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RSS नेता बोले- बिना किसी प्रमाण के हमने मान लिया कि बापू फादर ऑफ द ओल्ड नेशन हैं

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मुस्लिम मिरर डेस्क

नयी दिल्ली: हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने मोदी को ‘फादर ऑफ इंडिया’ घोषित कर डाला जिसके बाद अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की इकाई मुस्लिम राष्ट्रिय मंच के नेता इंद्रेश कुमार ने चौंकाने वाला बयान दिया है.

दरअसल इन्द्रेश कुमार ने कहा है कि, 72 साल पहले बिना किसी तथ्य के हमने मान लिया था कि बापू फादर ऑफ नेशन हैं. उन्होंने कहा कि इतिहास में कभी-कभी ऐसी घटनाएं घटती हैं.

इंद्रेश कुमार ने अपने बयान में कहा कि, ”72 साल पहले बिना किसी प्रमाण के और बिना किसी तथ्य के हमने मान लिया कि बापू फादर ऑफ द ओल्ड नेशन हैं. अब उसको मानना या नहीं मानना है. ज्योतिष में कोई जगह है कि नहीं है, आध्यात्म को कोई जगह है कि नहीं है.”

हालांकि इन्द्रेश कुमार के इस बयान के बाद एमआईएम चीफ़ ओवैसी ने कहा कि, ”अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को भारतीय स्वतंत्रता संषर्ष के बारे में कोई जानकारी नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी फादर ऑफ नेशन हो ही नहीं सकते क्योंकि ये उपाधि महात्मा गांधी को हासिल है. आप मोदी की तुलना राष्ट्रपिता से नहीं कर सकते. ओवैसी ने कहा कि जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे दिग्गज नेताओं को भी कभी ये उपाधि नहीं दी गई.”

ओवेसी ने आगे कहा कि, राष्ट्रपति ट्रम्प पत्रकारों से चर्चा के दौरान माइंड गेम खेल रहे थे, वे प्रधानमंत्री मोदी और इमरान खान दोनों की तारीफ करते हैं. हमें ट्रंप के इस गेम को समझने की जरूरत है.

गौरतलब है कि, अमेरिकी राष्ट्रपति ने मुलाकात के दौरान जमकर पीएम मोदी की करते हुए कहा कि, पीएम मोदी ने भारत को एकजुट किया है और हम उन्हें ‘फादर ऑफ इंडिया’ कहेंगे.

ट्रम्प ने यूएनजीए की अपनी बैठक में कहा, “मोदी एक महान व्यक्ति और महान नेता हैं. मुझे याद है, भारत पहले बहुत बदहाल था, वहां बहुत लड़ाइयां थीं और वह सबको साथ लेकर चले, एक पिता की तरह सबको साथ लेकर चले और उन्हें ‘भारत का पिता’ कहा जा सकता है”.

 

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8 लाख कश्मीरियों को आतंकित करने के लिए कश्मीर में लगाये गए हैं 900,000 सैनिक: इमरान खान

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मुस्लिम मिरर डेस्क

नयी दिल्ली: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने शुक्रवार को फिर से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए कहा कि, वह कश्मीरियों को चुप कराने के लिए बल का उपयोग करके “राज्य हरण का एजेंडे” प्राप्त कर सकते हैं।

दरअसल, इमरान खान ने ट्वीट करते हुए कहा कि, “75 दिन और मोदी सरकार ने IOJK में घेराबंदी जारी रखी हुई है। मोदी एक बाघ की सवारी कर रहे हैं – उन्होंने सोचा कि वह कश्मीरियों को चुप कराने के लिए 900k बलों का उपयोग करके राज्य हरण का एजेंडा प्राप्त कर सकते हैं। आपको आतंकवाद से लड़ने के लिए 900k सैनिकों की आवश्यकता नहीं है, आपको उनकी ज़रूरत 8 मिलियन कश्मीरी लोगों को आतंकित करने के लिए है। ”

बाद के एक और ट्वीट कर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि उनका भारतीय समकक्ष “भयभीत” था।

“जैसा कि दुनिया आईओजेके में मानवाधिकारों के सबसे खराब उल्लंघन को देख रही है, मोदी अब भयभीत हैं क्योंकि उन्हें पता है कि, जिस पल घेरा उठाया जायेगा, वहां एक खूनखराबा होगा – जो कश्मीरी लोगों को वश में करने का एकमात्र तरीका होगा,” उन्होंने लिखा।

आपको बता दें कि, बीते 5 अगस्त को भारत सरकार ने कश्मीर को एक विशेष दर्जा देने वाले आर्टिकल 370 और 35a के लगभग सभी अनुच्छेदों को रद्द कर दिया था जिसके चलते तभी से जम्मू कश्मीर राज्य में भारी मात्र में सुरक्षा बल तैनात हैं एवं संचार ब्लैकआउट लगाया भी लगाया गया था।

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अकाल तख़्त ने की आरएसएस पर बैन लगाने की मांग

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नयी दिल्ली: सिख धर्म की संस्था अकाल तख़्त ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर तुरंत पाबंदी लगाने की मांग की है.

दरअसल, आकाल तख़्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने आरएसएस पर देश को बांटने वाली गतिविधियां चलाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि, “सभी धर्म और संप्रदाय के लोग भारत में रहते हैं और यही इस देश की खूबसूरती है. संघ का कहना है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाएंगे, लेकिन ये देश के हित में नहीं है.”

वहीँ आकाल तख्त की इस मांग पर भारतीय जनता पार्टी के सिख नेता आरपी सिंह ने आरएसएस का बचाव करते हुए ग्यानी हुए कहा है कि, “हिंदू कोई धर्म पंथ का नाम नहीं है, ये एक संस्कृति है. मैं अकाल तख़्त के जत्थेदार से निवेदन करूंगा कि आरएसएस का तीन सदस्य मंडल अल्पसंख्यक आयोग से मिला था और उन्होंने माना था कि सिख अलग धर्म है और इसका अलग अस्तित्व है.”

आरपी सिंह ने आगे कहा कि, “इस बात को आरएसएस मान चुका है, और इस पर अब विवाद नहीं होना चाहिए.”

आपको बता दें कि, विजयदशमी के दिन नागपुर में अपने संबोधन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि संघ अपने इस नज़रिए पर अडिग है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है. अथवा राष्ट्र के वैभव और शांति के लिए काम कर रहे सभी भारतीय हिंदू हैं.”

इसके अलावा शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष गोबिंद सिंह लोंगोवाल ने भी भागवत के बयान को बेहद आपत्तिजनक बताते हुए कहा कि,”संविधान ने सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता दी है. ऐसा लगता है कि भागवत संविधान को न देखते हुए हिंदू राष्ट्र का अपना एजेंडा सभी पर थोपना चाहते हैं.”

गौरतलब है कि, आरएसएस पर पाबंदी लगाने की मांग करने वाला अकाल तख़्त सिख धर्म की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था है.

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अयोध्या मामलाः सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई पूरी हो सकती है सुनवाई

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नयी दिल्ली: अयोध्या मंदिर मस्जिद विवाद मामले में सुनवाई 17 अक्टूबर के बजाय 16 अक्टूबर को समाप्त होने की संभावना है. इस बाटी का संकेत खुद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने दिया है कि, 70 साल पुराने विवाद में बहस बुधवार को ही समाप्त हो जाएगी।

दरअसल, सुनवाई के अंतिम दिन  मुख्य न्यायाधीश ने मुस्लिम पक्ष को एक घंटे के बाद हिंदू पक्ष को शुरुआती 45 मिनट आवंटित किए, और फिर मामले में शामिल सभी मिश्रित पक्षों को 45 मिनट के चार स्लॉट दिए।

गौरतलब है कि, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में फैसला आने पर दोनों पक्षों को राहत मिलने की संभावना है।

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भाजपा टी-शर्ट पहने महाराष्ट्र के किसान ने खुद को फांसी पर लटकाया

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मुस्लिम मिरर डेस्क

नयी दिल्ली: सत्तारूढ़ भाजपा शासित महाराष्ट्र में भाजपा चुनाव अभियान की टी-शर्ट पहन एक व्यथित किसान ने रविवार तड़के पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर ली है.

मामला महाराष्ट्र स्थित बुलधाना जिले के खटखेद गांव का है. मृतक की पहचान 38 वर्षीय राजू तलवार के रूप में हुई है, राजू का शव सुबह करीब 8.30 बजे जिले में एक पेड़ की शाखा से लटका मिला. राजू पेशे से किसान थे.

गौरतलब है कि, राजू भारतीय जनता पार्टी को आने वाले विधान सभा चुनावों में रंग-बिरंगी टी-शर्ट पहने व् अभियान का नारा ” पुनौआ आपले सरकार ” (21 अक्टूबर को हमारी सरकार फिर से चुनाव कराओ) लगा प्रचारित कर रहे थे

आपको बता दें कि, राजू ने उस समय ख़ुदकुशी की, जब प्रधानमन्त्री

विकास एक महत्वपूर्ण दिन आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदर्भ में एक चुनावी रैली को संबोधित किया, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पश्चिमी महाराष्ट्र के चुनावी दौरे पर थे.

पुलिस के अनुसार, राजू तलवार के ऊपर बैंक का भारी क़र्ज़ था, जिसका वह भुगतान नहीं कर पा रहे थे, इसी कारणवश राजू ये क़दम उठाने के लिए प्रेरित किया था.

वहीँ शनिवार को फडणवीस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार पर निशाना साधते हुए कहा था कि, कृषि संकट और किसानों की आत्महत्या “पूर्ववर्ती कांग्रेस-एनसीपी” सरकार ज़िम्मेदार है.

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छलावा है आरएसएस का महिला सशक्तिकरण

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– नेहा दाभाडे

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने हाल में विदेशी समाचारपत्रों और मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ एक प्रेस वार्ता में कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 के हटाये जाने, असम में एनआरसी, नागरिकता संशोधन विधेयक और राममंदिर सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की. भागवत ने इन मुद्दों पर जो कुछ भी कहा, वह संघ की घोषित नीतियों के अनुरूप था. परन्तु महिलाओं के बारे में उनका एक कथन विस्मयजनक था. भागवत ने कहा कि, “महिलाओं का उत्थान किस तरह हो, यह तय करने की क्षमता पुरुषों में नहीं है. केवल महिलायें ही यह तय कर सकती हैं. अपने सम्बन्ध में निर्णय लेने में महिलाएं सक्षम हैं.”

यह कथन, महिलाओं के सम्बन्ध में संघ की सोच और दृष्टिकोण के विपरीत था. संघ का राष्ट्रवाद, अति-पुरुषवादी है जो ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक मानसिकता से गहरे तक प्रभावित है और जो समाज में महिलाओं को निम्न स्थान देता है. क्या हम भूल सकते हैं कि संघ में एक भी महिला नहीं है. लक्ष्मीबाई केलकर के बहुत जोर देने पर भी संघ के संस्थापक सरसंघचालक के.बी. हेडगेवार महिलाओं को संघ में प्रवेश देने पर राजी नहीं हुए और उन्होंने केलकर को सलाह दी कि वे राष्ट्रसेविका समिति नाम से महिलाओं का एक अलग संगठन बना लें. यह संगठन, आरएसएस के अधीन काम करता है और उसकी वैचारिक प्रतिबद्धताओं का पालन करता है.

फिर अचानक यह क्या हुआ? क्या संघ का चरित्र और प्रकृति बदल रही है? क्या वह समावेशी और प्रगतिशील बन रहा है? या किसी विशेष कारण से संघ प्रमुख ने विदेशी मीडिया के प्रतिनिधियों के समक्ष ऐसी बातें कहीं?

इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए यह ज़रूरी है कि हम संघ की मूल विचारधारा को जानें और यह समझें कि वे कौन से मुद्दे हैं जिन पर संघ कोई समझौता नहीं कर सकता (क्योंकि ऐसा करने से उसके गठन का उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा) और वे मुद्दे कौन से हैं जिन पर वह समझौता कर सकता है. लगभग 95 वर्ष के अपने जीवन में संघ ने अलग-अलग तरीकों से दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और श्रमिकों को अपने से जोड़ा. संघ की मूल विचारधारा में इन वर्गों और उनके हितों के लिए कोई जगह नहीं है. अपनी स्थापना से लेकर अब तक संघ ने कई वैचारिक कलाबाजियां खाईं हैं और यह जानना दिलचस्प होगा कि इस दौरान, महिलाओं के बारे में उसकी सोच वही बनी रही या उसमें कुछ परिवर्तन हुए.

संघ में महिलाओं की भूमिका और राष्ट्रवाद के लैंगिक पहलुओं पर अगणित विद्वतापूर्ण अध्ययन हुए हैं. अध्येताओं ने संघ के साहित्य, उसके चिंतकों के विचारों और उसके शीर्ष पदाधिकारियों के वक्तव्यों के आधार पर महिलाओं के सम्बन्ध में संघ की नीति का अध्ययन किया है. अतः हम यह बता सकते हैं कि संघ के अनुसार, महिलाओं की समाज और देश में क्या भूमिका होनी चाहिए.

श्रेष्ठतावादी विचारधारा से प्रेरित किसी भी अन्य संगठन की तरह, संघ एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना करता है जिसमें केवल कुछ वर्गों का वर्चस्व होगा. संघ का दावा है कि उसका फोकस केवल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर है और इसी के रास्ते वह हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है. हिन्दू राष्ट्र, मुसलमानों और अन्य हाशियाकृत समुदायों के बहिष्करण पर आधारित होगा और उसमें हिन्दू धर्म की प्रधानता और प्रभुत्व होगा. हिन्दू राष्ट्र में पुरुषों और महिलाओं की भूमिका, संघ की पुरुषत्व और नारीत्व की परिभाषा से निर्धारित होगी. यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि संघ, भारत की कल्पना एक स्त्री – भारत माता – के रूप में करता है.

संघ की मान्यता है कि महिलाएं देश के सम्मान का प्रतीक हैं और उन्हें (बलात्कार आदि से) अपवित्र करने वाले दुश्मन को नष्ट कर दिया जाना चाहिये. यह दुश्मन कोई व्यक्ति हो सकता है, कोई समुदाय या फिर कोई देश. संघ कहता है कि भारत माता को उसके आतंरिक शत्रुओं, अर्थात मुसलमानों, से खतरा है. इस खतरे के नाम पर समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया जाता है. संघ का राष्ट्र का आख्यान और परिकल्पना यह तय करती है कि राष्ट्र और समाज में महिलाओं की क्या भूमिका होगी. मूलतः, महिलाओं को पत्नी और माता के रूप में देखा जाता है और यह माना जाता है कि परिवार में उनकी प्रमुख भूमिका है.

अगर संघ यह चाहता और मानता है कि महिलाओं को घर की चहारदीवारी के भीतर रहना चाहिए तब फिर भला इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं संघ की विचारधारा की अनुयायी कैसे और क्यों हैं? राष्ट्र निर्माण की परियोजना में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने की सीमित अनुमति दी जाती है. परन्तु सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में उनका प्रवेश, पितृसत्तात्मक मूल्यों की कीमत पर नहीं वरन हिंदुत्व की विचारधारा और हिन्दू राष्ट्र की तानेबाने के भीतर रहते हुए होता है. महिलाओं की भूमिका और उनके स्थान को अपरिवर्तित रखते हुए, संघ उन्हें कुछ स्वतंत्रता देता है और यहाँ तक कि कुछ पुरुषोचित काम करने की इज़ाज़त भी (जैसे आत्मरक्षा और हथियार चलाने का प्रशिक्षण).

परिवार की परिकल्पना

संघ की दृष्टि में, परिवार समाज की मूलभूत और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है. परिवार की संस्था और उसके ढांचे को मजबूती देने के लिए संघ ‘कुटुंब प्रबोधन’ नामक एक कार्यक्रम भी चलाता है. परिवारों के खानपान और उसके सदस्यों के व्यवहार का निर्धारण करने के अलावा, संघ यह भी बताता है कि परिवार में किन विषयों पर चर्चा हो सकती है. “परिवारजन अपने पूर्वजों, देवी-देवताओं, संस्कृति, धर्म और देशभक्ति पर आपस में चर्चा कर सकते हैं”. ये वचन कुटुंब प्रबोधन परियोजना के सह-संयोजक रविन्द्र जोशी के हैं. परिवार के अन्दर भी, लैंगिक भूमिकाएं सुपरिभाषित हैं और लीक से हट कर चलने को प्रोत्साहित नहीं किया जाता. प्रत्येक महिला – चाहे वह गृहणी हो या कामकाजी – की प्राथमिक भूमिका माता की है. राष्ट्रीय सेविका समिति की उत्तर क्षेत्र कार्यवाहिका चंद्रकांता ने समिति द्वारा आयोजित एक प्रशिक्षण शिविर के समापन समारोह को मुख्य अतिथि बतौर संबोधित करते हुए कहा, “पुरुष का काम है बाहर के काम करना, धन के काम करना – पौरुष उसका गुण है. मातृत्व, स्त्रियों का गुण है. इस गुण को औरत को कभी नहीं भूलना चाहिए.” किसी भी ऐसे तर्क या मुद्दे (जैसे महिलाओं की असमानता का प्रश्न) जो परिवार की संस्था के संतुलन को बिगाड़ सकता है, से बचा जाना चाहिए. उदाहरण के लिए, समिति की महासचिव सीता अन्नदानम, हिन्दू महिलाओं को उनके परिवार की पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिए जाने के खिलाफ है. “हमारी परम्पराओं और महिला अधिकारों के बीच संतुलन होना चाहिए और यह संतुलन शास्त्रों के आधार पर बनाया जाना चाहिए. अन्यथा, हमारे परिवार टूट जाएंगें और बहनों और भाइयों के बीच जंग छिड़ जाएगी,” उन्होंने कहा.

उन्होंने आगे कहा कि पति द्वारा बलात्कार जैसी कोई चीज नहीं होती. विवाह एक पवित्र बंधन है. पति-पत्नि को एक-दूसरे के साथ रहने से परमानंद की प्राप्ति होनी चाहिए. इस परमानंद की अवधारणा समझ में आ जाने के बाद, सब कुछ एकदम ठीक ठाक चलेगा.

भागवत पहले ही यह समझा चुके हैं कि विवाह और परिवार, दोनों में महिलाएं पराधीन हैं और पति अपनी पत्नि को कभी भी त्याग सकते हैं. उनके अनुसार, “पति और पत्नि के बीच एक अनुबंध होता है जिसमें पति, पत्नि से कहता है कि तुम मेरे घर की देखभाल करो और मैं तुम्हारी सारी आवश्यकताएं पूरी करूंगा. मैं तुम्हें सुरक्षित रखूंगा. यदि पति, इस अनुबंध की शर्तों का पालन करता है तो जब तक पत्नि अपने हिस्से की शर्तों को पूरा करती है तब तक पति, पत्नि के साथ रहता है. अगर पत्नि अनुबंध का उल्लंघन करती है तो पति उसे त्याग सकता है”. अगर भागवत यह मानते हैं कि महिलाएं इतनी महत्वहीन हैं कि उन्हें उनके पति और परिवार द्वारा आसानी से त्यागा जा सकता है तब वे यह कैसे कह सकते हैं कि महिलाएं अपने निर्णय स्वयं लें.

माता के रूप में भूमिका

हिन्दू राष्ट्र और संघ, दोनों में मातृत्व की केन्द्रीय भूमिका है. संघ के लिए मातृत्व दो कारणों से महत्वपूर्ण है. पहला,माताएं हिन्दू राष्ट्र के सिपाहियों को जन्म देती हैं. दूसरे, माताएं केवल जैविक प्रजनन नहीं करतीं. वे संस्कृति का भी पुनरूत्पादन करती हैं. वे अपने बच्चों को संस्कार देती हैं, उन्हें भारत के गौरवशाली अतीत से परिचित करवाती हैं और उनमें हिन्दुत्व के प्रति गर्व का भाव जागृत करती हैं. यही कारण है कि भागवत चाहते हैं कि हिन्दू महिलाएं ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें. उन्हें डर है कि हिन्दू महिलाओं की प्रजनन दर अपेक्षाकृत कम होने से जल्दी ही भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे. उन्होंने चेतावनी दी कि “अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो 2025 तक हिन्दुओं का उनके ही देश से अस्तित्व समाप्त हो जाएगा”.

भागवत यह भी मानते हैं कि महिलाओं की मां के तौर पर केन्द्रीय भूमिका है. उनकी मान्यता है कि महिलाएं अपने बच्चों को संस्कार देती हैं और इस प्रकार समाज व देश को मजबूत बनाती हैं, “हमारी कुटुम्ब व्यवस्था ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है,” उन्होंने कहा।

सतित्व

जिन अन्य गुणों को संघ महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण मानता है वे हैं सतित्व और सम्मान. महिलाएं समाज के सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतिनिधित्व करती हैं. महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसा कोई रिश्ता न बनाएं जिससे समुदाय की ‘बदनामी’ हो. अर्थात महिलाओं के शरीर पर भी परिवार और समुदाय का नियंत्रण है. इसी मानसिकता के चलते संघ अंतर्धार्मिक विवाहों की खिलाफत करता आ रहा है. लव जेहाद जैसे शब्दों का प्रयोग कर वह महिलाओं के अपना जीवनसाथी चुनने के अधिकार को उनसे छीन लेना चाहता है. हाल में भागवत ने एक चिंतित पिता के अंदाज में हिन्दुओं को चेतावनी देते हुए कहा कि “आने वाली पीढ़ियों की लड़कियों को लव जिहाद के अर्थ से परिचित करवाया जाना चाहिए और उन्हें इस जाल से बचने के तरीके समझाए जाने चाहिए”.

एक अन्य अवसर पर भागवत यौन हिंसा के लिए “पश्चिमी संस्कृति’ को दोषी ठहराते हैं और उन मूल्यों की प्रशंसा करते हैं जिनका ‘भारत’ में आचरण होता आया है. “जब भारत पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में इंडिया बन जाता है तब इस तरह की घटनाएं होती हैं. समाज के हर स्तर पर सच्चे भारतीय मूल्यों और संस्कृति को स्थापित किया जाना चाहिए – उस संस्कृति को जो महिलाओं को माता मानती है,” उन्होंने कहा. भागवत, भारत में बढ़ते बलात्कारों के कारणों का विश्लेषण कर रहे थे.

निष्कर्ष

आरएसएस अस्तित्व में ही इसलिए आया है ताकि वह हिन्दू राष्ट्र स्थापित कर सके. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुछ आदर्शों और मूल्यों के साथ संघ कोई समझौता नहीं कर सकता. हिन्दू राष्ट्र में महिलाओं को पराधीन रहना ही होगा. संघ, महिलाओं को देवी कहता है और भारत माता का वंदन करता है परंतु ये एक मुखौटा मात्र हैं. इन खोखले शब्दों से महिलाओें का सशक्तिकरण नहीं होगा. उलटे, ये पितृसत्तामकता और पितृसत्तात्मक ढ़ांचे को और मजबूत करते हैं. भागवत ने विदेशी मीडिया के सामने जो कुछ कहा, उसका एकमात्र उद्देश्य दुनिया को यह बताने का प्रयास करना था कि संघ बदल रहा है और महिलाओं की स्थिति जैसे मुद्दों पर उदारवादी बन रहा है. विदेशी मीडिया के प्रतिनिधियों से भागवत की यह बातचीत पिछले वर्ष संघ प्रमुख द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ द्वारा आयोजित “भविष्य का भारतः आरएसएस के परिपेक्ष्य में” विषय पर आयोजित तीन-दिवसीय सम्मेलन की अगली कड़ी थी. सम्मेलन और हालिया बातचीत दोनों का उद्देश्य संघ की छवि को एक नए कलेवर में प्रस्तुत करना था. यह बताना था कि संघ बदल रहा है और वह समावेशी और एकताबद्ध भारत का हिमायती है. भागवत ने कुछ ऐसी बातें कहीं जो संघ की घोषित नीतियों और कार्यक्रमों से मेल नहीं खातीं. संघ का एक उद्देश्य भारत में मची उथलपुथल से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान हटाना भी हो सकता है. भारत में असम में 19 लाख नागरिकों को राज्य-विहीन घोषित कर दिया गया है और कश्मीर में दो महीने से भी अधिक समय से अघोषित कर्फ्यू लागू है। (अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित) 

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बहुसंख्यकवाद भारत को अंधकार में ले जाएगा- रघुराम राजन

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नयी दिल्ली: भारतीय रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अपने बयान में भाजपा सरकार पर जमकर हमला बोला. राजन ने कहा कि, बहुसंख्यकवाद और निरंकुशता से देश अँधेरे में जाएगा और अस्थिरता बढ़ेगी.

राजन ने आगे कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी दर टिकाऊ नहीं है और सरकार द्वारा अपनाई जा रही नीतियों के कारण ख़तरा है कि, भारतीय अर्थव्यवस्था भी कहीं लातिन अमरीकी देशों की तरह न हो जाए. राजन ने नोट बंदी और जीएसटी को भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.

गौरतलब है कि, ये बयान राजन ने अमरीका की ब्रॉन यूनिवर्सिटी में ओपी जिंदल लेक्चर के दौरान दिया.

आपको बता दें कि राजन ने नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि, ‘मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के लिए कुछ अच्छा नहीं किया क्योंकि इस सरकार में सारी शक्तियां एक जगह थीं. ऐसे में सरकार के पास अर्थव्यवस्था को लेकर कोई नजरिया नहीं था. मंत्रियों के पास कोई ताक़त नहीं थी. ब्यूरोक्रेट्स फ़ैसले लेने को लेकर अनिच्छुक थे. गंभीर सुधार के लिए कोई आइडिया नहीं था.”

 

राजन ने मोदी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि, ”मोदी सरकार में सीनियर अधिकारियों को बिना कोई सबूत के हिरासत में ले लिया गया. मैं इस बात को लेकर दुखी हूं कि पूर्व वित्त मंत्री को बिना कोई जांच के जेल में कई हफ़्तों तक रखा गया है. संस्थानों की कमज़ोरी से सभी सरकारों के निरंकुश बनने की आशंका रहती है. ऐसा 1971 में इंदिरा गांधी के वक़्त में भी था और अब 2019 में मोदी के वक़्त में है.”

आपको बता दें कि, भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रहे हैं, इसके अलावा वो आईएमएफ़ के मुख्य अर्थशास्त्री के पद पर भी रह चुके हैं.

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पाकिस्तान जारी करेगा 10,000 सिख तीर्थयात्रियों को वीसा

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नयी दिल्ली: इस साल नवंबर में गुरु नानक की 550 वीं जयंती के मौके पर पाकिस्तान भारतीय सिख तीर्थयात्रियों को 10,000 वीजा जारी करेगा.

गौरतलब है कि, श्रद्धालुओं का पहला जत्था विशेष ट्रेन से नवंबर के पहले सप्ताह में पाकिस्तान के लिए रवाना होगा. तीर्थयात्री अटारी रेलवे स्टेशन से वाघा रेलवे स्टेशन तक जाएंगे और फिर ननकाना साहिब की यात्रा शुरू करेंगे. वहीँ 8 नवंबर तक सिख पाकिस्तान आते रहेंगे.

आपको बता दें कि, पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा कमेटी के प्रमुख सरदार सतवंत सिंह ने गुरु नानक की 550 वीं जयंती समारोह में शामिल होने के लिए दुनिया भर के सिखों को आमंत्रित किया है.

वहीँ पकिस्तान दुनिया भर के भक्तों के लिए मध्य अक्टूबर तक एक अस्थायी आवास तैयार हो करेगा, जहाँ विश्व के अलग अलग हिस्सों से आये तीर्थयात्री अस्थाई रूप से ठहर सकेंगे.

सीमा शुल्क और आव्रजन अधिकारी तीर्थयात्रियों की सहूलियत के लिए वाघा बॉर्डर पर अतिरिक्त काउंटर स्थापित करेंगे जिससे तीर्थयात्री को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े.

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इथियोपिया के पीएम अबी अहमद अली को मिला 2019 नोबल शांति पुरस्कार

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नयी दिल्ली: नोबेल शांति पुरस्कार 2019 के लिए घोषणा करते हुए नोबेल जूरी ने इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली (Abiy Ahmed Ali) के नाम की घोषणा की है.

दरअसल, नोबेल समिति के मुताबिक ये पुरस्कार अबी अहमद को उनके देश के चिर शत्रु इरिट्रिया के साथ संघर्ष को सुलझाने के लिए दिया गया है.

नोबेल पुरस्कार जूरी ने बताया कि, अबी अहमद अली को शांति और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने के प्रयासों के लिए और विशेष रूप से पड़ोसी इरिट्रिया के साथ सीमा संघर्ष को सुलझाने की पहल के लिए इस पुरस्कार से सम्मानित किया जायगा.

गौरतलब है कि, जुलाई 2018 में इथियोपिया और इरीट्रिया के बीच 22 साल पुराने युद्ध को खत्म कराने के लिए अंत में अहम भूमिका निभाने के लिए अबी अहमद अली को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.  में दोनों देशों के बीच शांति समझौता हुआ था.

कौन हैं अबी अहमद अली?

अबी अहमद अफ्रीकी देश इथियोपिया के प्रधानमंत्री हैं. 43 वर्षीय अबी अहमद को इथोपिया के ‘नेल्सन मंडेला’ के उपनाम से भी जाना जाता है.

इथोपियन नेशन डिफेंस के लिए काम करते हुए अबी ने कंप्यूटर इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री तथा 2011 में लन्दन की ग्रीनिच यूनिवर्सिटी से ट्रांसफार्मेशनल लीडरशिप में मास्टर्स किया. वहीँ साल 2017 में इथोपिया के अदिस अबाबा यूनिवर्सिटी से पी एच डी  में डिग्री ली.

आपको बता दें कि, अबी ने उत्तरी अफ़्रीकी देशों के बीच सद्भावपूर्व संबंध और इथियोपिया में शांति स्थापित करने के लिए किये प्रयासों के अलावा हज़ारों विपक्षी कार्यकर्ताओं को जेल से रिहा करवाया, देश छोड़ कर जा चुके नेताओं को देश में वापिस बुलाया और देश मे आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की.

2019 के नोबेल पुरस्कार के लिए 301 उम्मीदवार थे, इनमें से 223 शख्सियत और 78 संस्थाएं शामिल थीं. वहीँ नोबेल पुरस्कार पाने वाले अबी अहमद 100वें व्यक्ति होंगे.

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महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय: 6 दलित व् ओबीसी छात्रों को पीएम मोदी को पत्र लिखने पर किया निष्कासित

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नयी दिल्ली: पीएम मोदी को लिंचिंग पर खुला पत्र लिखने के लिए 50 बुद्धिजीवियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने के कुछ दिनों बाद,  अब इसी तरह की एक और घटना सामने आई है, दरअसल महात्मा गांधी अंर्तराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय (एमजीएवी) वर्धा के छह छात्रों ने पीएम मोदी कश्मीर बंद के खिलाफ पत्र लिखने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए निष्कासित कर दिया गया है.

आपको बता दें कि, MGAHV  प्रशासन द्वारा एक पत्र जारी किया, जिसमें बताया कि छात्रों को “आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन” और “प्रशासनिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप” के आधार पर निष्कासित कर दिया गया है.

हालांकि, निष्कासित छात्रों ने अपने निष्कासन को “महात्मा गांधी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय के भगवाकरण का विरोध करने वाली आवाज़ों को कुचलने का प्रयास” बताते हुए आरोपों से इनकार किया है.

गौरतलब है कि, निष्कासित हुए सभी छह छात्र दलित, ओबीसी श्रेणी के हैं।

वहीँ बुधवार को छात्र नेता चंदन सरोज की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया कि, यह आयोजन देशद्रोह के आरोप के विरोध में आयोजित किया गया था, जिसमें भीड़ हत्या के विरुद्ध पीएम को खुला पत्र लिखने के लिए 50 प्रख्यात व्यक्तियों के खिलाफ मुक़दमा दायर किया गया था.

सरोज ने कहा, “जब छात्रों ने पीएम को पत्र लिखा, तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस आयोजन को रोकने का प्रयास किया. प्रशासन ने भारी सुरक्षा तैनात की और छात्रों को गांधी हॉल में प्रवेश करने से रोक दिया. तब छात्रों ने गांधी हॉल के गेट पर धरना दिया और नारे लगाए.

आश्चर्यजनक रूप से, निष्कासन पत्र में घटना के बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं है।

छात्र संगठन द्वारा जारी एक विज्ञप्ति,  कहा कि छात्रों का “कथित अपराध” देश में वर्तमान स्थिति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखने के लिए था.

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देश

बिहार: जहानाबाद में मूर्ति विसर्जन के दौरान खूनी झड़प, पूरा जिला सील

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मुस्लिम मिरर डेस्क

जहानाबाद: बिहार के जहानाबाद में मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन के दौरान दो संप्रदायों के बीच हुए विवाद ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया है. इस घटना के बाद पूरे जिले में बुधवार रात से ही तनाव का माहौल है और तनाव की स्थिति को देखते हुए पूरे जिले को सील कर दिया गया है.

गौरतलब है कि, विसर्जन में शामिल लोगों ने आरोप लगाया था कि बुधवार की रात में मां दुर्गा की प्रतिमा पर पथराव कर उसे क्षतिग्रस्त किया गया था. जिसके बाद लोंगों ने जमकर बवाल मचाया और एक विशेष समुदाय के लोगों पर जमकर पथराव किया तथा उनके धर्म स्थल को भी आग के हवाले कर दिया.

इस घटना के दौरान हुए हंगामें और पथराव में कई लोगों के बुरी तरह घायल होने की भी खबर है.

वहीँ जब इस घटना की जानकारी जहानाबाद के जिलाधिकारी नवीन कुमार तथा एसपी मनीष को लगी तो वो दल-बल के साथ घटनास्थल पहुंचे और भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की. इसके अलावा अनियंत्रित भीड़ को  नियंत्रित करने के लिए पुलिस  द्वारा फायरिंग भी की गई.

हालांकि पुलिस द्वारा की गयी फायरिंग के बाद लोग शांत हो गए लेकिन अभी भी पूरे इलाके में तनाव की स्थिति बनी हुई है.

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