाथ मिलाएं.

कुल मिलाकर, जहां तक राष्ट्रवाद का संबंध है, भगत सिंह, नेताजी और गांधीजी व इन नेताओं के समर्थक एक शिविर में हैं. दूसरे शिविर में हैं जिन्ना (मुस्लिम लीग का सदस्य बनने के बाद) और हिन्दू राष्ट्रवाद के पथप्रदर्शक सावरकर. ये दोनों धर्म को राष्ट्रवाद का आधार मानते और बताते थे. धार्मिक राष्ट्रवाद की यह विचारधारा, राजाओं-नवाबों और जमींदारों से उपजी थी. इसके विपरीत, भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थक, समाज के विभिन्न तबकों से थे. इनमें शामिल थे उद्योगपति और व्यवसायी, श्रमिक और शिक्षित मध्यमवर्ग. ये वर्ग स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के हामी थे और धर्म से ऊपर उठकर सोचते थे. हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादी, जन्म-आधारित सामाजिक पदक्रम के सामंती मूल्य में आस्था रखते थे.

दिल्ली विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ वह इस बात का नमूना है कि तेजी से उभरता धार्मिक राष्ट्रवाद, इतिहास को किस रूप में प्रस्तुत करना चाहता है और हमारे अतीत के नायकों के साथ किस तरह की छेड़छाड़ करने पर आमादा है. अब तक हमने इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने के संघ परिवार के अभियान का एक पक्ष देखा है जिसमें हिन्दू शासकों और मनुस्मृत्ति जैसे हिन्दू ग्रंथों का महिमागान किया जाता है. दिल्ली विश्वविद्यालय की घटना, हिन्दू राष्ट्रवाद की वैचारिक मजबूरी के एक दूसरे पक्ष को उद्घाटित करती है. संघ परिवार केवल उन नेताओं को महिमामंडन के लिए चुन रहा है जिनके गांधी या नेहरू से मतभेद थे. बोस और भगत सिंह को इसलिए चुना गया क्योंकि वे कई मामलों में गांधीजी से असहमत थे और पटेल को इसलिए क्योंकि उनमें और नेहरू में कुछ मुद्दों पर मतभिन्नता थी. परंतु महत्वपूर्ण यह है कि ये सभी नेता भारतीय राष्ट्रवादी थे और इनकी तुलना सावरकर से कतई नहीं की जा सकती. सावरकर ने तो स्वाधीनता संग्राम से विश्वासघात किया था.

दिल्ली विश्वविद्यालय की घटना मामूली भले ही हो परंतु इससे यह पता चलता है कि संघ परिवार, भारतीय राष्ट्रवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों को एक पलड़े पर तोलने का प्रयास कर रहा है.

हिन्दू राष्ट्रवादी, विचारधारात्मक विभाजक रेखाओं को मिटाने का उपक्रम कर रहे हैं. हमें भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नायकों की मूल विचारधारा को समझना होगा. तभी हम समझ पाएंगे कि कौन से मतभेद वास्तविक और महत्वपूर्ण थे और कौन से मामूली और नजरअंदाज करने लायक. यह केवल मूर्तियों का प्रश्न नहीं है. प्रश्न यह है कि आखिर हम किस तरह के भारत का निर्माण करना चाहते हैं. भगत सिंह, बोस, गांधी और अम्बेडकर के भारत का या सावरकर के हिन्दू राष्ट्र का. (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

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विचार

क्या प्रमुख नागरिकों को शासकों को आईना नहीं दिखाना चाहिए?

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देश के 49 प्रमुख नागरिकों, जिनमें फिल्मी हस्तियां, लेखक और इतिहासविद् शामिल हैं, ने कुछ समय पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुला पत्र लिखकर, देश में दलितों के खिलाफ अत्याचार व माब लिंचिंग की घटनाओं में बढ़ोत्तरी और ‘जय श्रीराम‘ के नारे का एक विशेष धर्म के लोगों को आतंकित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए उनका ध्यान इस ओर आकर्षित किया था. हस्ताक्षरकर्ताओं में लब्धप्रतिष्ठित हस्तियां जैसे श्याम बेनेगल, अडूर गोपालकृष्णन, अपर्णा सेन और रामचन्द्र गुहा शामिल थे. इसके तुरंत बाद, प्रतिष्ठित नागरिकों के एक अन्य समूह, जिसमें प्रसून जोशी, कंगना रनौत, मधुर भंडारकर, सोनल मानसिंह और अन्य शामिल थे, ने एक जवाबी पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि कुछ चुनिंदा घटनाओं को उद्धत कर पहले पत्र के लेखक, दुनिया की निगाहों में भारत और मोदी को बदनाम करना चाहते हैं. उन्होंने उस पत्र को एक पक्षीय और राजनीति से प्रेरित बताया.

उनका आरोप है कि उक्त पत्र के लेखकों ने सिक्के का दूसरा पहलू नहीं देखा. उन्होंने हिन्दुओें के कैराना से पलायन की चर्चा नहीं की और ना ही वे बशीरहाट में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा से चिंतित लगते हैं. उन्होंने दिल्ली के चांदनी चैक में एक मंदिर को नुकसान पहुंचाए जाने की घटना का भी संज्ञान नहीं लिया. जवाबी पत्र के लेखकों ने यह प्रश्न भी उठाया कि बेनेगल और उनके साथी तब क्यों चुप्पी साधे रहते हैं जब कश्मीर में अतिवादी, स्कूलों को जलाने का आव्हान करते हैं, जब आदिवासी क्षेत्रों में नक्सली हमले होते हैं या जब टुकड़े-टुकड़े गैंग, भारत को तोड़ने की बात करती है.

पहले पत्र के 49 हस्ताक्षरकर्ताओं ने देश में पिछले कुछ महीनों में एक विशेष प्रवृत्ति के उभार पर चिंता व्यक्त की थी. वे घटनाओं को अलग-अलग नहीं बल्कि एक प्रवृत्ति के भाग के रूप में देख रहे थे. उनकी चिंता निष्पक्ष स्त्रोतों द्वारा उपलब्ध करवाए गए आंकड़ों पर आधारित थी. नेशनल क्राईम रिकार्डस ब्यूरो के अनुसार, पिछले वर्षों की तुलना में, सन् 2016 में दलितों के विरूद्ध अत्याचार की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई और आरोपियों की दोषसिद्धी की दर घटी. सिटीजन्स रिलीजियस एंड हेट क्राईम वाच के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पिछले नौ वर्षों में हुईं लिंचिंग की घटनाओं में से 90 प्रतिशत, सन् 2014 के बाद हुईं हैं. इन घटनाओं के शिकारों में मुसलमानों का प्रतिशत62 और ईसाईयों का 12 था. मुसलमान, देश की आबादी का 14.23 प्रतिशत हैं और ईसाई, 2.30प्रतिशत.

जहां तक जय श्रीराम के नारे का सवाल है, इन चिंतित नागरिकों का कहना है कि अब तक जय राम, जय सियाराम और राम-राम आदि का इस्तेमाल अभिवादन के लिए किया जाता था. परन्तु अब, जय श्रीराम लोगों को अपमानित करने और उनका मखौल उड़ाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जैसा कि लोकसभा में मुस्लिम और टीएमसी सांसदों के शपथग्रहण के दौरान हुआ. देश में अनेक ऐसी घटनाएं हुईं हैं जब भीड़ ने मुसलमानों को घेर कर उन्हें जय श्रीराम का नारा लगाने पर मजबूर किया और बाद में पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी.

इस तरह की घटनाएं इसलिए हो रहीं हैं क्योंकि हिंदू राष्ट्रवादी आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों को लग रहा है कि अब देश में उनका राज है और वे जो चाहे कर सकते हैं. हम सबको याद है की पिछली केंद्र सरकार के मंत्रियों ने लिंचिंग की घटनाओं के आरोपियों और दोषसिद्ध अपराधियों का सार्वजनिक रूप से सम्मान किया था. अखलाक की हत्या में आरोपी की मृत्यु होने पर उसके शव को तिरंगे में लपेटा गया था और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने लिंचिंग के अपराध में दोषसिद्ध व्यक्तियों के जमानत पर रिहा होने पर फूलमालाएं पहना कर उनका अभिनंदन किया था.

यह कहता गलत है कि उदारवादियों ने कश्मीर घाटी से पंडितों के पलायन और सन 1984 के सिक्ख कत्लेआम की निंदा नहीं की. समाज के धर्मनिरपेक्ष तबके ने इन घटनाओं की निंदा करते हुए बहुत कुछ लिखा और सड़कों पर उतर कर भी उनका विरोध किया. समाज के कमजोर वर्गों पर अत्याचार की घटनाओं का भी यह तबका विरोध करता आया है. जहाँ तक कुछ अन्य घटनाओं – जैसे कैराना से हिन्दुओं के पलायन – का सवाल है, स्थानीय पुलिस ने ही उनका खंडन कर दिया है. चांदनी चौक की घटना की शुरुआत स्कूटर की पार्किंग को लेकर विवाद से हुई थी. मुसलमानों के नेतृत्व वाली स्थानीय अमन कमेटी ने मंदिर को हुए नुकसान को ठीक करवाया और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सद्भाव स्थापित करने के लिए, अंतरधार्मिक सामूहिक भोज भी आयोजित किए.

प्रजातंत्र में आस्था रखने वाले लोग आदिवासी क्षेत्रों में नक्सलवादी हिंसा का सतत विरोध करते आए हैं. जहां तक टुकड़े-टुकडे़ गैंग का सवाल है, यह सिर्फ उन लोगों को बदनाम करने की साजिश है जो सत्ताधारी दल और उसकी नीतियों के विरोधी हैं. यह बहुत अच्छा है कि प्रसून जोशी एंड कंपनी ने इन घटनाओं की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है. इन घटनाओं की उचित विवेचना की जानी चाहिए. श्याम बेनेगल और उनके साथी जिन घटनाओं (लिंचिंग व जय श्रीराम के नाम पर हिंसा आदि) की बात कर रहे हैं वे मात्र छुटपुट घटनाएं नहीं हैं. वे एक प्रवृत्ति का भाग हैं जो तेजी से बढ़ रही है. हाल में झारखंड के एक मंत्री ने एक मुस्लिम विधायक,अंसारी, को कैमरों के सामने जय श्रीराम कहने पर मजबूर करने की कोशिश की थी.

जिस मूल प्रश्न पर हमें विचार करना होगा वह यह है कि समाज में अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत क्यों बढ़ रही है. उनके विरूद्ध हिंसा, इसी नफरत का परिणाम है. हिन्दू राष्ट्रवादी, गाय, बीफ और इतिहास की साम्प्रदायिक व्याख्या आदि जैसे मुद्दों का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ बहुसंख्यकों को भड़काने के लिए कर रहे हैं. अमरीका ने पिछले साल लिंचिंग के खिलाफ एक कानून पारित किया था. भारत में इस तरह के कानून की सख्त जरूरत है. ‘‘हम बनाम वे‘‘ का विमर्श हमारे प्रजातंत्र के लिए शुभ नहीं है.

जिन 62 प्रतिष्ठित नागरिकों ने जवाबी पत्र लिखा है, उन्हें यह समझना चाहिए कि सरकार की आलोचना न तो राष्ट्रविरोध है और ना ही अराष्ट्रीयतावाद. सरकार की आलोचना से देश बदनाम नहीं होता. देश बदनाम होता है अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और उनमें बढ़ती असुरक्षा से, देश बदनाम होता है राम-राम के प्रेमपूर्ण अभिवादन के जय श्रीराम के आक्रामक नारे में बदलने से. सरकार की आलोचना हमारे लिए चिंता का विषय नहीं हो सकती. हमारे लिए चिंता का विषय है वह सोच या प्रवृत्ति, जिसके कारण धार्मिक समुदायों का ध्रुवीकरण हो रहा है. इस प्रक्रिया को तुरंत रोका जाना चाहिए. प्रतिष्ठित नागरिकों को शासकों का भाट बनने की बजाए उन्हें आईना दिखाना चाहिए. (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

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विचार

सिक्ख, ईसाई, दलित को छोड सिर्फ़ पंडित ही क्यों कश्मीर से भागे ?

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कश्मीर मे पंडित अपने कट्टर जातिवाद के चलते वहाँ के मुसलमानों से तो भेदभाव, हीनभाव व छुआछूत रखते थे, पर सिक्ख, ईसाई, दलित ओर ओबीसी से भी उतनी ही मात्रा मे हीनभाव रखते थे।

इसके चलते जब कश्मीर मे आतंकवाद ने दस्तक दी तो इसमें शामिल मुसलमानों के पहले टार्गेट यही जातिवादी पंडित हुए, जिन्होंने कश्मीरी मुसलमानों को जलील करने मे कोई कोर-कसर नहीं छोडी थी।

आप देख सकते है कि कश्मीर मे आतंकवाद के शिकार सिर्फ पंडित ही रहे हैं, ना कि सिक्ख, ईसाई, दलित, ओबीसी, क्योंकि वह भी मुसलमान की तरह पंडितों के कट्टर जातिवाद के शिकार थे, सो इन्होंने भी पंडितों को मारने और भगाने में मुसलमानों का भरपूर साथ-सहकार दिया। जिसके चलते कश्मीर मे सिक्ख, ईसाई, दलित, ओबीसी पर आतंकवादी वारदाते न के बराबर हुई और आज भी कश्मीर मे सिक्ख, ईसाई, दलित, ओबीसी मुसलमान एक दुसरे के साथ मिलजुल कर भाईचारे से रहते हैं।

आज अगर भारत का मीडिया और RSS-BJP कश्मीरी पंडितों के मुद्दे को इतना जोरो-शोर से हवा दे रही हैं तो इसका सिर्फ एक ही कारण हैं कि मीडिया ब्राह्मणवादी हैं ओर RSS-BJP ब्राह्मण की मातृ व पितृ संस्थायें हैं जो कश्मीर मे अपने ब्राह्मण भाईयों पे हुई ज्यादती का बदला इस तरह से इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देकर मुसलमानों से ले रहे हैं।

आर्यो के आने से पहले भारत मे वर्णव्यवस्था नहीं गणव्यवस्था थी. कुछ इतिहासकारो का मानना है कि विदेशी आर्य ब्राह्मण आने से पहले यहाँ भारत में ‘गण व्यवस्था’ आधारित राज्य शासन व्यवस्था थी. जनसमूह को ही गण कहा जाता था. जन ‘गण व्यवस्था’ द्वारा यहाँ के मूलनिवासी लोग संगठित एवम् समृद्ध थे.

आज से करीब 3500 साल पहले विदेशी आर्य ब्राह्मण ने ईरान से सिंधुघाटी के नगरो पर आक्रमण किया था. चालाक विदेशी आर्य ब्राह्मण ने यहाँ के मूलनिवासी को विभाजित करने हेतु उनकी ‘गण व्यवस्था’ को ख़त्म करने के लिए षड़यंत्र रूपी ‘वर्ण व्यवस्था’ ईश्वर एवम् धर्म के नाम काल्पनिक कथाओं के माध्यम से आहिस्ता आहिस्ता लागु की. एक समय ऐसा आया कि विदेशी आर्य ब्राह्मण की षड्यंत्रकारी ‘वर्ण व्यवस्था’ के प्रभाव से भारत के मूलनिवासीयों की ‘गण व्यवस्था’ टूटने लगी.

इस आदि ‘गण व्यवस्था’ को बचाने के लिए और विदेशी आर्य ब्राह्मण की षड्यंत्रकारी एवम् विभाजनकारी ‘वर्ण व्यवस्था’ को हटाने के लिए काफी लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा, आज भी वो ही संघर्ष जारी है.भारत में करीब 3500 साल पहले ‘गण व्यवस्था’ में संगठित रहनेवाले मूलनिवासी लोग आक्रमणकारी विदेशी आर्य ब्राह्मण की षड्यंत्रकारी एवम् विभाजनकारी क्रमिक असमतावादी ‘वर्ण व्यवस्था’ में फसकर अपना सच्चा और समृद्ध इतिहास भूलकर ब्राह्मणवादी ‘वर्ण व्यवस्था’ के गुलाम बन गए है.विश्व में यह सिलसिला चलता ही आया है कि जो लोग अपना सच्चा इतिहास भूल जाते है, वो कभी भी अपना सच्चा इतिहास नहीं बना पाते, और पीढ़ी दर पीढ़ी गुलाम बने रहते है।

साभार:तीसरी जंग

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नौकरियां जा रही हैं तो कोई बता क्यों नहीं रहा, मंदी है तो कहां है मंदी

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रवीश कुमार

अर्थव्यवस्था के आकार के मामले में भारत का स्थान फिसल गया है। 2018 में भारत पांचवे नंबर पर आ गया था अब फिर से सातवें नंबर पर आ गया है।

31 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड में ख़बर छपी है कि 2018 में भारत ने ब्रिटेन और फ्रांस को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का स्थान प्राप्त किया था। 2017 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.65 ट्रिलियन डॉलर का था। ब्रिटेन का 2.64 ट्रिलियन डॉलर का था और फ्रांस का 2.59 ट्रिलियन डॉलर का।

अब ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आकार 2.82 ट्रिलियन डॉलर है और फ्रांस का 2.78 ट्रिलियन डॉलर का हो गया है। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.73 ट्रिलियन डॉलर का हो गया है। भारत अब सातवें नंबर पर आ गया है।

आटोमोटिव कंपोनेंट मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ने कहा है कि अगर ऑटो सेक्टर में मंदी जारी रही तो जल्दी ही दस लाख लोगों की नौकरियां जा सकती हैं। इस सेक्टर में 50 लाख लोगों को रोज़गार मिला है। इस सेक्टर में गाड़ियों के कल पुर्ज़े बनाने का काम होता है। जब यह प्रश्न पूछा गया कि क्या छंटनी शुरू हो गई है तब एसोसिएशन ने जवाब दिया कि इस सेक्टर में 70 फीसदी लोग कांट्रेक्ट पर काम करते हैं। जब मांग होती है तो काम मिलता है। इस जवाब से आपको इशारा साफ साफ मिल जाता है।

जुलाई में मारुति कंपनी की बिक्री 33.5 प्रतिशत घट गई है।

जून महीने में कोर सेक्टर का ग्रोथ चार साल में सबसे कम रहा है। 0.2 प्रतिशत। मई में इस सेक्टर का ग्रोथ रेट 4.3 प्रतिशत था। एक महीने में 4.3 प्रतिशत से 0.2 प्रतिशत आने का मतलब है बिजली की गति से फैक्ट्रियां ठंडी पड़ गई होंगी। 50 महीने में यह सबसे अधिक गिरावट है। कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, खाद, स्टील, सीमेंट और बिजली उद्योग को कोर सेक्टर कहा जाता है।

इंडियन ऑयल का सकल मुनाफा 47 प्रतिशत घट गया है।

विदेशी निवेशकों ने जुलाई महीने में भारतीय शेयर बाज़ार स 12,000 करोड़ निकाल लिए हैं। पिछले 9 महीने में यह सबसे अधिक है। अक्टूबर 2018 में 28,921 करोड़ निकाल लिया गया था। टैक्स के अलावा यह भी कारण है कि इन निवेशकों को लगता है कि भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार थम रही है। कारपोरेट की कमाई घट गई है। उपभोक्ता कम ख़रीदारी कर रहा है।

मनी कंट्रोल वेबसाइट पर क्षितिज आनंद की रिपोर्ट है। जुलाई महीने में शेयर बाज़ार का प्रदर्शन 2002 के बाद पहली बार इतना ख़राब रहा है। 17 साल में पहली बार हुआ है जब जुलाई महीने में सेंसेक्स में 5.68 प्रतिशत की गिरावट आई है। सेंसेक्स में 500 कंपनियां दर्ज हैं। 50 फीसदी कंपनियों के शेयर दो अंकों में गिरे हैं।

BSNL जुलाई महीने की सैलरी नहीं दे सका। अगस्त में देगा। 31 जुलाई को सैलरी आनी थी। नहीं आई। चेयरमैन ने कहा है कि 4-5 अगस्त को आएगी। BSNL ने 1.76 लाख कर्मचारी काम करते हैं।

अर्थव्यवस्थाएं ठीक भी हो जाती हैं मगर मोदी सरकार के दौर में अर्थव्यवस्था ख़्वाब ही दिखाते रह गई।

भारत में अरबपतियों की संख्या कम हो गई है। शेयर बाज़ार में गिरावट के कारण अरबपतियों की संपत्ति घट गई है। 2018 में ऐसे प्रमोटर की संख्या 90 हो गई थी जो अब तक की सबसे अधिक संख्या थी। लेकिन अब घट कर 71 हो गई है। इनकी भी कुल संपत्ति घट गई है। पिछले मार्च में 353 बिलियन डॉलर थी, जो 326 बिलियन डॉलर हो गई है।

एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफार्म ने बताया है कि 2018 में बीजेपी की चल अचल संपत्ति में 22 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। कांग्रेस का 15 प्रतिशत घट गया है।

अर्थव्यवस्था में ऊपर नीचे होता रहता है। बिल्कुल चिंता न करें। कल फिर ठीक हो जाएगा।

न्यूज़ चैनलों के प्रोपेगैंडा में खो जाएं। मस्त रहें। हिन्दू मुस्लिम के और भी टॉपिक आएंगे। हमारी आंखों के सामने पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं लेकिन उसका फायदा है कि लोग नौकरी के सवाल पर नहीं सोच रहे हैं।

कई लोग लिख रहे हैं कि अर्थव्यवस्था का हाल इसलिए है कि प्रधानमंत्री डिस्कवरी चैनल के किसी शो में व्यस्त हैं। यह आरोप ठीक नहीं है। प्रधानमंत्री नोटबंदी के समय तो डिस्कवरी चैनल के लिए शूटिंग नहीं कर रहे थे। वे दिन रात काम कर रहे हैं तभी यह हाल है। 5 साल में अर्थव्यवस्था को लेकर कहानी ही बनती रही। उनके काम का नतीजा दिखाई नहीं देता है। प्रधानमंत्री ने शूटिंग के लिए हाँ बोलकर ठीक किया। डिस्कवरी चैनल के बहाने कम से कम कुछ काम तो किया। शो की रेटिंग आएगी। उनकी लोकप्रियता पर बहस होगी।

भारत के नौजवान दुनिया के पहले नौजवान हैं जिन्होंने रोज़गार के सवाल को ही ख़त्म कर दिया है। उन्होंने जिस पुलवामा के नाम पर वोट दिया था उसके होने के दिन तो प्रधानमंत्री शूटिंग कर रहे थे। अच्छा हुआ कि राहुल गांधी ने यह ग़लती नहीं की वरना न्यूज़ चैनल उन जगहों पर जाकर आज तक रिपोर्ट कर रहे होते। मीडिया से भी आग्रह है कि वह ज़्यादा से ज़्यादा विपक्ष को लेकर सवाल करे। ताकि सरकार को कोई तकलीफ न हो।

जो लोग सरकारी परीक्षाओं के भरोसे बैठे हैं वे रेलवे में 3 लाख कर्मचारियों की छंटनी की ख़बर मुझ तक फार्वर्ड न करें। इन कर्मचारियों से भी हिन्दू मुस्लिम के सवाल पूछ दें, गारंटी है कि ये अपना दर्द भूल जाएंगे। लाखों लोगों की नौकरियां दांव पर हैं, लाखों लोग शांत हैं।

10 लाख लोगों का काम छिन रहा है। पता भी नहीं है कि कितने लोगों का काम ठप्प पड़ रहा है। इन लोगों ने भी हमारी टाइम लाइन पर आकर अपनी व्यथा नहीं बताई है। क्या पता बिजनेस ठंडा होते ही ये लोग फेसबुक बंद कर देते होंगे। नौकरी जाते ही लोग टीवी नहीं देखते होंगे।

जो भी है कि चिन्ता न करें। फिर से बहार आएगी। नौकरी का जाना देश के लिए अच्छा है। घर बैठकर टीवी पर और बहस देखने का मौका मिलेगा। आप पोज़िटिव फील करेंगे। ज़्यादा कोई सवाल करे कि घर क्यों बैठे हो, क्यों मोदी मोदी करते हो तो उल्टा सवाल दाग दीजिए कि राहुल गांधी के बारे में क्या राय है। कांग्रेस क्या ठीक है। पक्का उसकी बोलती बंद हो जाएगी।

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(रवीश कुमार एक जाने माने पत्रकार हैं, ये लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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