मुसलमानों को अयोध्या फैसले के खिलाफ न बोलने की धमकी दे रही है पुलिस- ज़फ़रयाब जिलानी

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नई दिल्ली:  हाल ही में अयोध्या मंदिर मस्जिद विवाद पर आये फैसले के बाद आज ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने आरोप लगाया है कि अयोध्या जिला प्रशासन मुसलामानों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाने से रोक रहा है.

एआईएमपीएलबी के सदस्य और यूपी सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने लखनऊ में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा कि, अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में पुलिस प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के फैसले (9 नवंबर को सुनाया गया) के खिलाफ बयान नहीं देने के लिए दबाव डाल रहा है।

जिलानी ने आरोप लगाते हुए आगे कहा कि, शायद यही कारण था कि मुकदमे के मुख्य अपीलकर्ता इकबाल अंसारी, शीर्ष अदालत के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर किये जाने के फैसले का विरोध कर रहे हैं।

इकबाल अंसारी, जिनके पिता हाशिम अंसारी थे जो इस मामले में पहले और सबसे पुराने अपीलकर्ता थे, उन्होंने अयोध्या के फैसले को चुनौती नहीं देने का फैसला किया है। एक अन्य मुस्लिम अपीलकर्ता, हाजी महबूब ने भी इसी तरह की भावनाओं को ज़ाहिर किया है।

जिलानी ने यह भी आरोप लगाया कि लखनऊ जिला प्रशासन ने एआईएमपीएलबी को अपने पूर्व निर्धारित स्थान दारुल-उलूम नदवतुल उलमा पर बैठक आयोजित करने की अनुमति नहीं दी।

जिलानी ने कहा कि, “मैं मदरसा में बैठक की अनुमति नहीं देने के लिए लखनऊ प्रशासन की निंदा करता हूं। तथा मौलाना राबे हसनी नदवी (नादवतुल उलमा के कुलपति और एआईएमपीएलबी के चौथे अध्यक्ष) को जिला प्रशासन ने धमकी दी थी और अपने परिसर में बैठक की अनुमति नहीं देने के लिए कहा था।

बोर्ड की अहम बैठक लखनऊ के ओल्ड सिटी इलाके में मुमताज़ डिग्री कॉलेज में हुई।

जिलानी राज्य की राजधानी में एआईएमपीएलबी की बैठक के बाद मीडिया को संबोधित कर रहे थे. बैठक में यह निर्णय लिया गया कि बोर्ड संविधान पीठ (तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजीत गोगोई, CJI- पदनाम न्यायमूर्ति एसए शामिल) के फैसले के खिलाफ अदालत में एक समीक्षा याचिका दायर करेगा.

तथा बोर्ड ने मस्जिद के निर्माण के लिए मुसलमानों को दी गई पांच एकड़ जमीन को स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया।

आपको बता दें कि, 9 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से फैसला कर, पूरे 2.77 एकड़ विवादित भूमि (जहां बाबरी मस्जिद एक थी) हिंदुओं को दे दी और केंद्र को आदेश दिया कि मस्जिद या जो भी ढांचा चाहते हैं, उसके लिए मुसलमानों को 5 एकड़ वैकल्पिक भूमि दी जाए।

वहीँ AIMPLB के संयोजक डॉ कासिम रसूल इलियास ने कहा, “बोर्ड (AIMPLB) ने फैसला किया है कि, हम  फैसले के 30 दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट में एक समीक्षा याचिका दायर करेंगे।”

उन्होंने आगे कहा कि मस्जिदें मुसलमानों की धार्मिक प्रथाओं के लिए आवश्यक हैं और किसी अन्य स्थल पर उसी मस्जिद का निर्माण इस्लामी कानून के अनुसार स्वीकार्य नहीं है क्योंकि मस्जिद को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि बाकी सात प्रतिनिधियों में से पांच समीक्षा याचिका पर जाने के लिए तैयार हैं।

तीसरे मुस्लिम याचिकार्ता मोहम्मद उमर ने कहा था कि, वह रविवार को लखनऊ में अपनी बैठक में एआईएमपीएलबी द्वारा जो भी निर्णय लेंगे, उसका पालन करेंगे।

उन्होंने कहा, ‘फैसले में कुछ विसंगतियां हैं और मुझे लगता है कि इसमें सुधार की गुंजाइश है। एआईएमपीएलबी में मेरे सीनियर्स मुझसे जो भी करने को कहेंगे, मैं करूँगा।

वहीँ उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि उसने फैसले को स्वीकार कर लिया है और उसे चुनौती देने की कोई गुंजाइश या आधार नहीं दिखता है। चूंकि AIMPLB टाइटल सूट केस का पक्षकार नहीं था, इसलिए उसे समीक्षा याचिका दायर करने के लिए सात मुस्लिम वादियों में से कम से कम एक के सहयोग की जरूरत होगी।

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