Connect with us

देश

असम: NRC की फ़ाइनल लिस्ट जारी, 19 लाख से अधिक लोग सूची से बाहर

Published

on

मुस्लिम मिरर स्टाफ़

नयी दिल्ली: शनिवार सुबह 10 बजे असम में नेशनल सिटीजन रजिस्टर यानी एनआरसी की आख़िरी लिस्ट जारी की गयी है. जारी की गयी लिस्ट में 19,06,657 लोगों का नाम शामिल नहीं हैं जबकि कुल 3,11,21,004 नामों को शामिल किया गया है.

वहीँ इस मामले पर केंद्र सरकार और असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने असम के लोगों को भरोसा दिलाते हुए कहा है कि, लिस्ट में नाम न होने पर किसी भी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाएगा और साथ ही उसे अपनी नागरिकता साबित करने का हरसंभव मौका दिया जाएगा.

इसके अलावा जिन लोगों का नाम लिस्ट में नहीं होगा वो फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल में अपील कर सकेंगे.

गौरतलब है कि, सरकार ने अपील दायर करने की समय सीमा भी 60 से बढ़ाकर 120 दिन कर दी है.

एनआरसी की फ़ाइनल लिस्ट आने से ठीक पहले असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा है कि “एनआरसी की लिस्ट में नाम नहीं आने वाले लोगों को जरा भी घबराने की ज़रूरत नहीं क्योंकि, गृहमंत्रालय ने पहले ही सुनिश्चित कर दिया है जिनका नाम इस लिस्ट में नहीं होगा उनको फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल में जाकर अपील करने का अधिकार होगा. इस मामले में सरकार की तरफ से उनकी हरसंभव मदद की जाएगी.”

उन्होंने कहा कि, “फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल में अपील करने का समय अब बढ़ाकर 60 की बजाए 120 दिन कर दिया गया है, ऐसे में सभी लोग शांति और क़ानून व्यवस्था बनाए रखें.”

आपको बता दें कि एनआरसी को असम में रह रहे भारतीय नागरिकों की एक लिस्ट तैयार करने के रूप में लागू किया गया था. दरअसल, ये प्रक्रिया राज्य में अवैध तरीक़े से घुस आए तथाकथित बंगलादेशियों को चिन्हित करने के लिए लागू किया गया है.

गौरतलब है कि, असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिजेंस (एनआरसी) को सबसे पहले 1951 में बनाया गया था ताकि ये तय किया जा सके कि कौन इस राज्य में पैदा हुआ है और भारतीय है और कौन पड़ोसी मुस्लिम बहुल बांग्लादेश से आया हुआ हो सकता है.

वहीँ अब इस रजिस्टर को पहली बार अपडेट किया जा रहा है. इसके मुताबिक सिर्फ उन लोगों को भारतीय नागरिक के तौर पर स्वीकार किया जायेगा जो ये साबित कर पाएं कि वे 24 मार्च 1971 से पहले से राज्य में रह रहे हैं. क्यूंकि ये वो तारीख है जिस दिन पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हुआ था और अपनी आज़ादी की घोषणा की थी.

आपको बता दें कि, एनआरसी सूची में बंगाली हिंदू और मुस्लिम दोनों को शामिल किया गया है.

गौरतलबी है कि, 30 जुलाई 2018 में सरकार ने एक फ़ाइनल ड्राफ़्ट प्रकाशित किया था जिसमें असम में रह रहे करीब 41 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं थे. इसके बाद फिर 26 जून 2019 को एक नई अतिरिक्त लिस्ट जारी की गयी जिसमें तक़रीबन एक लाख नए नामों को सूची से बाहर किया गया.

इसके प्रकिर्या के बाद सरकार ने लोगों को एक और मौका देते हुए उन्हें अपनी ‘लेगेसी’ और ‘लिंकेज’ को साबित करने वाले काग़ज़ एनआरसी दफ्तर में जमा करने के आदेश दिए.

आपको बता दें कि, उन काग़ज़ों में 1951 की एनआरसी में आया उनका नाम, 1971 तक की वोटिंग लिस्ट में आए नाम, ज़मीन के काग़ज़, स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के सबूत, जन्म प्रमाण पत्र और माता-पिता के वोटर कार्ड, राशन कार्ड, एलआईसी पॉलिसी, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, रेफ़्यूजी रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट जैसी चीज़ें शामिल हैं.

इस पूरी प्रकिया के बाद आज 31 अगस्त, 2019  को एन आर सी की अंतिम सूची जारी की गयी है.

Continue Reading
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

देश

रांची: बुर्क़ा पहन दीक्षांत समरोह में शामिल हुई मुस्लिम टॉपर, तो कॉलेज ने नहीं दी डिग्री

Published

on

रांची: झारखंड की राजधानी राजधानी के मारवाड़ी कॉलेज में ग्रेजुएशन सेरेमनी के दौरान एक मुस्लिम छात्र को सिर्फ इस वजह से डिग्री देने से इनकार कर दिया गया, क्यूंकि वो उस समरोह में बुर्का पहन कर पहुंची थी.

दरअसल खबर के मुताबिक, लड़की का नाम निशत फातिमा है और वो ऑल ओवर बेस्ट ग्रेजुएट चुनी गयी थी. लेकिन जब समारोह में निशत का नाम पुकारा गया तो, नाम बुलाये जाने के साथ ही मंच से घोषणा कर दी गयी कि वह कॉलेज द्वारा तय ड्रेस कोड में नहीं आई हैं, इसलिए समारोह में उन्हें डिग्री नहीं दी जाएगी.  हालांकि इस घटना के बाद दूसरे टॉपर्स को मेडल और डिग्री देने की प्रक्रिया चलती  रही.

आपको बता दें कि, निशत फातिमा ने सत्र 2011-14 तक रांची के मारवाड़ी कॉलेज से स्नातक की शिक्षा ली है. और उन्होंने बीएसई मैथ्स ऑनर्स में 93 फीसदी मार्क्स हासिल किये हैं, जो की इस विशेष सत्र के सबसे अधिक अंक थे. इसी कारण समारोह में निशत को सबसे पहले गोल्ड मैडल लेना था.

वहीँ टॉपर्स को डिग्री देने के लिए राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू और रांची विवि के कुलपति डॉ रमेश कुमार पांडेय मौजूद थे.

गौरतलब है कि ग्रेजुएशन सेरेमनी को लेकर कॉलेज की तरफ से ड्रेस कोड तय किया गया था. जिसमें छात्रों को सफेद रंग का कुर्ता पायजामा और छात्राओं को सलवार-सूट, दुपट्टा या साड़ी ब्लाउज में आना था. ड्रेस कोड के सम्बन्ध में कॉलेज ने पहले ही नोटिस जारी किया था.

वहीँ इस पूरी घटना पर निशत के पिता मुहम्मद इकरामुल हक का कहना है कि, बुर्का हमारी परंपरा में शामिल है. उन्होंने बताया कि, निशत कॉलेज के दौरान भी बुर्का पहन कर ही क्लास करती थी.

Continue Reading

देश

अयोध्या मध्यस्थता पैनल ने बातचीत फिर से शुरू करने के लिए किया सुप्रीम कोर्ट का रुख

Published

on

मुस्लिम मिरर डेस्क

नई दिल्ली: अयोध्या मध्यस्थता समिति ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक छोटा ज्ञापन दायर कर राम मंदिर व् बाबरी मस्जिद विवाद पर बातचीत फिर से शुरू करने की अनुमति मांगी है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एफ.एम.आई. कलिफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय अयोध्या पैनल इस पर सुनवाई कर रहा है।

पैनल के अनुसार, धार्मिक विभाजन के पक्षकारों ने अयोध्या राम मंदिर विवाद को निपटाने के लिए बातचीत फिर से शुरू करने के लिए पैनल से संपर्क किया है। हालांकि समिति ये भी नहीं चाहती कि मामले में सुनवाई रुके।

गौरतलब है कि, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली एक संविधान पीठ अयोध्या मामले पर दैनिक सुनवाई कर रही है।

Continue Reading

देश

तबरज अंसारी को इंसाफ दिलाने के लिए झारखंड भवन पर किया गया जोरदार प्रदर्शन, हत्यारों पर धारा 302 लगाये जाने की मांग

Published

on

नई दिल्ली: झारखंड के सरायकेला खरसावां में 4 माह पूर्व हुई तबरेज़ अंसारी की मोब लिंचिंग के आरोपियों पर से हत्या की धारा 302 को हटा कर गैर इरादतन हत्या की धारा  304 लगाये जाने पर यूनाइटेड अगेंस्ट हेट की टीम ने शुक्रवार को दिल्ली स्थित झारखंड भवन का घेराव किया और न्याय व संवैधानिक मूल्य को बचाने के लिए एकजुटता का आह्वान किया।

इस प्रदर्शन में बड़ी तादाद में सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र एवं शिक्षक, महिलाएं, बच्चे और आम नागरिक शामिल हुए। इस विरोध प्रदर्शन में आए हुए वक्ताओं ने कहा कि, हम सभी ने 20 जून के आसपास सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो को देखा है, जिसमें तबरेज़ अंसारी को एक पोल से बांध कर उसे बेरहमी से पीटा जा रहा था। उसको तड़पा तड़पा कर मारा जा रहा था और हत्या करने वाले हत्यारों की पहचान करना मुश्किल नहीं था।

चौंकाने वाली बात यह है कि झारखंड पुलिस को घटनास्थल तक पहुंचने में आठ घंटे लग गए थे. वहीँ पुलिस ने  आरोपियों को गिरफ्तार करने के बजाय तबरेज को ही हिरासत में लेकर और उसे उचित चिकित्सकीय देखभाल न देकर जेल में डाल दिया था। जिसके बाद तबरेज ने चार दिन बाद दम तोड़ दिया था।

गौरतलब है कि, तबरेज अंसारी की निर्मम हत्या के विरोध में पूरा देश भड़क उठा  था और इस हत्या का अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी विरोध प्रदर्शन हुए थे। जिसके बाद झारखण्ड पुलिस ने इस अपराध के लिए पप्पू मंडल और कुछ अन्य लोगों को हिरासत में लिया था।

तक़रीबन ढाई महीने के बाद, पुलिस ने केस की  चार्जशीट से हत्या का आरोप हटा तबरेज की मौत को एक स्वाभाविक घटना के रूप में चित्रित किया और पोस्ट मार्टम रिपोर्ट में दिखाया कि तबरेज़ की मौत भीड़ द्वारा की गयी पिटाई के कारण नहीं बल्कि हार्ट अटैक की वजह से हुई थी .

विरोध प्रदर्शन के अंत में रेजिडेंट आयुक्त झारखंड भवन, नई दिल्ली के माध्यम से मुख्यमंत्री, झारखंड को एक ज्ञापन भी दिया गया जिसमे मांग की गई :

1) तबरेज अंसारी के हत्यारों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत मामला दर्ज करें।

2) उन पुलिस अधिकारियों को बुक करें जिन्होंने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की जिसके कारण तबरेज अंसारी की मृत्यु हुई।

3) सुप्रीम कोर्ट की उस गाइडलाइन को लागू करें, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बनाम तहसीन पूनावाला के मामले में भीड़ को रोकने के लिए जारी किया था। आपके राज्य में लिंचिंग के मामलों की दर पूरी तरह से चिंताजनक है और 2018 में जारी की गई सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन की घोर अनदेखी की गई है।

यूनाइटेड अगेंस्ट हेट  की टीम ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री से एक बार फिर से इस विशेष मामले में हस्तक्षेप करने का मांग की और तबरेज अंसारी को मरणोपरांत न्याय सुनिश्चित करने, और इन जैसी क्रूर घटनाओं को भविष्य में होने से रोके जाने के लिए तत्पर प्रयास की मांग की है।

Continue Reading

Trending