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विचार

धार्मिक राष्ट्रवादः नायक और विचारधारा

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राम पुनियानी

समावेशी बहुवाद पर आधारित वह राष्ट्रवाद, जो भारत के स्वाधीनता संग्राम की आत्मा था, आज खतरे में है. इसका कारण है संघ परिवार की राजनीति का बढ़ता प्रभामंडल. संघ से जुड़े अनेकानेक संगठन, हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन के सभी क्षेत्रों में घुसपैठ कर अपना वर्चस्व स्थापित कर रहे हैं. इसके साथ ही, यह आख्यान निर्मित करने का प्रयास हो रहा है कि हिन्दू राष्ट्रवाद, अनादिकाल से भारतीय परंपरा का हिस्सा था. हिन्दू राष्ट्रवाद के महिमामंडन की राह में सबसे बड़ी बाधा है इस राष्ट्रवाद की स्वाधीनता आंदोलन में शून्य भूमिका और इसका अंग्रेजों का पिछलग्गू होना. इस तथ्य को छुपाना, हिन्दू राष्ट्रवाद के पैरोकारों के लिए अपरिहार्य है. यही कारण है कि वे दिन-रात मेहनत कर यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके वैचारिक पूर्वजों ने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया था. स्वाधीनता संग्राम से अपने विश्वासघात को छुपाने के लिए वे कहानियां गढ़ रहे हैं. वे उन नायकों को अपना बताने का प्रयास कर रहे हैं जिनके गांधी या नेहरू से रणनीतिक मतभेद थे या जिन्होंने स्वाधीनता पाने के लिए अपनी अलग राह चुनी थी.

इस दिशा में पहला प्रयास था मोहनदास करमचंद गांधी के अनन्य शिष्य, जवाहरलाल नेहरू के निकट सहयोगी और जीवनपर्यंन्त कांग्रेस के निष्ठावान सिपाही, सरदार वल्लभभाई पटेल को हिन्दू राष्ट्रवादी ढ़ांचें में ढ़ालने की कोशिश. इधर-उधर से कुछ असंबद्ध घटनाओं और तथ्यों को उद्धत कर यह कहा जा रहा है कि अगर सरदार पटेल देश के प्रथम प्रधानमंत्री होते तो आज कश्मीर समस्या न होती. अब, यह भी कहा जा रहा है कि महात्मा गांधी ने भगत सिंह की जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया था. इस ऐतिहासिक तथ्य को नजरअंदाज किया जा रहा है कि गांधीजी ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी रूकवाने की हरचन्द कोशिश की थी परंतु अंग्रेज शासक, भगत सिंह और उनके साथियों को माफी देने के लिए तैयार नहीं थे. यह दुष्प्रचार करने वाले इस तथ्य की भी अनदेखी कर रहे हैं कि भगत सिंह ने अंग्रेजों से माफी मांगने या अपनी सजा कम करने का अनुरोध करने से साफ इंकार कर दिया था. भगत सिंह एक सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे और अपने आचरण से पूरे देश को प्रेरित करना चाहते थे.

इस मुद्दे पर चर्चा का संदर्भ यह है कि अभी हाल (अगस्त 2019) में दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में भगत सिंह, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और सावरकर की एक-दूसरे से जुड़ी हुई मूर्तियां लगाई गईं और उन्हें भारतीय स्वाधीनता संग्राम की त्रिमूर्ति बताया गया. दरअसल, यह सावरकर को नेताजी और भगत सिंह के समकक्ष बताने के एजेंडे का हिस्सा है – यह बताने का प्रयास कि इन दोनों की तरह, सावरकर भी ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी थे. हम सब जानते हैं कि सावरकर केवल अपने जीवन के पहले चरण में ब्रिटिश-विरोधी थे. अंडमान में स्थित सेल्लुयर जेल में कैद कर दिए जाने के बाद उनका ह्रदयपरिवर्तन हो गया और उन्होंने अपनी रिहाई के लिए अंग्रेज सरकार को पांच दया याचिकाएं भेजीं. सावरकर, आरएसएस और हिन्दू राष्ट्रवादियों के सबसे बड़े वैचारिक गुरू हैं. उन्होंने ही हिन्दुत्व, जो कि हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा है, को परिभाषित किया था. मजे की बात यह है कि वे स्वयं नास्तिक थे. उनके विचार, हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति का आधार हैं. सन् 1857 के विद्रोह पर अपनी पुस्तक में सावरकर ने लिखा कि हिन्दुओं और मुसलमानों ने किस तरह कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी के रूप में अवतार लेते ही उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि मुसलमानों से नफरत ही हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार हो सकती है.

इसके विपरीत, भगत सिंह और नेताजी – संघ परिवार जिनसे सावरकर को जोड़ना चाहता है – जीवनपर्यंन्त ब्रिटिश विरोधी रहे. भगत सिंह कम्युनिस्ट थे और सुभाष बोस, समाजवादी. भगत सिंह मानते थे कि गांधीजी के नेतृत्व में समावेशी आंदोलन ही भारतीय स्वाधीनता संग्राम की धुरी हो सकता है. गांधीजी के साथ अपने मतभेदों के बावजूद, नेताजी उन्हें राष्ट्रपिता कहते थे. नेताजी, गांधीजी और भगत सिंह के बीच मतभेद, राष्ट्रवाद की अवधारणा को लेकर नहीं थे. उनमें अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ने के तरीके के बारे में मतभेद थे. गांधीजी अहिंसा के पक्के समर्थक थे. उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों की भारत पर पकड़ कमजोर करने के लिए भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया. बोस चाहते थे कि भारत के स्वाधीनता सेनानी, ब्रिटेन के विरूद्ध युद्धरत धुरी राष्ट्रों – जर्मनी, इटली और जापान – से हाथ मिलाएं.

कुल मिलाकर, जहां तक राष्ट्रवाद का संबंध है, भगत सिंह, नेताजी और गांधीजी व इन नेताओं के समर्थक एक शिविर में हैं. दूसरे शिविर में हैं जिन्ना (मुस्लिम लीग का सदस्य बनने के बाद) और हिन्दू राष्ट्रवाद के पथप्रदर्शक सावरकर. ये दोनों धर्म को राष्ट्रवाद का आधार मानते और बताते थे. धार्मिक राष्ट्रवाद की यह विचारधारा, राजाओं-नवाबों और जमींदारों से उपजी थी. इसके विपरीत, भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थक, समाज के विभिन्न तबकों से थे. इनमें शामिल थे उद्योगपति और व्यवसायी, श्रमिक और शिक्षित मध्यमवर्ग. ये वर्ग स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के हामी थे और धर्म से ऊपर उठकर सोचते थे. हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादी, जन्म-आधारित सामाजिक पदक्रम के सामंती मूल्य में आस्था रखते थे.

दिल्ली विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ वह इस बात का नमूना है कि तेजी से उभरता धार्मिक राष्ट्रवाद, इतिहास को किस रूप में प्रस्तुत करना चाहता है और हमारे अतीत के नायकों के साथ किस तरह की छेड़छाड़ करने पर आमादा है. अब तक हमने इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने के संघ परिवार के अभियान का एक पक्ष देखा है जिसमें हिन्दू शासकों और मनुस्मृत्ति जैसे हिन्दू ग्रंथों का महिमागान किया जाता है. दिल्ली विश्वविद्यालय की घटना, हिन्दू राष्ट्रवाद की वैचारिक मजबूरी के एक दूसरे पक्ष को उद्घाटित करती है. संघ परिवार केवल उन नेताओं को महिमामंडन के लिए चुन रहा है जिनके गांधी या नेहरू से मतभेद थे. बोस और भगत सिंह को इसलिए चुना गया क्योंकि वे कई मामलों में गांधीजी से असहमत थे और पटेल को इसलिए क्योंकि उनमें और नेहरू में कुछ मुद्दों पर मतभिन्नता थी. परंतु महत्वपूर्ण यह है कि ये सभी नेता भारतीय राष्ट्रवादी थे और इनकी तुलना सावरकर से कतई नहीं की जा सकती. सावरकर ने तो स्वाधीनता संग्राम से विश्वासघात किया था.

दिल्ली विश्वविद्यालय की घटना मामूली भले ही हो परंतु इससे यह पता चलता है कि संघ परिवार, भारतीय राष्ट्रवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों को एक पलड़े पर तोलने का प्रयास कर रहा है.

हिन्दू राष्ट्रवादी, विचारधारात्मक विभाजक रेखाओं को मिटाने का उपक्रम कर रहे हैं. हमें भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नायकों की मूल विचारधारा को समझना होगा. तभी हम समझ पाएंगे कि कौन से मतभेद वास्तविक और महत्वपूर्ण थे और कौन से मामूली और नजरअंदाज करने लायक. यह केवल मूर्तियों का प्रश्न नहीं है. प्रश्न यह है कि आखिर हम किस तरह के भारत का निर्माण करना चाहते हैं. भगत सिंह, बोस, गांधी और अम्बेडकर के भारत का या सावरकर के हिन्दू राष्ट्र का. (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

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राष्ट्रवाद का झुनझुना चाहिए या नोकरी

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हेमंत झा
कितने मासूम हैं वे…! बिल्कुल उस बच्चे की तरह जिसे चावल का भूंजा ‘कुरकुर’ भी चाहिये और ‘मुरमुर’ भी चाहिये। उसी तरह उन्हें भी…एक खास तरह का राष्ट्रवाद भी चाहिये, नकारात्मक किस्म के सांस्कृतिक वर्चस्व की मनोवैज्ञानिक संतुष्टि भी चाहिये, धारणाओं में सुनियोजित तरीके से स्थापित ‘मजबूत’ नेता भी चाहिये और…अपनी स्थायी सरकारी नौकरी में किसी तरह की विघ्न-बाधा भी नहीं चाहिये।
   वे रेलवे में नौकरी करते हैं, एयरपोर्ट में नौकरी करते हैं, बैंकों, विश्वविद्यालयों, आयुध निर्माण केंद्रों, बीएसएनएल, एमटीएनएल, ओएनजीसी सहित पब्लिक सेक्टर की अन्य इकाइयों में नौकरी करते हैं।
    उन्हें अपनी नौकरी में स्थायित्व पर कोई सवाल नहीं चाहिये, समयबद्ध तरक्की भी चाहिये और पेंशन तो चाहिये ही चाहिये… वह भी ‘ओल्ड’ वाला।
     लेकिन यह क्या?
   अभी वे बालाकोट में पाकिस्तान के मानमर्दन का जश्न मना कर, केंद्र में मजबूत नेता के फिर से और अधिक मजबूत होकर आने का  स्वागत गान गा कर अपने-अपने ऑफिसों में निश्चिंत हो कर बैठे भी नहीं थे कि खुद उनके अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे।
      बिना सही तथ्य जाने एनआरसी विवाद पर अपनी कीमती राय रखते हुए, मजबूत सरकार द्वारा कश्मीरियों को ‘सीधा’ करने की कवायदों पर अपना उत्साह ही नहीं, उल्लास व्यक्त करते हुए अपनी गद्देदार कुर्सियों की पुश्तों से गर्दन टिका कर उन्होंने ऑफिस कैंटीन में कॉफी का ऑर्डर भेजा ही था कि पता चला…उसी मजबूत सरकार ने उनकी कुर्सी के नीचे पटाखों की लड़ियों में माचिस की तीली सुलगा दी है।
   अब क्या बैंक, क्या रेलवे, क्या कॉलेज, क्या एयरपोर्ट, क्या ये, क्या वो…सब हैरान हैं। ये क्या हो रहा है,?
    एयरपोर्ट वाले बाबू लोग तो बहुत हैरान हैं। उनकी हैरानी नाराजगी का रूप ले रही है। सरकार ने देश के बड़े हवाई अड्डों के निजीकरण का निर्णय लिया है। बाबू लोग सकते में हैं। वे कह रहे हैं कि जो सरकारी एयरपोर्ट अच्छे-भले मुनाफे में चल रहे हैं उनको कारपोरेट के हाथों में सौंपने का क्या मतलब है? वे गिनाते हैं कि सरकारी नियंत्रण में रहते इन एयरपोर्ट्स ने आधारभूत संरचना के विकास में कितने उच्च मानदंडों को छुआ है। अखबारों में छपी खबरों के अनुसार अब वे बाबू लोग आरोप लगा रहे हैं कि बने-बनाए, मुनाफे में चल रहे एयरपोर्ट्स को बड़े औद्योगिक घरानों के हाथों सौंप कर सरकार सिर्फ उन उद्योगपतियों के हित साध रही है। अब उन्हें अपना भविष्य अंधेरा नजर आ रहा है।
   आह…कितने मासूम हैं ये बाबू लोग। जब कभी कोई कहता या लिखता था कि जिस नेता को वे ‘डायनेमिक’ कह रहे  हैं उसके आभामंडल के निर्माण में उन्हीं बड़े औद्योगिक घरानों ने बड़ी मेहनत की है, अकूत पैसा खर्च किया है, कि तमाम भावनात्मक मुद्दे आंखों में धूल झोंकने के हथियार मात्र हैं और उनसे किसी के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं आने वाला, कि यह मजबूत नेता दोबारा आने के बाद दुगुने जतन से कारपोरेट की शक्तियों का हित पोषण करेगा…तो वे हिकारत के भावों के साथ टिप्पणियां करते थे, ऐसा कहने वालों को वे वामी आदि के संबोधनों से तो नवाजते ही थे, अक्सर उनकी देशभक्ति पर भी सवाल उठा दिया करते थे।
    अमर्त्य सेन, रघुराम राजन और ज्यां द्रेज सरीखे अर्थशास्त्रियों के बयानों को किसी ‘साजिश’ का हिस्सा बताने में उन बाबुओं को भी कोई संकोच नहीं होता था जिन्होंने दसवीं तक के अर्थशास्त्र को भी ठीक से नहीं पढ़ा था।
     सितम यह कि सरकारी विश्वविद्यालयों के अधिकतर प्रोफेसरों को बैंक निजी चाहिये, रेलवे-एयरपोर्ट के निजीकरण से उन्हें कोई आपत्ति नहीं, आयुष्मान भारत योजना को वे गरीबों की चिकित्सा के लिये ऐतिहासिक कदम बताते हैं, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की बदहाली का कोई संज्ञान लेने तक को वे तैयार नहीं और ऊंची तनख्वाह के साथ ही मेडिकल बीमा के बल पर लकदक निजी अस्पतालों में अपनी चिकित्सा के प्रति वे निश्चिंत हैं।
   उनकी दिक्कत तब शुरू हुई जब सरकार सरकारी कॉलेजों को भी एक-एक कर बाकायदा कारपोरेट के हाथों में सौंपने की तैयारी करने लगी। शुरुआत हो चुकी है और पिछले सप्ताह कुछ कॉलेजों के बिकने का टेंडर भी हो चुका है। आने वाले 10-15 सालों में देश की उच्च शिक्षा का संरचनात्मक स्वरूप पूरी तरह बदल जाने वाला है। जिन्हें इस पर संशय हो वे प्रस्तावित ‘नई शिक्षा नीति’ के विस्तृत मसौदे को पढ़ने का कष्ट उठा लें। यह प्रस्तावित नीति और कुछ नहीं, उच्च शिक्षा तंत्र के कारपोरेटीकरण और इसकी जिम्मेवारियों से सरकार के हाथ खींच लेने का घोषणा पत्र है।
     अधिकतर बैंक वाले खुश हैं कि सरकारी कालेजों का निजीकरण किया जा रहा है। वे इस परसेप्शन के शिकार हैं कि सरकारी स्कूल-कालेजों के मास्टर लोग बिना कुछ किये-धरे ऊंची तनख्वाहें उठाते हैं और कि…ये सारे मास्टर सरकार पर बेवजह के बोझ हैं।
     एक-एक कर सार्वजनिक संपत्तियों को कौड़ी के मोल कारपोरेट के हाथों बेचा जा रहा है और इन खबरों को कहीं कोई तवज्जो नहीं मिल रही। अखबारों के किसी पन्ने के कोने में चार-आठ लाइनों की कोई छोटी सी खबर आती है, जिसका संज्ञान भी अधिकतर लोग नहीं लेते कि पब्लिक सेक्टर की फलां इकाई फलां उद्योगपति के हाथों बेच दी गई।
     अधिकतर बाबू लोगों के प्रिय न्यूज चैनलों में वे चैनल ही हैं जो प्राइम टाइम में नियम से पाकिस्तान, कश्मीर, तीन तलाक, एनआरसी आदि पर बहसें करते-कराते हैं, जिनके एंकरों की चीखों से इन बाबुओं की रगों में भी देशभक्ति का जोश कुलांचें भरने लगता है। टीवी में एंकरों/एंकरानियों की चीखें जितनी जोर से गूंजती हैं, बाबू लोगों का जोश उतना बढ़ता है। उतना ही उनके बच्चों का मस्तिष्क प्रदूषित होता है जो अभी छठी, आठवीं या बारहवीं क्लास में हैं और कारपोरेट संचालित लोकतंत्र के छल-छद्मों से नितांत अनभिज्ञ हैं।
   नहीं, ऐसा नहीं है कि अब उनकी आंखों पर पड़ा पर्दा हट रहा है। पर्दा अपनी जगह यथावत है और मोबाइल न्यूज एप्स पर आ रही उन प्रायोजित खबरों को देख-पढ़ कर वे अब भी मुदित-हर्षित हो रहे हैं जिनमें बताया जाता है कि इमरान मोदी के डर से थर-थर कांप रहे हैं, कि अब कश्मीर तो क्या, पीओके भी बस हासिल ही होने वाला है, कि असम की जमीन की पवित्रता अब लौटने ही वाली है जहां सिर्फ ‘मां भारती के सपूत’ ही रह जाएंगे और तमाम सौतेलों को खदेड़ दिया जाएगा।
    उनकी आंखों पर पड़े पर्दों ने उन्हें इंसानियत से, भारतीयता से कितना विलग कर दिया है, यह उन्हें अहसास भी नहीं। तबरेज के हत्यारों को दोषमुक्त कर दिए जाने से तो उन्हें कोई तकलीफ नहीं ही हुई, दोषमुक्त आरोपियों को फूल-मालाओं से लदा देख कर भी उन्हें कोई हैरत नहीं हुई।
  तमाम खुली आँखों पर पड़े गर्द भरे पर्दे यथावत हैं। उन्हें तो विरोध बस अपने हितों पर हो रहे आघातों से है। उनका विभाग सलामत रहे, सरकारी बना रहे, उनका वेतन-पेंशन कायम रहे, बाकी सारे के सारे विभागों का निजीकरण हो जाए, फर्क नहीं पड़ता।
      ये सिर्फ बाबू लोग हैं। इनमें अधिकारी भी हैं, कर्मचारी भी हैं, पियून साहब लोग भी हैं, प्रोफेसर/मास्टर भी हैं। वे न सवर्ण हैं, न पिछड़े, न अति पिछड़े, न दलित आदि। वे सिर्फ मध्यवर्गीय बाबू हैं जिन्हें अपने वर्गीय हितों से इतर कुछ नहीं सूझता।
   उनमें से बहुत सारे लोग अब आंदोलित हैं लेकिन अलग-अलग जमीन पर। एक दूसरे के आंदोलनों के प्रति उनमें कोई सहानुभूति नहीं, बल्कि, अपना छोड़ बाकी अन्यों के आंदोलनों को वे संदेह की दृष्टि से देखते हैं और अवसर पड़ने पर प्रतिकूल टिप्पणियां करने से भी कोई गुरेज नहीं करते।
   कितने मासूम हैं वे!
 वे सोचते हैं कि आसमान गिर पड़े तो गिरे, बस उनकी छत सलामत रहे, जिसकी सुरक्षा का जिम्मा सरकार का है क्योंकि वे तो सरकारी हैं। उनका ऑफिस सरकारी है और उसकी छत सरकार ने ही बनाई थी।
    हितों के अलग-अलग द्वीपों पर खड़े वे तमाम लोग पराजित होने को अभिशप्त हैं। उनके बीच सामूहिक मानस का निर्माण सम्भव ही नहीं क्योंकि वे सारे एक-दूसरे के विभागों को सरकार पर बोझ मानते हैं।
    वे आंदोलन कर रहे हैं। कुछ लोग, कुछ विभाग तो जोरदार आंदोलन की राह पर हैं। लेकिन, उनका वैचारिक खोखलापन तब सामने आता है जब दिन भर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ करते-करते वे शाम को जब घर लौटते हैं तो चाय/कॉफी पीते उन्हीं न्यूज चैनलों पर उन्हीं दलाल एंकरों की चीखें सुनते हैं जो उन्हें बताते हैं कि पाकिस्तान तो अब बर्बाद होने ही वाला है और भारत…? यह तो विश्व गुरु था और  फलां जी के नेतृत्व में फिर से विश्व गुरु बनने की राह पर है, कि बस, विश्व गुरु बनने को ही है। दुनिया के शीर्ष 300 विश्वविद्यालयों की लिस्ट में भारत का कोई संस्थान अगर जगह नहीं पा सका तो लिस्ट बनाने वालों की कसौटियां ही संदिग्ध हैं। जिस देश में ‘जियो’ नामक अवतारी यूनिवर्सिटी हो जिसने जन्म से पहले ही एक्सीलेंस की कसौटियों को पूरा कर लिया हो उसे विश्वगुरु बनने से कोई रोक भी कैसे सकता है?
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(ये लेख हेमंत झा की फेसबुक वाल से लिया गया है )

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क्या उलमा आलोचनाओं से परे हैं?

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अनीस अंसारी
अंधी तक़लीद बहुत ख़तरनाक होती है.. ये आपके दिमाग़ को जकड़ लेती है और आप एक ख़ास दायरे में सोचने लगते हैं जब भी कोई उस दायरे से बाहर की बात करता है तो वो आपको दुश्मन लगने लगता है।
सहाबा ए किराम शख़्सियत परस्त नही थे, तभी तो दुनिया के अज़ीम तरीन हुक्मरान, हज़रत उमर जिसके नाम से ही लोगों में कंपकपी तारी हो जाया करती थी, जब जनता दरबार में खड़े होकर पूछते है कि “लोगो अगर मैं हक़ ओ इंसाफ पे न चलूँ तो तुम क्या करोगे?”
लोगों की भीड़ में से एक बद्दू (दिहाती ) खड़ा होता, जिसने अपनी तलवार खजूरों के पत्तों में लपेट रखी थी (क्योंकि उसके पास तलवार की म्यान नही थी), तलवार पे हाथ मार कर कहता है:
“ऐ उमर हम तुम्हे इस तलवार से सीधा कर देंगे”
हज़रत उमर खामोश हो जाते हैं। सारे मजमे में सन्नाटा छा जाता है। फिर हज़रत उमर कहते हैं कि “अब उमर बर्बाद नही होगा”।
एक दिन हज़रत उमर के पास शिकायत आती है कि लड़की वाले ‘मेहर’ की क़ीमत ज़्यादा मांगने लगे हैं, तो हज़रत उमर मस्जिद से ऐलान करते हैं कि, “आज के बाद हुकूमत के द्वारा तय किये मेहर से ज़्यादा कोई लड़की वाला डिमांड नही करेगा।”
जब इस एलान के बाद हज़रत उमर मस्जिद से निकलते है तो एक औरत रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती है और तैश में बोलती है—
“ऐ उमर, तुम कौन होते हो मेहर की हद तय करने वाले, जबकि क़ुरान ने इसकी हद तय नही की।”
हज़रत उमर फौरन वापस मस्जिद जाते हैं और अपना फैसला वापस लेने का ऐलान करते है और कहते हैं कि “जब तक मुसलमानों में ऐसी औरतें मौजूद हैं, उमर महफूज़ है।”
अब ये भी सुनिये कि हज़रत उमर कौन हैं?
★जिनके बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि “जिस रास्ते से उमर गुज़रता है शैतान वो रास्ता छोड़ देता है।”
“अगर मेरे बाद कोई नबी होता तो वो उमर होता।”
 “हर क़ौम का एक मोहद्दस (जिसपे वही तो नही आती मगर अल्लाह की तरफ़ से उसे सीधा इलहाम होता है) और मेरी उम्मत का मोहद्दस उमर है।”
वो हज़रत उमर जिनके कई फैसलों पर लोग ऐतराज़ करने लगे तो क़ुरान में उस फैसले की ताईद में आयतें उतर गईं। लेकिन इसके बाद भी मुसलमानों का अदना से अदना शख़्श भी भक्ति नही करता। ये नही कहता कि हज़रत उमर ने कह दिया तो कोई न कोई मसलेहत होगी
हज़रत उमर इल्म वाले है
हज़रत उमर अमीरऊल मोमेनीन है
हज़रत उमर अशरे मोबश्शेरा वाले है
हज़रत उमर वो है जिनसे अल्लाह ने रज़ामंदी का ऐलान कर रखा है
क्योंकि सहाबा शख़्सियत परस्त नही थे। सहाबाओं के नज़दीक दीन और उम्मत पहले थे शख़्स और तंज़ीम बाद में।
क्या आज भी ऐसा होना मुमकिन है?

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क्या प्रमुख नागरिकों को शासकों को आईना नहीं दिखाना चाहिए?

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देश के 49 प्रमुख नागरिकों, जिनमें फिल्मी हस्तियां, लेखक और इतिहासविद् शामिल हैं, ने कुछ समय पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुला पत्र लिखकर, देश में दलितों के खिलाफ अत्याचार व माब लिंचिंग की घटनाओं में बढ़ोत्तरी और ‘जय श्रीराम‘ के नारे का एक विशेष धर्म के लोगों को आतंकित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए उनका ध्यान इस ओर आकर्षित किया था. हस्ताक्षरकर्ताओं में लब्धप्रतिष्ठित हस्तियां जैसे श्याम बेनेगल, अडूर गोपालकृष्णन, अपर्णा सेन और रामचन्द्र गुहा शामिल थे. इसके तुरंत बाद, प्रतिष्ठित नागरिकों के एक अन्य समूह, जिसमें प्रसून जोशी, कंगना रनौत, मधुर भंडारकर, सोनल मानसिंह और अन्य शामिल थे, ने एक जवाबी पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि कुछ चुनिंदा घटनाओं को उद्धत कर पहले पत्र के लेखक, दुनिया की निगाहों में भारत और मोदी को बदनाम करना चाहते हैं. उन्होंने उस पत्र को एक पक्षीय और राजनीति से प्रेरित बताया.

उनका आरोप है कि उक्त पत्र के लेखकों ने सिक्के का दूसरा पहलू नहीं देखा. उन्होंने हिन्दुओें के कैराना से पलायन की चर्चा नहीं की और ना ही वे बशीरहाट में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा से चिंतित लगते हैं. उन्होंने दिल्ली के चांदनी चैक में एक मंदिर को नुकसान पहुंचाए जाने की घटना का भी संज्ञान नहीं लिया. जवाबी पत्र के लेखकों ने यह प्रश्न भी उठाया कि बेनेगल और उनके साथी तब क्यों चुप्पी साधे रहते हैं जब कश्मीर में अतिवादी, स्कूलों को जलाने का आव्हान करते हैं, जब आदिवासी क्षेत्रों में नक्सली हमले होते हैं या जब टुकड़े-टुकड़े गैंग, भारत को तोड़ने की बात करती है.

पहले पत्र के 49 हस्ताक्षरकर्ताओं ने देश में पिछले कुछ महीनों में एक विशेष प्रवृत्ति के उभार पर चिंता व्यक्त की थी. वे घटनाओं को अलग-अलग नहीं बल्कि एक प्रवृत्ति के भाग के रूप में देख रहे थे. उनकी चिंता निष्पक्ष स्त्रोतों द्वारा उपलब्ध करवाए गए आंकड़ों पर आधारित थी. नेशनल क्राईम रिकार्डस ब्यूरो के अनुसार, पिछले वर्षों की तुलना में, सन् 2016 में दलितों के विरूद्ध अत्याचार की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई और आरोपियों की दोषसिद्धी की दर घटी. सिटीजन्स रिलीजियस एंड हेट क्राईम वाच के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पिछले नौ वर्षों में हुईं लिंचिंग की घटनाओं में से 90 प्रतिशत, सन् 2014 के बाद हुईं हैं. इन घटनाओं के शिकारों में मुसलमानों का प्रतिशत62 और ईसाईयों का 12 था. मुसलमान, देश की आबादी का 14.23 प्रतिशत हैं और ईसाई, 2.30प्रतिशत.

जहां तक जय श्रीराम के नारे का सवाल है, इन चिंतित नागरिकों का कहना है कि अब तक जय राम, जय सियाराम और राम-राम आदि का इस्तेमाल अभिवादन के लिए किया जाता था. परन्तु अब, जय श्रीराम लोगों को अपमानित करने और उनका मखौल उड़ाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जैसा कि लोकसभा में मुस्लिम और टीएमसी सांसदों के शपथग्रहण के दौरान हुआ. देश में अनेक ऐसी घटनाएं हुईं हैं जब भीड़ ने मुसलमानों को घेर कर उन्हें जय श्रीराम का नारा लगाने पर मजबूर किया और बाद में पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी.

इस तरह की घटनाएं इसलिए हो रहीं हैं क्योंकि हिंदू राष्ट्रवादी आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों को लग रहा है कि अब देश में उनका राज है और वे जो चाहे कर सकते हैं. हम सबको याद है की पिछली केंद्र सरकार के मंत्रियों ने लिंचिंग की घटनाओं के आरोपियों और दोषसिद्ध अपराधियों का सार्वजनिक रूप से सम्मान किया था. अखलाक की हत्या में आरोपी की मृत्यु होने पर उसके शव को तिरंगे में लपेटा गया था और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने लिंचिंग के अपराध में दोषसिद्ध व्यक्तियों के जमानत पर रिहा होने पर फूलमालाएं पहना कर उनका अभिनंदन किया था.

यह कहता गलत है कि उदारवादियों ने कश्मीर घाटी से पंडितों के पलायन और सन 1984 के सिक्ख कत्लेआम की निंदा नहीं की. समाज के धर्मनिरपेक्ष तबके ने इन घटनाओं की निंदा करते हुए बहुत कुछ लिखा और सड़कों पर उतर कर भी उनका विरोध किया. समाज के कमजोर वर्गों पर अत्याचार की घटनाओं का भी यह तबका विरोध करता आया है. जहाँ तक कुछ अन्य घटनाओं – जैसे कैराना से हिन्दुओं के पलायन – का सवाल है, स्थानीय पुलिस ने ही उनका खंडन कर दिया है. चांदनी चौक की घटना की शुरुआत स्कूटर की पार्किंग को लेकर विवाद से हुई थी. मुसलमानों के नेतृत्व वाली स्थानीय अमन कमेटी ने मंदिर को हुए नुकसान को ठीक करवाया और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सद्भाव स्थापित करने के लिए, अंतरधार्मिक सामूहिक भोज भी आयोजित किए.

प्रजातंत्र में आस्था रखने वाले लोग आदिवासी क्षेत्रों में नक्सलवादी हिंसा का सतत विरोध करते आए हैं. जहां तक टुकड़े-टुकडे़ गैंग का सवाल है, यह सिर्फ उन लोगों को बदनाम करने की साजिश है जो सत्ताधारी दल और उसकी नीतियों के विरोधी हैं. यह बहुत अच्छा है कि प्रसून जोशी एंड कंपनी ने इन घटनाओं की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है. इन घटनाओं की उचित विवेचना की जानी चाहिए. श्याम बेनेगल और उनके साथी जिन घटनाओं (लिंचिंग व जय श्रीराम के नाम पर हिंसा आदि) की बात कर रहे हैं वे मात्र छुटपुट घटनाएं नहीं हैं. वे एक प्रवृत्ति का भाग हैं जो तेजी से बढ़ रही है. हाल में झारखंड के एक मंत्री ने एक मुस्लिम विधायक,अंसारी, को कैमरों के सामने जय श्रीराम कहने पर मजबूर करने की कोशिश की थी.

जिस मूल प्रश्न पर हमें विचार करना होगा वह यह है कि समाज में अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत क्यों बढ़ रही है. उनके विरूद्ध हिंसा, इसी नफरत का परिणाम है. हिन्दू राष्ट्रवादी, गाय, बीफ और इतिहास की साम्प्रदायिक व्याख्या आदि जैसे मुद्दों का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ बहुसंख्यकों को भड़काने के लिए कर रहे हैं. अमरीका ने पिछले साल लिंचिंग के खिलाफ एक कानून पारित किया था. भारत में इस तरह के कानून की सख्त जरूरत है. ‘‘हम बनाम वे‘‘ का विमर्श हमारे प्रजातंत्र के लिए शुभ नहीं है.

जिन 62 प्रतिष्ठित नागरिकों ने जवाबी पत्र लिखा है, उन्हें यह समझना चाहिए कि सरकार की आलोचना न तो राष्ट्रविरोध है और ना ही अराष्ट्रीयतावाद. सरकार की आलोचना से देश बदनाम नहीं होता. देश बदनाम होता है अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और उनमें बढ़ती असुरक्षा से, देश बदनाम होता है राम-राम के प्रेमपूर्ण अभिवादन के जय श्रीराम के आक्रामक नारे में बदलने से. सरकार की आलोचना हमारे लिए चिंता का विषय नहीं हो सकती. हमारे लिए चिंता का विषय है वह सोच या प्रवृत्ति, जिसके कारण धार्मिक समुदायों का ध्रुवीकरण हो रहा है. इस प्रक्रिया को तुरंत रोका जाना चाहिए. प्रतिष्ठित नागरिकों को शासकों का भाट बनने की बजाए उन्हें आईना दिखाना चाहिए. (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

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