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पुस्तक समीक्षा: ‘आरएसएस, भारत के अस्तित्व के  लिए एक बड़ा खतरा’

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‘आरएसएस-ए-मेनेस टू इंडिया’   लेखक – ए.जी. नूरानी, प्रकाशक – लेफ्टवर्ड।    पेज – 547
 पुस्तक समीक्षा वरिष्ठ पत्रकार  हमरा कुरैशी द्वारा

‘आरएसएस, भारत के अस्तित्व के  लिए एक बड़ा खतरा’ए जी नूरानी के इस नवीनतम वॉल्यूम को एक उत्कृष्ट कृति कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने अपनी इस किताब के ज़रिये आरएसएस को सभी संभव तथ्यों और दस्तावेजी सबूतों  के साथ   पूरी तरह से और बिना किसी लाग लपेट के बेनक़ाब कर दिया है। मैं तो कहूँगी यह किताब उन सभी लोगो को ज़रूर पढ़नी चाहिए, जो देश के हालिया राजनितिक दौर से  आशंकित हैं क्यूंकि नरेंद्र  मोदी के नेतृत्व वाली सरकार एक बार फिर अगले पांच सालों के लिए इस देश पर शासन करने के लिए आ गयी है।वास्तव में, यह किताब दक्षिणपंथी  विचारधारा की उस राजनीतिक परतों और दूरगामी रणनीतियों का खुलासा करती है जो इस देश के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ रही है और जो हमारे देश को बर्बाद कर देगी।

यहाँ इस किताब का एक अंश उद्धृत करना बहुत ही मौज़ूं है नूरानी लिखते हैं  “भारत इस समय अपनी आत्मा के अस्तित्व के लिए  जूझ रहा है… राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आज भारत का सबसे शक्तिशाली संगठन है; उसकी अपनी खुद की एक निजी सेना है जो निर्विवाद रूप से अपने नेता के आदेशों का पालन करती है जो फ़्यूहरर (हिटलर) के फासीवादी सिद्धांत की तर्ज पर काम करता है … आरएसएस भारत के अतीत के साथ युद्ध लड़ रहा है। यह भारतीय राज्य के तीन सबसे बड़े और महान निर्माताओं – बौद्ध धर्म के अनुयायी अशोक, इस्लाम धर्म के अनुयायी  अकबर और एक सभ्य एवं प्रबुद्ध हिंदू नेहरू को छोटा दिखाकर सदियों की उन उपलब्धियों  को ख़त्म करने पर आमादा है जिसके लिए दुनिया भारत की तारीफ़ करती  है और उसकी जगह वह अपनी संकीर्ण, विभाजनकारी विचारधारा को इस महान देश पर पर थोपना चाहता है।”

अपनी इस किताब  में, नूरानी ने बहुत ही गहन अध्ययन करके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूरे इतिहास का पता लगाया है, जो 1925 में अपने गठन से लेकर वर्तमान समय तक का लेखा जोखा है।साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की  रणनीतियों और और उसकी दोहरे या तिहरे चरित्र  को भी उजागर किया

है।इस किताब को पढ़ने के बाद, आप अच्छी तरह समझ पाते हैं कि इस देश के शासन पर आरएसएस के प्रत्यक्ष नियंत्रण के बाद आगे क्या खतरे है। नूरानी बताते हैं कि आरएसएस न सिर्फ इस देश के सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरा है बल्कि उससे भी बड़ी एक चुनौती है। यह इस देश के मूल्यों के लिए खतरा है। यह देश के लोकतांत्रिक शासन के लिए खतरा है और इससे भी बढ़कर, यह भारत के अस्तित्व के  लिए एक बड़ा खतरा है जिसपर भारत राष्ट्र स्थापित है।

नूरानी लिखते हैं  कि “आरएसएस ने बहुत ही चतुराई से  इस तथ्य से ध्यान हटाने के लिए कि भारत की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा पर या उससे नीचे रह रही है और बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित है, हिंदुत्व के एजेंडे को इस गहनता के साथ थोपा है की उसके अनुयायी आँख मूंदकर उसके रास्ते पर चल रहे हैं। यहां तक कि आदिवासियों और दलितों को उनके  बुनियादी अधिकार दिलाने के बजाय धर्मान्तरण जैसे अप्रासंगिक सवालों पर  ध्यान केंद्रित किया गया है। इस मुद्दे के इर्द-गिर्द की कौन भारतीय है, कौन स्वदेशी है और कौन  विदेशी है।हिंदू धर्म की रक्षा करने का दावा करने वाले समूहों का हिस्सा मुसलमानों और ईसाइयों को लेबल लगाकर उन्हें विदेशी, आतकंवादी और देशद्रोही बताने पर तुला हुआ है।

”ए जी नूरानी की किताब संविधान निर्माता  डॉ. बीआरअंबेडकर द्वारा की गई एक बहुत ही उपयुक्त और मारक  टिप्पणी के साथ शुरू होती जिसमें वह कहते हैं “यदि हिंदू राज एक सच्चाई बन जाता है, तो इसमें कोई शक नहीं की यह इस देश के लिए सबसे बड़ी विपत्ति होगी… हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।”

और इस पुुस्तक के पीछे के कवर फ्लैप पर पंडित जवाहरलाल नेहरू का एक उद्धरण लिखा है – “ऐसा  प्रतीत होता है कि इसके (आरएसएस के) घोषित उद्देश्यों का लोगों के साथ वास्तविक रूप से और उसकी गतिविधियों के साथ बहुत कम सामंजस्य है। आरएसएस के वास्तविक उद्देश्य, भारतीय संसद के निर्णयों और भारत के प्रस्तावित संविधान के प्रावधानों का पूरी तरह से विरोध करते दिखाई देते हैं। हमारी जानकारी के अनुसार आरएसएस की गतिविधियाँ राष्ट्र-विरोधी और अक्सर विध्वंसक और हिंसक होती हैं। ” यह बात प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस प्रमुख एम.एस. गोलवलकर, को 10 नवंबर 1948, को लिखे एक पत्र में कही थीं।

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राष्ट्रवाद का झुनझुना चाहिए या नोकरी

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हेमंत झा
कितने मासूम हैं वे…! बिल्कुल उस बच्चे की तरह जिसे चावल का भूंजा ‘कुरकुर’ भी चाहिये और ‘मुरमुर’ भी चाहिये। उसी तरह उन्हें भी…एक खास तरह का राष्ट्रवाद भी चाहिये, नकारात्मक किस्म के सांस्कृतिक वर्चस्व की मनोवैज्ञानिक संतुष्टि भी चाहिये, धारणाओं में सुनियोजित तरीके से स्थापित ‘मजबूत’ नेता भी चाहिये और…अपनी स्थायी सरकारी नौकरी में किसी तरह की विघ्न-बाधा भी नहीं चाहिये।
   वे रेलवे में नौकरी करते हैं, एयरपोर्ट में नौकरी करते हैं, बैंकों, विश्वविद्यालयों, आयुध निर्माण केंद्रों, बीएसएनएल, एमटीएनएल, ओएनजीसी सहित पब्लिक सेक्टर की अन्य इकाइयों में नौकरी करते हैं।
    उन्हें अपनी नौकरी में स्थायित्व पर कोई सवाल नहीं चाहिये, समयबद्ध तरक्की भी चाहिये और पेंशन तो चाहिये ही चाहिये… वह भी ‘ओल्ड’ वाला।
     लेकिन यह क्या?
   अभी वे बालाकोट में पाकिस्तान के मानमर्दन का जश्न मना कर, केंद्र में मजबूत नेता के फिर से और अधिक मजबूत होकर आने का  स्वागत गान गा कर अपने-अपने ऑफिसों में निश्चिंत हो कर बैठे भी नहीं थे कि खुद उनके अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे।
      बिना सही तथ्य जाने एनआरसी विवाद पर अपनी कीमती राय रखते हुए, मजबूत सरकार द्वारा कश्मीरियों को ‘सीधा’ करने की कवायदों पर अपना उत्साह ही नहीं, उल्लास व्यक्त करते हुए अपनी गद्देदार कुर्सियों की पुश्तों से गर्दन टिका कर उन्होंने ऑफिस कैंटीन में कॉफी का ऑर्डर भेजा ही था कि पता चला…उसी मजबूत सरकार ने उनकी कुर्सी के नीचे पटाखों की लड़ियों में माचिस की तीली सुलगा दी है।
   अब क्या बैंक, क्या रेलवे, क्या कॉलेज, क्या एयरपोर्ट, क्या ये, क्या वो…सब हैरान हैं। ये क्या हो रहा है,?
    एयरपोर्ट वाले बाबू लोग तो बहुत हैरान हैं। उनकी हैरानी नाराजगी का रूप ले रही है। सरकार ने देश के बड़े हवाई अड्डों के निजीकरण का निर्णय लिया है। बाबू लोग सकते में हैं। वे कह रहे हैं कि जो सरकारी एयरपोर्ट अच्छे-भले मुनाफे में चल रहे हैं उनको कारपोरेट के हाथों में सौंपने का क्या मतलब है? वे गिनाते हैं कि सरकारी नियंत्रण में रहते इन एयरपोर्ट्स ने आधारभूत संरचना के विकास में कितने उच्च मानदंडों को छुआ है। अखबारों में छपी खबरों के अनुसार अब वे बाबू लोग आरोप लगा रहे हैं कि बने-बनाए, मुनाफे में चल रहे एयरपोर्ट्स को बड़े औद्योगिक घरानों के हाथों सौंप कर सरकार सिर्फ उन उद्योगपतियों के हित साध रही है। अब उन्हें अपना भविष्य अंधेरा नजर आ रहा है।
   आह…कितने मासूम हैं ये बाबू लोग। जब कभी कोई कहता या लिखता था कि जिस नेता को वे ‘डायनेमिक’ कह रहे  हैं उसके आभामंडल के निर्माण में उन्हीं बड़े औद्योगिक घरानों ने बड़ी मेहनत की है, अकूत पैसा खर्च किया है, कि तमाम भावनात्मक मुद्दे आंखों में धूल झोंकने के हथियार मात्र हैं और उनसे किसी के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं आने वाला, कि यह मजबूत नेता दोबारा आने के बाद दुगुने जतन से कारपोरेट की शक्तियों का हित पोषण करेगा…तो वे हिकारत के भावों के साथ टिप्पणियां करते थे, ऐसा कहने वालों को वे वामी आदि के संबोधनों से तो नवाजते ही थे, अक्सर उनकी देशभक्ति पर भी सवाल उठा दिया करते थे।
    अमर्त्य सेन, रघुराम राजन और ज्यां द्रेज सरीखे अर्थशास्त्रियों के बयानों को किसी ‘साजिश’ का हिस्सा बताने में उन बाबुओं को भी कोई संकोच नहीं होता था जिन्होंने दसवीं तक के अर्थशास्त्र को भी ठीक से नहीं पढ़ा था।
     सितम यह कि सरकारी विश्वविद्यालयों के अधिकतर प्रोफेसरों को बैंक निजी चाहिये, रेलवे-एयरपोर्ट के निजीकरण से उन्हें कोई आपत्ति नहीं, आयुष्मान भारत योजना को वे गरीबों की चिकित्सा के लिये ऐतिहासिक कदम बताते हैं, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की बदहाली का कोई संज्ञान लेने तक को वे तैयार नहीं और ऊंची तनख्वाह के साथ ही मेडिकल बीमा के बल पर लकदक निजी अस्पतालों में अपनी चिकित्सा के प्रति वे निश्चिंत हैं।
   उनकी दिक्कत तब शुरू हुई जब सरकार सरकारी कॉलेजों को भी एक-एक कर बाकायदा कारपोरेट के हाथों में सौंपने की तैयारी करने लगी। शुरुआत हो चुकी है और पिछले सप्ताह कुछ कॉलेजों के बिकने का टेंडर भी हो चुका है। आने वाले 10-15 सालों में देश की उच्च शिक्षा का संरचनात्मक स्वरूप पूरी तरह बदल जाने वाला है। जिन्हें इस पर संशय हो वे प्रस्तावित ‘नई शिक्षा नीति’ के विस्तृत मसौदे को पढ़ने का कष्ट उठा लें। यह प्रस्तावित नीति और कुछ नहीं, उच्च शिक्षा तंत्र के कारपोरेटीकरण और इसकी जिम्मेवारियों से सरकार के हाथ खींच लेने का घोषणा पत्र है।
     अधिकतर बैंक वाले खुश हैं कि सरकारी कालेजों का निजीकरण किया जा रहा है। वे इस परसेप्शन के शिकार हैं कि सरकारी स्कूल-कालेजों के मास्टर लोग बिना कुछ किये-धरे ऊंची तनख्वाहें उठाते हैं और कि…ये सारे मास्टर सरकार पर बेवजह के बोझ हैं।
     एक-एक कर सार्वजनिक संपत्तियों को कौड़ी के मोल कारपोरेट के हाथों बेचा जा रहा है और इन खबरों को कहीं कोई तवज्जो नहीं मिल रही। अखबारों के किसी पन्ने के कोने में चार-आठ लाइनों की कोई छोटी सी खबर आती है, जिसका संज्ञान भी अधिकतर लोग नहीं लेते कि पब्लिक सेक्टर की फलां इकाई फलां उद्योगपति के हाथों बेच दी गई।
     अधिकतर बाबू लोगों के प्रिय न्यूज चैनलों में वे चैनल ही हैं जो प्राइम टाइम में नियम से पाकिस्तान, कश्मीर, तीन तलाक, एनआरसी आदि पर बहसें करते-कराते हैं, जिनके एंकरों की चीखों से इन बाबुओं की रगों में भी देशभक्ति का जोश कुलांचें भरने लगता है। टीवी में एंकरों/एंकरानियों की चीखें जितनी जोर से गूंजती हैं, बाबू लोगों का जोश उतना बढ़ता है। उतना ही उनके बच्चों का मस्तिष्क प्रदूषित होता है जो अभी छठी, आठवीं या बारहवीं क्लास में हैं और कारपोरेट संचालित लोकतंत्र के छल-छद्मों से नितांत अनभिज्ञ हैं।
   नहीं, ऐसा नहीं है कि अब उनकी आंखों पर पड़ा पर्दा हट रहा है। पर्दा अपनी जगह यथावत है और मोबाइल न्यूज एप्स पर आ रही उन प्रायोजित खबरों को देख-पढ़ कर वे अब भी मुदित-हर्षित हो रहे हैं जिनमें बताया जाता है कि इमरान मोदी के डर से थर-थर कांप रहे हैं, कि अब कश्मीर तो क्या, पीओके भी बस हासिल ही होने वाला है, कि असम की जमीन की पवित्रता अब लौटने ही वाली है जहां सिर्फ ‘मां भारती के सपूत’ ही रह जाएंगे और तमाम सौतेलों को खदेड़ दिया जाएगा।
    उनकी आंखों पर पड़े पर्दों ने उन्हें इंसानियत से, भारतीयता से कितना विलग कर दिया है, यह उन्हें अहसास भी नहीं। तबरेज के हत्यारों को दोषमुक्त कर दिए जाने से तो उन्हें कोई तकलीफ नहीं ही हुई, दोषमुक्त आरोपियों को फूल-मालाओं से लदा देख कर भी उन्हें कोई हैरत नहीं हुई।
  तमाम खुली आँखों पर पड़े गर्द भरे पर्दे यथावत हैं। उन्हें तो विरोध बस अपने हितों पर हो रहे आघातों से है। उनका विभाग सलामत रहे, सरकारी बना रहे, उनका वेतन-पेंशन कायम रहे, बाकी सारे के सारे विभागों का निजीकरण हो जाए, फर्क नहीं पड़ता।
      ये सिर्फ बाबू लोग हैं। इनमें अधिकारी भी हैं, कर्मचारी भी हैं, पियून साहब लोग भी हैं, प्रोफेसर/मास्टर भी हैं। वे न सवर्ण हैं, न पिछड़े, न अति पिछड़े, न दलित आदि। वे सिर्फ मध्यवर्गीय बाबू हैं जिन्हें अपने वर्गीय हितों से इतर कुछ नहीं सूझता।
   उनमें से बहुत सारे लोग अब आंदोलित हैं लेकिन अलग-अलग जमीन पर। एक दूसरे के आंदोलनों के प्रति उनमें कोई सहानुभूति नहीं, बल्कि, अपना छोड़ बाकी अन्यों के आंदोलनों को वे संदेह की दृष्टि से देखते हैं और अवसर पड़ने पर प्रतिकूल टिप्पणियां करने से भी कोई गुरेज नहीं करते।
   कितने मासूम हैं वे!
 वे सोचते हैं कि आसमान गिर पड़े तो गिरे, बस उनकी छत सलामत रहे, जिसकी सुरक्षा का जिम्मा सरकार का है क्योंकि वे तो सरकारी हैं। उनका ऑफिस सरकारी है और उसकी छत सरकार ने ही बनाई थी।
    हितों के अलग-अलग द्वीपों पर खड़े वे तमाम लोग पराजित होने को अभिशप्त हैं। उनके बीच सामूहिक मानस का निर्माण सम्भव ही नहीं क्योंकि वे सारे एक-दूसरे के विभागों को सरकार पर बोझ मानते हैं।
    वे आंदोलन कर रहे हैं। कुछ लोग, कुछ विभाग तो जोरदार आंदोलन की राह पर हैं। लेकिन, उनका वैचारिक खोखलापन तब सामने आता है जब दिन भर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ करते-करते वे शाम को जब घर लौटते हैं तो चाय/कॉफी पीते उन्हीं न्यूज चैनलों पर उन्हीं दलाल एंकरों की चीखें सुनते हैं जो उन्हें बताते हैं कि पाकिस्तान तो अब बर्बाद होने ही वाला है और भारत…? यह तो विश्व गुरु था और  फलां जी के नेतृत्व में फिर से विश्व गुरु बनने की राह पर है, कि बस, विश्व गुरु बनने को ही है। दुनिया के शीर्ष 300 विश्वविद्यालयों की लिस्ट में भारत का कोई संस्थान अगर जगह नहीं पा सका तो लिस्ट बनाने वालों की कसौटियां ही संदिग्ध हैं। जिस देश में ‘जियो’ नामक अवतारी यूनिवर्सिटी हो जिसने जन्म से पहले ही एक्सीलेंस की कसौटियों को पूरा कर लिया हो उसे विश्वगुरु बनने से कोई रोक भी कैसे सकता है?
*********
(ये लेख हेमंत झा की फेसबुक वाल से लिया गया है )

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रांची: बुर्क़ा पहन दीक्षांत समरोह में शामिल हुई मुस्लिम टॉपर, तो कॉलेज ने नहीं दी डिग्री

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रांची: झारखंड की राजधानी राजधानी के मारवाड़ी कॉलेज में ग्रेजुएशन सेरेमनी के दौरान एक मुस्लिम छात्र को सिर्फ इस वजह से डिग्री देने से इनकार कर दिया गया, क्यूंकि वो उस समरोह में बुर्का पहन कर पहुंची थी.

दरअसल खबर के मुताबिक, लड़की का नाम निशत फातिमा है और वो ऑल ओवर बेस्ट ग्रेजुएट चुनी गयी थी. लेकिन जब समारोह में निशत का नाम पुकारा गया तो, नाम बुलाये जाने के साथ ही मंच से घोषणा कर दी गयी कि वह कॉलेज द्वारा तय ड्रेस कोड में नहीं आई हैं, इसलिए समारोह में उन्हें डिग्री नहीं दी जाएगी.  हालांकि इस घटना के बाद दूसरे टॉपर्स को मेडल और डिग्री देने की प्रक्रिया चलती  रही.

आपको बता दें कि, निशत फातिमा ने सत्र 2011-14 तक रांची के मारवाड़ी कॉलेज से स्नातक की शिक्षा ली है. और उन्होंने बीएसई मैथ्स ऑनर्स में 93 फीसदी मार्क्स हासिल किये हैं, जो की इस विशेष सत्र के सबसे अधिक अंक थे. इसी कारण समारोह में निशत को सबसे पहले गोल्ड मैडल लेना था.

वहीँ टॉपर्स को डिग्री देने के लिए राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू और रांची विवि के कुलपति डॉ रमेश कुमार पांडेय मौजूद थे.

गौरतलब है कि ग्रेजुएशन सेरेमनी को लेकर कॉलेज की तरफ से ड्रेस कोड तय किया गया था. जिसमें छात्रों को सफेद रंग का कुर्ता पायजामा और छात्राओं को सलवार-सूट, दुपट्टा या साड़ी ब्लाउज में आना था. ड्रेस कोड के सम्बन्ध में कॉलेज ने पहले ही नोटिस जारी किया था.

वहीँ इस पूरी घटना पर निशत के पिता मुहम्मद इकरामुल हक का कहना है कि, बुर्का हमारी परंपरा में शामिल है. उन्होंने बताया कि, निशत कॉलेज के दौरान भी बुर्का पहन कर ही क्लास करती थी.

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क्या उलमा आलोचनाओं से परे हैं?

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अनीस अंसारी
अंधी तक़लीद बहुत ख़तरनाक होती है.. ये आपके दिमाग़ को जकड़ लेती है और आप एक ख़ास दायरे में सोचने लगते हैं जब भी कोई उस दायरे से बाहर की बात करता है तो वो आपको दुश्मन लगने लगता है।
सहाबा ए किराम शख़्सियत परस्त नही थे, तभी तो दुनिया के अज़ीम तरीन हुक्मरान, हज़रत उमर जिसके नाम से ही लोगों में कंपकपी तारी हो जाया करती थी, जब जनता दरबार में खड़े होकर पूछते है कि “लोगो अगर मैं हक़ ओ इंसाफ पे न चलूँ तो तुम क्या करोगे?”
लोगों की भीड़ में से एक बद्दू (दिहाती ) खड़ा होता, जिसने अपनी तलवार खजूरों के पत्तों में लपेट रखी थी (क्योंकि उसके पास तलवार की म्यान नही थी), तलवार पे हाथ मार कर कहता है:
“ऐ उमर हम तुम्हे इस तलवार से सीधा कर देंगे”
हज़रत उमर खामोश हो जाते हैं। सारे मजमे में सन्नाटा छा जाता है। फिर हज़रत उमर कहते हैं कि “अब उमर बर्बाद नही होगा”।
एक दिन हज़रत उमर के पास शिकायत आती है कि लड़की वाले ‘मेहर’ की क़ीमत ज़्यादा मांगने लगे हैं, तो हज़रत उमर मस्जिद से ऐलान करते हैं कि, “आज के बाद हुकूमत के द्वारा तय किये मेहर से ज़्यादा कोई लड़की वाला डिमांड नही करेगा।”
जब इस एलान के बाद हज़रत उमर मस्जिद से निकलते है तो एक औरत रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती है और तैश में बोलती है—
“ऐ उमर, तुम कौन होते हो मेहर की हद तय करने वाले, जबकि क़ुरान ने इसकी हद तय नही की।”
हज़रत उमर फौरन वापस मस्जिद जाते हैं और अपना फैसला वापस लेने का ऐलान करते है और कहते हैं कि “जब तक मुसलमानों में ऐसी औरतें मौजूद हैं, उमर महफूज़ है।”
अब ये भी सुनिये कि हज़रत उमर कौन हैं?
★जिनके बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि “जिस रास्ते से उमर गुज़रता है शैतान वो रास्ता छोड़ देता है।”
“अगर मेरे बाद कोई नबी होता तो वो उमर होता।”
 “हर क़ौम का एक मोहद्दस (जिसपे वही तो नही आती मगर अल्लाह की तरफ़ से उसे सीधा इलहाम होता है) और मेरी उम्मत का मोहद्दस उमर है।”
वो हज़रत उमर जिनके कई फैसलों पर लोग ऐतराज़ करने लगे तो क़ुरान में उस फैसले की ताईद में आयतें उतर गईं। लेकिन इसके बाद भी मुसलमानों का अदना से अदना शख़्श भी भक्ति नही करता। ये नही कहता कि हज़रत उमर ने कह दिया तो कोई न कोई मसलेहत होगी
हज़रत उमर इल्म वाले है
हज़रत उमर अमीरऊल मोमेनीन है
हज़रत उमर अशरे मोबश्शेरा वाले है
हज़रत उमर वो है जिनसे अल्लाह ने रज़ामंदी का ऐलान कर रखा है
क्योंकि सहाबा शख़्सियत परस्त नही थे। सहाबाओं के नज़दीक दीन और उम्मत पहले थे शख़्स और तंज़ीम बाद में।
क्या आज भी ऐसा होना मुमकिन है?

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हरियाणा: सीएम मनोहर लाल खट्टर का ऐलान, हरियाणा में भी लागू होगा एनआरसी

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मुस्लिम मिरर स्टाफ़

नयी दिल्ली: राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) की अंतिम सूची आने के बाद जहाँ एक तरफ विवाद ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं वहीँ इसी बीच अब हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने घोषणा की है कि, असम के बाद अब उनके राज्‍य में भी एनआरसी लागू किया जाएगा।

ये बात मुख्यमंत्री खट्टर ने रविवार को अपनी सरकार के पिछले पांच सालों के कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों की जानकारी देने के लिए आयोजित प्रेसवार्ता के दौरान कही।

इसके अलावा खट्टर ने बताया कि हरियाणा में कानून आयोग के गठन करने पर भी विचार किया जा रहा है अवं समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों की सेवाएं लेने के लिए अलग से एक स्वैच्छिक विभाग का गठन किया जाएगा।

एनआरसी पे खट्टर ने कहा कि, परिवार पहचान पत्र पर हरियाणा सरकार तेजी से काम कर रही है और इसके आंकड़ों का उपयोग राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में भी किया जाएगा।

गौरतलब है कि, उन्होंने न्यायमूर्ति एचएस भल्ला के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि, भल्ला रिटायर होने के बाद भी एनआरसी डाटा का अध्ययन करने के लिए असम के दौरे पर जा रहे हैं और ये अपने आप में सराहनीय है।

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए मनोहर लाल ने अपनी सरकार के पिछले पांच वर्षों पर कहा कि, उनका उद्देश्य सरकार द्वारा पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल में किए गए कार्यों की जानकारी लोगों तक पंहुचाना है। इसके अलावा उनकी सरकार आने वाले समय में क्या करेगी, इसके बारे भी वह प्रबुद्ध लोगों से सुझाव् ले रहे है। उन्होंने कहा कि, किसी भी अच्छे सुझाव को वो अपने संकल्प पत्र में शामिल भी कर सकते है।

खट्टर के मुताबिक उनकी सरकार ये सुनिश्चित करेगी के विकास कार्यों का ऑडिट समाज के प्रबुद्ध द्वारा ही हो अतः इसके लिए वो सोशल ऑडिट सिस्टम लागू करेंगे. इस ऑडिट के अनुसार ऐसे कार्यों में भूतपूर्व सैनिक, अध्यापक, इंजिनियर या किसी अन्य प्रकार की विशेष उपलब्धि प्राप्त करने वाले लोगों को ही शामिल किया जाएगा।

आपको बता दें कि, कुछ सप्ताह पूर्व ही असम में हुई एनआरसी की अंतिम सूची आई आई थी जिसमें तकरीबन 19 लाख लोगों को इस सूची से बहार कर दिया था, जिसके बाद काफी आलोचना और विवाद हुए. यहाँ तक की अक्सर एनआरसी की पैरवी करने वाली भाजपा ने अंतिम सूची के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने का फैसला किया है.

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दिल्ली: आदर्श नगर में नाबालिक मुस्लिम लड़के को भीड़ ने पीट पीटकर मार डाला

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Muslim Mirror Staff

नई दिल्ली: आये दिन हो रही भीड़ हत्याओं में अब सबसे चौंकाने वाला मामला दिल्ली के आदर्श नगर इलाके से सामने आया है, जहाँ एक नाबालिग मुस्लिम लड़के की भीड़ द्वारा पीट पीटकर हत्या कर दी गयी है।

दरअसल, घटना शुक्रवार सुबह हुई जब 15 वर्षीय साहिल नामक लड़के को इसलिए पीट पीट कर मार दिया गया क्यूंकि कथित तौर पर वो चोरी करने के लिए अपने पड़ोसी मुकेश के घर में घुस गया था।

वहीँ इस मामले में पुलिस ने गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया है और इस संधर्भ में 6 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।

ये घटना उस वक़्त हुई जब शुक्रवार सुबह करीब 4 बजे साहिल अपने पड़ोसी के घर में घुस गया, और कुछ असामान्य गतिविधि को देखते हुए मुकेश नींद से जाग गए और उन्होंने साहिल को देखा जो चोरी के इरादे से कथित रूप से घर के अंदर प्रवेश कर चुका था। मुकेश के चिल्लाने पर लोग इकट्ठा हुए और साहिल की पिटाई करने लगे और उसके बाद पुलिस को बुलाया गया।

पुलिस के पहुंचने के तुरंत बाद, उन्होंने लड़के को जगजीवन राम अस्पताल में भर्ती कराया, जो भीड़ द्वारा पिटाई के बाद बेरहमी से घायल हो गए था। लेकिन, साहिल की हालत बिगड़ने लगी। पुलिस ने घर के मालिक मुकेश के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया है और उसे हिरासत में ले लिया है।

वहीँ साहिल ने शुक्रवार शाम को अंतिम सांस ली;  इसलिए पुलिस ने मुकेश के खिलाफ लगाए गए आरोपों को बदल दिया।

इस घटना पर बयान देते हुए, लड़के के परिवार के सदस्य ने कहा, “उन्होंने हमारे लड़के को 2 बजे पीटना शुरू कर दिया और सुबह 6 बजे तक उसकी पिटाई करते रहे। मेरा एक 15 साल का बेटा साहिल ही था, जो हमारा घर चलाने में मदद करता था। अब उसकी 2 बहनों और 3 भाइयों को अब कौन खिलाएगा? ”

“जब हमने 8:30 बजे उसे उठाया, तो वह साँस लेने की बहुत कोशिश कर रहा था। उन्होंने सुबह उसे पटरियों पर फेंकने की योजना बनाई थी, लेकिन बाद में उसे किसी तरह छोड़ दिया। हम इन सभी लोगों को जानते हैं और उन्होंने मेरे बेटे का जीवन छीन लिया है ”परिवार के सदस्य ने कहा।

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मुस्लिम बहुल इलाकों से चुन कर आए हुए लोकसभा सदस्यों से एक आम मुस्लमान का सवाल 

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मुस्लिम बहुल इलाकों से चुन कर आए हुए माननीय लोकसभा सदस्य,

अस्सलामो अलैकुम !

आपको हमने इसलिए चुना है कि आप हमारी आवाज़ बनेंगे और हमारी समस्याओं के प्रति सरकार को सजग कराते रहेंगे। निरंतर और प्रभावशाली प्रयास करेंगे । परंतु हम कई दशकों से देखते आ रहे हैं कि तमाम मुस्लिम नेता चुनाव के समय जोशीला और भावनात्मक भाषण देकर हमारा वोट तो हासिल कर लेते हैं लेकिन जीतने के बाद हमारे गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं। लेकिन हर चीज़ की एक सीमा होती है। हम मुकदर्शक बने नहीं रह सकते। बीजेपी और संघ के डर से आपको बहुत लंबे समय तक वोट नहीं दे सकते। अब आपको अपनी जिम्मेदारी निर्वहन करना ही होगा। और आप अपनी जिम्मेदारियों का कितना निर्वहन कर रहे हैं निम्नलिखित सवालों के जवाब से हमें बताने का कष्ट करें!

  1. आप लिंचिग के विरोध में कौन कौन सा कदम अभी तक उठाए हैं या उठा रहे हैं या उठाने वाले हैं?
  2. क्या आप लिंचिंग के विरोध में किसी तरह का कोई धरना प्रदर्शन या भूख हड़ताल किए हैं ? क्या आप लिंचिंग के विरोध में सड़कों पर कभी उतरे हैं?
  3.  क्या आपने लिंचिंग को रोकने के लिए एक सख्त कानून व्यवस्था लाने की सरकार से मांग किए हैं?  या क्या आप इस मांग के लिए अनिश्चित काल के लिए भूख हड़ताल पर कभी बैठे हैं?आपकी यह मांग सरकार मान ले इसके लिए आप कौन सा प्रभावशाली कदम उठाएं हैं या उठाने वाले हैं?
  4. क्या हम ऐसे ही बीजेपी के डर से आपको वोट देते रहें ताकि आप पांच साल एसी कमरों में बिरयानी और कोरमा तोड़े ? या आप लोगों की नपुंसकता को देखते हुए हम लोग भी अब बीजेपी को ही विकल्प बना लें?
  5. जब हमें ही सड़कों पर उतरना है और हमें स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़नी है तो हम आपकी जगह बीजेपी को ही वोट क्यूँ न दें? हो सकता है बीजेपी के दिल में ही हमारे लिए ममता जाग जाए? हम आप जैसे नपुंसक नेताओं की जगह दुश्मन को ही दोस्त क्यूं नहीं बना लें
  6. क्या कांग्रेस, सपा, बसपा ,राजद जैसी तथाकथित सेकुलर दल हमारे हितों की रक्षा करती है या हमारे लिए आवाज़ बन सकती है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर आप इन दलों को क्यूँ नहीं छोड़ देते? क्या यह सच नहीं है कि आप अपनी निजी स्वार्थों के लिए इन तथाकथित सेकुलर दलों का गुणगान करते हैं?
  7. क्या आप यह मानते हैं कि तथाकथित सेकुलर दलों में आपमात्र एक मुखौटा भर हैं फिर आप किस मुंह से हमसे वोट मांगते हैं ?  और फिर हम वोट देने वालों में और मोदी भक्त में क्या फर्क रह जाता है? मोदी भक्त भी बिना कारण वोट दे रहे हैं और हम भी आपको बिना किसी काम के।
  8. मुस्लिम बहुल इलाकों से मुस्लिम विधायक और सांसद चुने जाने के बावजूद आंकडे़ बताते हैं कि मुस्लिम बहुल इलाकों में स्कूल से लेकर अस्पतालों का भारी अकाल है । तो क्या यह सच नहीं है कि आप तथाकथित सेकुलर दलों के एजेंट के तौर पर सदियों से काम करते आ रहे हैं और आज भी उनके ही एजेंडों को ढो रहे हैं? यानी आपको हमारे विकास से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि आप यह जानते हैं कि हम आपको बीजेपी के डर से वोट दे ही देते हैं।
  9. हज कमेटी से लेकर वक्फ बोर्ड , उर्दू एकादमी,मदरसा बोर्ड आदि में सौ फीसदी आप मुस्लिम नेताओं को ही नेतृत्व रहा है फिर भी यह सभी विभाग भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है। आप इनके खिलाफ कौन सा कदम उठाएं हैं और इन विभागों को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए क्या कर रहे हैं?
  10. क्या आप यह मानते हैं कि देश में वोटों का पोलराईजेशन हो गया है और अब तथाकथित सेकुलर दलों का कोई भविष्य नहीं है? और ऐसी परिस्थिति में क्या हमें अपना नेतृत्व खड़ा करना चाहिए?

धन्यवाद

मुहम्मद वजहुल कमर

(एक आम नागरिक)

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बीजेपी विधायक की बेटी ने वीडियो बना कर कहा “पिता से जान का ख़तरा”

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Muslimmirror Staff

नयी दिल्ली: उत्तर प्रदेश के बरेली विधायक राजेश मिश्रा की बेटी ने एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में अपने पति के साथ एक वीडियो जारी किया है. वीडियो में दावा किया गया है कि दंपति को लड़की के पिता यानी विधायक राजेश मिश्रा से जान का ख़तरा है.

दरअसल, मिश्रा की बेटी साक्षी ने दलित युवक अजितेश कुमार से 4 जुलाई को शादी कर ली. सोशल मीडिया पर वायरल हो रही वीडियो में साक्षी यह कहती नजर आ रही है कि क्योंकि उसने अजितेश से अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ मंदिर में शादी की थी, इसलिए उसे अपने पिता से जान का ख़तरा है.

साक्षी विडियो में कह रही हैं कि, अगर हम उन्हें मिल गये तो मेरे पिता मुझे और मेरे पति को जान से मार देंगे क्यूंकि वह अपनी बेटी का  दलित परिवार के लड़के से शादी करने की बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता.

साक्षी आगे बोलती हुई नज़र आती हैं कि मेरे पिता के लोग हमें ट्रैक करने की कोशिश कर रहे हैं.

तथा विडियो में दंपति पुलिस से उन्हें सुरक्षा प्रदान करने की अपील करते नजर आ रहे हैं. हालांकि अभी तक विधायक की तरफ से इस संधर्भ में कोई जवाब नहीं आया है.

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तबरेज़ अंसारी पर वीडियो बनाने पर टिकटोक स्टार फैसल फैसू व् उनके साथियों पर मुक़दमा दर्ज

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नई दिल्ली: झारखंड मोब लिंचिंग में मारे गये तबरेज़ अंसारी पर टिक टाक के मशहूर स्टार फैसल उर्फ़ मिस्टर फैसू व उनके साथियों को वीडियो बनाना महंगा पड़ गया और उन सभी पर मुक़दमा दर्ज किया गया है.

दरअसल, सोशल मीडिया एप्प टिकटोक पर तबरेज़ अंसारी को लेकर आपत्तिजनक वीडियो डालने के कारण मुंबई पुलिस ने फैसू अवं उनके साथियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है. साथ ही टिक टोक से उनके अकाउंट को हटा दिया गया है.

ग़ौरतलब है कि फैसल फैसू के टिक टोक अकाउंट पर तकरीबन 25 मिलियन फेन फ़ोलोविंग है तथा उनके ग्रुप के अन्य साथी जैसे कि अदनान शेख, फैज़ बल्लोच और सदान फारूकी की भी कई मिलियंस फोलोविंग है.

फैसू व उनके साथियों के खिलाफ रमेश सोलंकी नामक शिव सेना नेता ने एलटीमार्ग पुलिस स्टेशन में कंप्लेंट लिखवाई है. ये कंप्लेंट 8 जुलाई को लिखवाई गयी है.

आपको बता दें कि, मुंबई पुलिस की साइबर सेल ने इन सभी लोगों के खिलाफ आईपीसी की सेक्शन 153 (A) और सेक्शन 34 के तहत मामला दर्ज किया है.

क्या था सारा मामला??
दरअसल फैसल फैसू ने अपने टिक टोक अकाउंट mr_faisu07 से तबरेज़ अंसारी की मौत के मामले में का विडियो अपलोड करते हुए कहा कि “मार तो दिया तुमने उस बेक़सूर तबरेज़ अंसारी को, लेकिन कल जब उसकी औलाद बदला ले तो ये मत कहना कि मुसलमान आतंकवादी है”.

ये विडियो टिक टोक पर आते ही वायरल हो गया, जिसके बाद 8 जुलाई को शिवसेना नेता रमेश सोलंकी ने फैसल फैसू व उनके साथिओं के खिलाफ कंप्लेंट लिखवादी तथा रमेश सोलंकी के अलावा और लोगों ने भी ट्विटर व् मुंबई पुलिस से शिकायत की.

गौरतलब है कि, टिक तक पर बनाये गए इस विडियो में पहले से ही किसी और की आवाज़ डब थी और कई मिलियन लोग इस डायलॉग पर विडियो बना चुके थे.

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मप्र में मुस्लिम अफसर बदलना चाहता है अपना नाम

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भोपाल, 8 जुलाई | मध्य प्रदेश के मुस्लिम समाज के एक वरिष्ठ अधिकारी फिर चर्चाओं में हैं, क्योंकि वह ऐसा नाम खोज रहे हैं, जो उनकी पहचान को छिपा सके। इसके लिए उन्होंने एक के बाद एक कई ट्वीट किए। उप सचिव स्तर के अधिकारी नियाज खान ने मॉब लिंचिंग की घटनाओं को लेकर चिंता जताते हुए ट्वीट किया है कि वे अपनी पहचान छिपाने के लिए नया नाम ढूंढ रहे हैं।

नियाज ने शनिवार को ट्वीट कर लिखा, “नया नाम मुझे हिसक भीड़ से बचाएगा। अगर मेरे पास कोई टोपी, कोई कुर्ता और कोई दाढ़ी नहीं है तो मैं भीड़ को अपना नकली नाम बताकर आसानी से निकल सकता हूं। हालांकि, अगर मेरा भाई पारंपरिक कपड़े पहन रहा है और दाढ़ी रखता है तो वह सबसे खतरनाक स्थिति में है।”

उन्होंने एक अन्य ट्वीट में विभिन्न संस्थाओं पर सवाल उठाते हुए लिखा, “चूंकि कोई भी संस्थान हमें बचाने में सक्षम नहीं है, इसलिए नाम को स्विच करना बेहतर है।”

नियाज ने आगे लिखा, “मेरे समुदाय के बॉलीवुड अभिनेताओं को भी अपनी फिल्मों की सुरक्षा के लिए एक नया नाम ढूंढना शुरू करना चाहिए। अब तो टॉप स्टार्स की फिल्में भी फ्लॉप होने लगी हैं। उन्हें इसका अर्थ समझना चाहिए।”

नियाज खान पहले भी चर्चाओं में आ चुके हैं। IANS

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बिहार में इंसेफेलाइटिस से 108 की मौत, मुजफ्फरपुर में स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री हर्षवर्धन को दिखाए काले झंडे

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पटना/ मुजफ्फरपुर । बिहार में एईएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) या इंसेफेलौपैथी हर साल बच्चों पर कहर बनकर टूटता है। इस साल भी गर्मियों में एईएस के कारण उत्‍तर बिहार में 108 बच्चों की मौत हो चुकी है। इनमें एक बच्‍ची की मौत तो रविवार को मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्‍ण मेडिकल कॉलेज व अस्‍पताल (एसकेएमसीएच) में केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के निरीक्षण के दौरान ही हो गई। वहां से वापसी के क्रम में केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री को आक्रोशित लोगों ने काले झंडे दिखाए। निरीक्षण के बाद केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने बच्चों की मौत को कष्‍टइाई बताया तथा इसके लिए सौ बेड के बच्‍चों की आइसीयू के निर्माण पर बल दिया।

इस बीच इलाज में लापरवाही के आरोप भी लगे हैं। बिहार के मंत्री सुरेश शर्मा ने अपने विवादित बयान में कहा है कि बीमारी दस्‍तक देकर नहीं आती। उन्‍होंने यह भी माना कि जैसे हालात हैं, उसके अनुसार इलाज की व्‍यवस्‍था नहीं हो सकी है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता डॉ. सीपी ठाकुर ने आरोप लगाया कि राज्‍य सरकार देर से जागी, मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार को खुद जाकर देखना चाहिए था।

एईएस से मौतों के कारण अब मुजफ्फरपुर से पटना-दिल्‍ली तक हाहाकर मच गया है। इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन आज बीमारी की स्थिति का जायजा लेने रविवार को मुजफ्फरपुर पहुंचे। इसके पहले पटना में उन्‍हें पप्‍पू यादव की जन अधिकार पार्टी के कार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखाए।

पप्‍पू यादव कर पार्टी ने केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री को मुजफ्फरपुर में भी काले झंडे दिखाए। मुजफ्फरपुर में जन अधिकार पार्टी के कार्यकताओं ने केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री के काफिले को रोककर काले झंडे दिखाए। उस समय उनके साथ केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य राज्‍यमंत्री अश्विनी चौबे व बिहार के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री मंगल पांडेय भी थे। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन 2014 में भी एईएस का जायजा लेने आए थे। उस वक्‍त भी उन्‍होंने कईवायदे किए थे, जो पूरे नहीं हुए। मंत्री फिर वादे कर के जा रहे हैं।

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