पुस्तक समीक्षा: ‘आरएसएस, भारत के अस्तित्व के  लिए एक बड़ा खतरा’

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‘आरएसएस-ए-मेनेस टू इंडिया’   लेखक – ए.जी. नूरानी, प्रकाशक – लेफ्टवर्ड।    पेज – 547
 पुस्तक समीक्षा वरिष्ठ पत्रकार  हमरा कुरैशी द्वारा

‘आरएसएस, भारत के अस्तित्व के  लिए एक बड़ा खतरा’ए जी नूरानी के इस नवीनतम वॉल्यूम को एक उत्कृष्ट कृति कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने अपनी इस किताब के ज़रिये आरएसएस को सभी संभव तथ्यों और दस्तावेजी सबूतों  के साथ   पूरी तरह से और बिना किसी लाग लपेट के बेनक़ाब कर दिया है। मैं तो कहूँगी यह किताब उन सभी लोगो को ज़रूर पढ़नी चाहिए, जो देश के हालिया राजनितिक दौर से  आशंकित हैं क्यूंकि नरेंद्र  मोदी के नेतृत्व वाली सरकार एक बार फिर अगले पांच सालों के लिए इस देश पर शासन करने के लिए आ गयी है।वास्तव में, यह किताब दक्षिणपंथी  विचारधारा की उस राजनीतिक परतों और दूरगामी रणनीतियों का खुलासा करती है जो इस देश के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ रही है और जो हमारे देश को बर्बाद कर देगी।

यहाँ इस किताब का एक अंश उद्धृत करना बहुत ही मौज़ूं है नूरानी लिखते हैं  “भारत इस समय अपनी आत्मा के अस्तित्व के लिए  जूझ रहा है… राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आज भारत का सबसे शक्तिशाली संगठन है; उसकी अपनी खुद की एक निजी सेना है जो निर्विवाद रूप से अपने नेता के आदेशों का पालन करती है जो फ़्यूहरर (हिटलर) के फासीवादी सिद्धांत की तर्ज पर काम करता है … आरएसएस भारत के अतीत के साथ युद्ध लड़ रहा है। यह भारतीय राज्य के तीन सबसे बड़े और महान निर्माताओं – बौद्ध धर्म के अनुयायी अशोक, इस्लाम धर्म के अनुयायी  अकबर और एक सभ्य एवं प्रबुद्ध हिंदू नेहरू को छोटा दिखाकर सदियों की उन उपलब्धियों  को ख़त्म करने पर आमादा है जिसके लिए दुनिया भारत की तारीफ़ करती  है और उसकी जगह वह अपनी संकीर्ण, विभाजनकारी विचारधारा को इस महान देश पर पर थोपना चाहता है।”

अपनी इस किताब  में, नूरानी ने बहुत ही गहन अध्ययन करके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूरे इतिहास का पता लगाया है, जो 1925 में अपने गठन से लेकर वर्तमान समय तक का लेखा जोखा है।साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की  रणनीतियों और और उसकी दोहरे या तिहरे चरित्र  को भी उजागर किया

है।इस किताब को पढ़ने के बाद, आप अच्छी तरह समझ पाते हैं कि इस देश के शासन पर आरएसएस के प्रत्यक्ष नियंत्रण के बाद आगे क्या खतरे है। नूरानी बताते हैं कि आरएसएस न सिर्फ इस देश के सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरा है बल्कि उससे भी बड़ी एक चुनौती है। यह इस देश के मूल्यों के लिए खतरा है। यह देश के लोकतांत्रिक शासन के लिए खतरा है और इससे भी बढ़कर, यह भारत के अस्तित्व के  लिए एक बड़ा खतरा है जिसपर भारत राष्ट्र स्थापित है।

नूरानी लिखते हैं  कि “आरएसएस ने बहुत ही चतुराई से  इस तथ्य से ध्यान हटाने के लिए कि भारत की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा पर या उससे नीचे रह रही है और बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित है, हिंदुत्व के एजेंडे को इस गहनता के साथ थोपा है की उसके अनुयायी आँख मूंदकर उसके रास्ते पर चल रहे हैं। यहां तक कि आदिवासियों और दलितों को उनके  बुनियादी अधिकार दिलाने के बजाय धर्मान्तरण जैसे अप्रासंगिक सवालों पर  ध्यान केंद्रित किया गया है। इस मुद्दे के इर्द-गिर्द की कौन भारतीय है, कौन स्वदेशी है और कौन  विदेशी है।हिंदू धर्म की रक्षा करने का दावा करने वाले समूहों का हिस्सा मुसलमानों और ईसाइयों को लेबल लगाकर उन्हें विदेशी, आतकंवादी और देशद्रोही बताने पर तुला हुआ है।

”ए जी नूरानी की किताब संविधान निर्माता  डॉ. बीआरअंबेडकर द्वारा की गई एक बहुत ही उपयुक्त और मारक  टिप्पणी के साथ शुरू होती जिसमें वह कहते हैं “यदि हिंदू राज एक सच्चाई बन जाता है, तो इसमें कोई शक नहीं की यह इस देश के लिए सबसे बड़ी विपत्ति होगी… हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।”

और इस पुुस्तक के पीछे के कवर फ्लैप पर पंडित जवाहरलाल नेहरू का एक उद्धरण लिखा है – “ऐसा  प्रतीत होता है कि इसके (आरएसएस के) घोषित उद्देश्यों का लोगों के साथ वास्तविक रूप से और उसकी गतिविधियों के साथ बहुत कम सामंजस्य है। आरएसएस के वास्तविक उद्देश्य, भारतीय संसद के निर्णयों और भारत के प्रस्तावित संविधान के प्रावधानों का पूरी तरह से विरोध करते दिखाई देते हैं। हमारी जानकारी के अनुसार आरएसएस की गतिविधियाँ राष्ट्र-विरोधी और अक्सर विध्वंसक और हिंसक होती हैं। ” यह बात प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस प्रमुख एम.एस. गोलवलकर, को 10 नवंबर 1948, को लिखे एक पत्र में कही थीं।

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