क्या मुस्लिम सांसदों का प्रतिनिधित्व घटा रही सेक्युलर पार्टियां…?

0

By Muslim Mirror Staff-reporter

लोकसभा चुनाव 2019 अपने बीच पड़ाव में आ चुकी है जिसमें बिहार मधुबनी सीट को लेकर राजद और कांग्रेस नेताओं में कई मतभेद और नाराज़गी भी देखा गया. दरभंगा से सांसद रहे फातमी मधुबनी सीट से टिकट नहीं मिलने से नाराज चल रहे थे. इसकी वजह महागठबंधन के सहयोगी दल वीआईपी ने बद्री दूबे को मधुबनी से उम्मीदवार बनाना रहा.

वही बिहार में महागठबंधन के घटक दलों के बीच चुनावी तालमेल से नाराज़ और मधुबनी सीट पर पार्टी के निर्णय के खिलाफ जा कर चुनाव लड़ने वाले डॉ शकील अहमद को कांग्रेस ने निलंबित कर दिया छठे चरण तक कांग्रेस के स्टार प्रचारक रहे डॉ शकील अहमद का नाम सातवें चरण में हटा दिया गया. हालांकि उन्होंने इस चुनाव में किसी भी कांग्रेस प्रत्याशी के लिए प्रचार नहीं किया.

मधुबनी लोकसभा सीट से सांसद रहे डॉ शकील अहमद को ये मलाल था कि पार्टी ने इस सीट पर तालमेल के लिए महागठबंधन के बीच सही तरीके से अपनी बातों को नहीं रखा. हालांकि कांग्रेस के लिए डॉ शकील अहमद को मुस्लिम फेस माने जाते रहे हैं.

शकील अहमद 1998 और 2004 में मधुबनी सीट से लोकसभा सदस्य रहे थे. वे 1985, 1990 और 2000 में विधायक चुने गए थे. शकील ने राबड़ी देवी के नेतृत्व वाली बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कार्य किया तथा 2004 में केंद्र में सत्तासीन रहे मनमोहन सिंह की सरकार में संचार, आईटी और गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री रहे.

दरअसल मो अली अशरफ फातमी और डॉ शकील अहमद को मुसलमानों का समर्थन हासिल है. पार्टी से टिकट नहीं मिलने से मुसलमानो में इसको लेकर काफी नाराज़गी है. लोगों की माने तो टिकट ना देकर इस सीट पर मुस्लिम लीडरशिप को ख़त्म करने की साज़िश माना जा रहा है.

मधुबनी के रहने वाले 34 वर्षीय वकाश हुसैन पेशे से वकील हैं उन्होंने Muslim Mirror से बताया कि जिस तरह से महागठबंधन ने इन सीटों पर अपने फायदे के लिए मुस्लिम नेतृत्यों को ख़त्म किया है. भाजपा हो या कांग्रेस ये कभी भी मुस्लिम का भला नहीं कर सकती।

पटना के रहने वाले मौलाना खुर्शीद अली कहते हैं कि केंद्रीय मंत्री रहे शकील अहमद के दादा और पिता दोनों ही कांग्रेस के विधायक रह चुके है ऐसे में कांग्रेस उनको सीट ना देकर अपने ही पार्टी के सदस्य से गद्दारी कर गई. मुस्लिम समाज में पहले ही प्रतिनिधित्व करने वालों की कमी रही है ऐसे में इस तरह से लिया गया फैसला सिर्फ धोखा देने जैसा है.

हाजी इक़बाल का कहना है कि मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक के तौर पर समझा जाता रहा है, ये बात मुसलमानों को हर हाल में समझना चाहिए। विधानसभा के चुनाव के बाद भी ठीक ऐसा ही हुआ था अब्दुल बारी अली सिद्दीकी को डिप्टी सीएम बनने की बात थी लेकिन ऐन वक़्त पर तेजस्वी को इसका नेतृत्व सौंप दिया गया. वोट मांगने से अब मुस्लिम वोट नहीं करेंगे सभी पार्टियों को ये समझना होगा कि मुस्लिम वोट के लिए मुसलमानों को टिकट देना भी ज़रूरी है.

बताते चले कि बिहार में 40 लोकसभा में कांग्रेस, राजद गठबंधन ने 40 में से सात सीटों पर मुसलमानों को टिकट दिया है जबिक बीजेपी-जदयू ने सिर्फ़ एक मुसलमान को टिकट दिया है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here