मोदी जी क्या आप के “राम राज्य” में मज़दूर ऐसे ही मरते रहेंगे ?

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फ़ातिमा ताज
जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया पर राष्ट्र से रूबरू होने कि बात कि पूरे देश मे एक हलचल मच गयी। नौजवानों के बिच एक चर्चा छिड़ गयी के क्या इस बार भी पि.एम देश वासीयों के लिए कोई अतरंगी से काम का ऐलान करने वाले हैं।

हर कोई अपने टीवी या फोन पर ताक लगाए बैठा था प्रधानमंत्री कौन सा अनोखा संदेश देंगे।

देशवासियों के इंतजार कि घड़ी लगभग रात 9:00 बजे ख़त्म हुई जब सभी बड़े न्यूज़ चैनल पर पी.एम का भाषण दिखाया गया। प्रधानमंत्री ने अपनी भाषण में 20 लाख करोड़ रुपए कि बात कि इन रुपयों का आंकड़ा देश कि आबादी से भी बड़ा है।

उन्होंने इन रुपयों को आर्थिक पैकेज का नाम दिया आगे वे यह भी कहते हैं कि इन रुपयों का इस्तेमाल देश के हर वर्ग के लिए होगा। इतने बड़े रक़म की बात सुनते ही देश वासियों को प्रधानमंत्री का वह वादा याद आ गया जब उन्होंने कहा था कि हर देशवासी के बैंक खाते में ₹1500000 डिपॉज़िट किए जाएंगे। वह देशवासियों को आत्मनिर्भर होने की सलाह देकर अपना 30 मिनट का लंबा भाषण खत्म करते हैं।

पिछले कई सालों से देश का जी.डी.पी लगातार गिरता ही जा रहा है, जिसका भुगतान हम सब कर रहे हैं और देश के बिगड़ते हालात किसी से छिपे नहीं हैं। हिंदू मुस्लिम समुदाय के बिच भेदभाव कि लकीर खींच दी गई है। अपने भाषणों में तो प्रधानमंत्री और बीजेपी नेताओं ने हिंदुस्तान को राम राज्य बनाने की बात कई बार की लेकिन हिंदुस्तान के ज़्यादातर नागरिक को यह हिटलर राज्य बनता दीख रहा है।

इस बिच हर नागरिक कि यह ज़िम्मेदारी है के वह किसी भी ख़बर या अफवाह पर यूंही यक़ीन ना करें बल्कि उसकी सही जांच पड़ताल करें। इस समय हमें ना सिर्फ़ कोरोना से बल्कि ग़रीबोंरों के हक़ के लिए एकजुट होकर लड़ना है।

प्रवासी/माइग्रेंट मज़दूरों कि ख़बरें भी लगातार सनसनीख़ेज हैं पर क्या राजनेताओं के कानों तक यह ख़बरें नहीं पहुंचती। अब तक कई मज़दूर सरकार की लापरवाही की वजह से अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं। देश के हर कोने से प्रवासी मज़दूर सिर्फ़ यही गुहार लगा रहा है “लॉकडाउन के दौरान हमें अपने घर लौटा दिया जाए”

कामकाज बंद होने कि वजह से उनकी माली हालत बद से बदतर हो गई है। जहां पूरा देश कोरोना जैसी महामारी के फ़िक्र में डूबा है इन ग़रीबों कि फ़िक्र सिर्फ़ इतनी है कि किस तरह दो वक़्त का खाना इकट्ठा किया जाए, ताकि वे अपना और अपने परिवार जनो का पेट पाल सकें।

देखना यह है के इन मामलो में कोई बड़ा क़दम जल्द उठाया जाता है या नही। भारत सरकार से हम आग्रह करते हैं कि वक़्त रहते ही वह देश के वंचित वर्गों तक मदद पहुंचाए, इस वक़्त सबसे ज़्यादा निधि/फंड की ज़रूरत मज़दूरों को है।

औरंगाबाद में (आदी वासी) मज़दूरों के साथ ट्रेन दुर्घटना हम अभी तक नहीं भूले, कई जांचकर्ताओं ने इसे सामूहिक आत्महत्या बताया तो कुछ ने इसे बुरा हादसा क़रार दिया।

इन रुपयों को ख़रचने कि शुरुआत मज़दूरों कि “घर वापसी” से कि जाए। उनके लिए बस व ट्रेन का इंतज़ाम किया जाए जिससे वे आसानी से अपने घर लौट सके और उनसे कोई किराया ना वसूला जाए।

हर समुदाय और क्षेत्र के लोग मज़दूरों कि स्थिति को लेकर फ़िक्रमंद हैं। सब सोशल मीडिया पर लगातार अपनी चिंता व गुस्सा जता रहे हैं। आम जनता का यह अधिकार है के उनको साधारण सुविधाएं व सुरक्षा दी जाए खास कर तब जब वह नागरिक वंचित वर्ग से हो।

देश के केंद्र और राज्य सरकारों को ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी नागरिक भूखमरी से या महामारी से ना मरे। अगर आने वाले समय में जल्द ही देश कि अर्थव्यवस्था/इकोनॉमी में कोई ख़ास सुधार नहीं आया तो पि.एम फिर से एक बार आम नागरिक के जवाबदेह होंगे और उनको जनता के कटघरे में खड़ा किया जाएगा।

केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री अपने नागरिक के हित में गंभीर हो कर सोचे। अब समय प्रस्ताव रखने का नहीं बल्कि बदलाव कि तरफ काम करने का है।

आशा करते हैं इस बार सरकार हमे निराश नहीं करेगी और अपने किए गए वादों को ईमानदारी से निभाएगी।

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